6 महीने बाद भी पूर्व उपराष्ट्रपति धनखड़ ‘बेघर’: अफसर बोले- बंगला रेनोवेट करा रहे, मंत्री ने कहा- अभी बंगला अलॉट नहीं, वे पसंद तो करें

21 जुलाई 2025 को उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के बाद 42 दिनों में जगदीप धनखड़ ने सरकारी बंगला छोड़ दिया। अब उन्हें एक निजी फार्म हाउस में रहना पड़ा है। हालांकि पूर्व उपराष्ट्रपति को अपना नया सरकारी घर मिलने में 6 महीने से ज्यादा देरी हुई है, लेकिन बंगले के अलॉट होने की बात उन्होंने कही थी।

पूर्व उपराष्ट्रपति के करीबी बताते हैं, 'सितंबर में हमने बताया था कि उनके नाम से बंगला अलॉट हो गया है। मरम्मत में 3 महीने लगेंगे। नवंबर और फिर जनवरी में बंगले का स्टेटस पूछा गया, तो फिर मरम्मत की बात कही गई।'

दैनिक भास्कर ने हाउसिंग एंड अर्बन मिनिस्ट्री से संपर्क करने की कोशिश की। लेकिन जवाब नहीं मिला। इसके बाद हमने राज्य मंत्री तोखन साहू से संपर्क किया। उनसे जवाब मिला, 'बंगला अभी अलॉट नहीं हुआ। जैसे ही पूर्व उपराष्ट्रपति पसंद करेंगे, फौरन अलॉट कर दिया जाएगा।'

इस बारे में हमने विभाग के अधिकारियों से पूछा, क्या इससे पहले भी किसी पूर्व उपराष्ट्रपति को बंगले के लिए 5-6 महीने इंतजार करना पड़ा। जवाब मिला, 'इससे पहले दोनों पूर्व उपराष्ट्रपतियों को एक-दो महीने के अंदर बंगला मिल गया था। उन्हें प्रोटोकॉल के मुताबिक जल्द बंगले मिल गए थे।'
 
अरे, यह तो देखकर हैरानी हो गई मेरी, जिस तरह से सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद जगदीप धनखड़ को 42 दिनों में बंगला छोड़ देना पड़ा है। यह तो उनकी परिस्थितियों के बारे में नहीं पता चल पाया, लेकिन ऐसा लगता है कि उन्हें अपना नया सरकारी घर मिलने में बहुत ज्यादा देरी हुई है। क्या इससे पहले भी किसी पूर्व उपराष्ट्रपति को बंगले के लिए 5-6 महीने इंतजार करना पड़ा था, जैसे तोहन साहू ने बताया। यह तो सरकार के नियमों और परंपराओं के बारे में नहीं पता चल पाया, बस यही है जो आपने बताया है।
 
बेटा, यार, इस बात तो हम सब जानते हैं कि सरकारी बंगलों के लिए इंतजार कितना लंबा होता है 🤯। जगदीप धनखड़ की स्थिति तो बहुत ही दिलचस्प है। उन्हें पहले से ही अपना नया सरकारी घर मिलने में 6 महीने से ज्यादा देरी हुई, और अब उन्हें निजी फार्म हाउस में रहना पड़ रहा है 🏠। यह तो एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या इससे पहले भी दोनों पूर्व उपराष्ट्रपतियों को ऐसा ही इंतजार करना पड़ा, और क्या सच में उन्हें बंगला अलॉट नहीं हुआ था। 🤔
 
अरे, ये तो फिर से सरकारी जीवन में भी लोगों को इंतजार करने का मौका मिलता है 🤔. 6 महीने इंतजार करने की बात, यह तो बहुत देर है, चाहे वह पुराना सरकारी घर या नई जगह का अलॉट हो।

और फिर से लोगों पर गरीबी का बोझ डालने वाले नए नियंत्रण भी लागू होते हैं ताकि उन्हें अपनी नई जगह मिलने का समय कम हो जाए। यह तो सरकारी जीवन की गहरी गड़बड़ी का और एक उदाहरण है।

क्या कभी इस तरह की बातें समझाई जाती हैं? या फिर हमेशा लोगों पर ध्यान न दिया जाता है ताकि सरकार को अपने स्वयं के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने का मौका मिले।
 
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की स्थिति देखकर लगता है कि सरकार को अपने कर्मचारियों की सुविधा के लिए तय करने में थोड़ी भूलने की जरूरत है। उनके अलॉट होने के बाद 6 महीने का इंतजार करना निजी बनकर बदल गया।

पूर्व उपराष्ट्रपति को अपना नया सरकारी घर मिलने में लंबे समय लगना, तो इसका संदेश यह है कि सरकार की योजनाओं और टीमिंग पर ध्यान देने की जरूरत है।

[प्रोजेक्ट कॉइंट]:
 
मुझे लगता है कि ये सारा बात जाली है। 42 दिनों में सरकार ने जगदीप धनखड़ को बंगला देने का मन नहीं कर रहा? यह तो एक बड़ा झूठ है और हम सबको भ्रमित करने की कोशिश कर रहा है।

मैंने सुना है कि उनको अपना नया सरकारी घर मिलने में लंबा समय लगेगा, लेकिन उन्होंने पहले ही कह दिया था कि उनके नाम से बंगला अलॉट हो गया है। तो फिर ऐसे 6 महीने इंतजार करने की जरूरत क्यों? यह बहुत अजीब लग रहा है।
 
क्या यह सच है कि सरकारी बंगलों को अलॉट करने में इतनी देर लगती है? और जैसे ही हमें पता चलता है कि बंगला उपलब्ध हुआ, तो उसे पहले से ही अलॉट कर दिया जाता है। ऐसा इसलिए नहीं कि सरकार मुसीबत में, बल्कि यह कोई प्रक्रिया नहीं है, इसकी बात है 🤔

और अगर हम तोखन साहू जी के जवाब पर विचार करें तो लगता है कि बाकी सब कुछ ठीक है। लेकिन सरकारी नौकरी में इतनी देर लगाने से पहले हमें यह सवाल करना चाहिए कि हम अपने पैसे किस तरह खर्च कर रहे हैं 🤑
 
🤔 42 दिनों में जगदीप धनखड़ ने सरकारी बंगला छोड़ दिया, लेकिन उनको अब एक निजी फार्म हाउस में रहना पड़ गया है... यह तो बहुत ही दिलचस्प है। मेरा सवाल है, क्यों? 🤷‍♂️

पूर्व उपराष्ट्रपति के करीबी बताते हैं कि उन्हें बंगला अलॉट होने की बात कही थी, लेकिन बाकी सब कुछ कैसे हुआ? 🤔 6 महीने से ज्यादा देरी हुई... यह तो बहुत ही अजीब है। मुझे लगता है कि सरकारी अधिकारियों को अपनी बातें ठीक से रखनी चाहिए, न कि इतनी लंबी देरी करनी। 🕰️

लेकिन सबसे बड़ी चिंता यह है, कि पूर्व उपराष्ट्रपति को अब एक ऐसी जगह पर रहना पड़ रहा है जहां वे अपनी जिम्मेदारियों से निपटने में परेशानी नहीं करें। उनकी सुरक्षा और आराम क्या है? 🤝

मुझे लगता है कि इस दौरान सरकार को थोड़ी सी रिफॉर्मिंग करनी चाहिए... बिल्कुल! हमें यह जानने की जरूरत नहीं कि कैसे उनकी जिंदगी व्यवहार हुआ, लेकिन हमें यह जानने की जरूरत है कि आगे क्या बदलाव आएंगे। 🔄
 
बात है इस नए सरकारी नियम से कि अगर आप उपराष्ट्रपति पद पर रह चुके तो आपको अपना नया सरकारी घर 3 महीने में मिलने का वादा होता है, लेकिन वहाँ तक पहुँचने में 6-7 महीने से ज्यादा देरी होती है 🤔। इस बात पर कोई जवाब नहीं हो रहा है। क्या यह सरकार की नई नीति है? या बस लोगों को इंतजार करने का मौका देना चाहते हैं?
 
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