आदिवासी संगठनों का झारखंड बंद: सड़क पर उतरे संगठन के लोग, टायर जला कर किया विरोध; गाड़ियों की संख्या हुई कम - Ranchi News

झारखंड बंद जैसी बड़ी आंदोलन से पहले खूंटी में हुई आदिवासी राजा सोमा मुंडा की हत्या पर लोगों ने किया विरोध। आदिवासी समाज ने शनिवार को झारखंड बंद बुलाया था। लेकिन बंद जैसी आंदोलन के पहले हुए विरोध में लोगों ने सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किया। आदिवासी नेताओं और पड़हा राजा सोमा मुंडा की हत्या के खिलाफ सरकार को लिखित पत्र भेजने वाले शाक्तीपुर ब्लॉक के पंचायत चAIRMAN की हत्या 10 दिनों की हुई थी।

इस हिंसक घटना ने आदिवासी समाज को बहुत आहत किया। आदिवासी नेताओं और पड़हा राजा सोमा मुंडा की हत्या के खिलाफ सरकार पर लिखित पत्र भेजने वाले शाक्तीपुर ब्लॉक के पंचायत चेयरमैन जो जेल गये थे।

इस दौरान आदिवासी समाज ने रांची में हाईवे को बंद कर दिया और गोविंदपुर साहिबगंज नेशनल हाईवे पर भी विरोध किया। लोगों ने टायर जलाकर प्रदर्शन किया और नारेबाजी की।

आदिवासी महासभा, आदिवासी जनपरिषद, आदिवासी समन्वय समिति, अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद, केंद्रीय सरना समिति, संपूर्ण आदिवासी समाज, सोगोम तमाड़ समिति, एदेश सांगा पड़हा, संयुक्त बाइस पड़हा मुंडा, राजी पड़हा समिति आदिवासी नेताओं के समर्थन में झारखंड बंद का आह्वान किया था।
 
अरे भाई, यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना है जो झारखंड में हुई। आदिवासी समाज के लिए इतनी बड़ी और हिंसक घटना से पहले तो पड़हा राजा सोमा मुंडा की हत्या ने देशभर में आँखों की डोली भर दी। और अब झारखंड बंद जैसी बड़ी आंदोलन से पहले भी लोगों ने उनकी हत्या के खिलाफ सरकार पर विरोध किया। लेकिन लगता है कि यह बहुत ही पूरी घटना को नहीं देखा गया। शाक्तीपुर ब्लॉक के पंचायत चेयरमैन की भी हत्या हुई जो आदिवासी नेताओं और पड़हा राजा सोमा मुंडा की हत्या के खिलाफ सरकार पर लिखित पत्र भेजने वाले थे। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना है जिसे लोगों ने नहीं समझा। 😔
 
मुझे लगता है कि ये बहुत बड़ी और गंभीर समस्या है। जैसे ही आदिवासी समाज को यह पता चला कि उनके पड़ोसी राजा सोमा मुंडा पर कोई अपराध किया गया था, तो वे बहुत दुखित और चिंतित हुए। सरकार की लापरवाही और अनुशासनहीनता ने उनके समाज को बहुत आहत कर दिया है। मुझे लगता है कि इस तरह की घटनाएं होने से पहले सरकार को अपने विवेक से काम करना चाहिए और आदिवासी समाज की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। तेजी से आंदोलनों की जरूरत नहीं है, बल्कि एक बातचीत की जरूरत है जिसमें सरकार और आदिवासी नेता दोनों एक साथ बैठकर समस्याओं पर बात करें।
 
जिस तरह से पुलिस ने शाक्तीपुर ब्लॉक के पंचायत चेयरमैन को जेल कर दिया, वैसे ही इस घटना में भी बहुत बड़ा आंदोलन तैयार होना तय है। आदिवासी समाज को लगता है कि उनके अधिकारों और सुरक्षा के बारे में सरकार पर खास सुनवाई करनी जरूरी है।
 
क्या दिलचस्प देखा गया 🤔, आदिवासी राजा सोमा मुंडा की हत्या ने बहुत गहरा दर्द कर दिया है। लेकिन याद रखना ज़रूरी है कि इससे पहले भी शाक्तीपुर ब्लॉक के पंचायत चेयरमैन की हत्या हुई थी, और उसके बाद आदिवासी नेताओं की भी बहुत सी समस्याएं रही हैं। लेकिन आज देखा गया कि आदिवासी समाज एकजुट होकर झारखंड बंद का आह्वान कर रहा है। यह देखने में बहुत खुश हूँ कि लोग सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं और सरकार को पत्र भेजने जा रहे हैं। यह एक अच्छी बात है कि आदिवासी नेताओं के समर्थन में सभी समितियां एकजुट हुई हैं।
 
ਕੱਲ੍ਹ ਬਾਰੇ, ਤੁਸੀਂ ਜਾਣਦੇ ਹੋਵੇਂਗੇ ਕਿ ਅਦਿਵਾਸੀ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਬਚਾਓ ਲਈ ਜੰਗ ਨਹੀਂ ਬੁਲਾਉਣਾ, ਮਨਸੂਬਿਆਂ ਦੀ ਪ੍ਰੇਰਨਾ ਨਾਲ ਜੰਗ ਕਰਨੀ।
 
जो हुआ उसकी पूरी गंभीरता समझना चाहिए, लेकिन ऐसी घटनाएं हमेशा ही होती रहती हैं जैसे कि आदिवासी राजा सोमा मुंडा की हत्या, यह तो बहुत ही दुखद है। इसके पीछे की वजहें और भी जटिल हैं, लेकिन ऐसी घटनाओं पर चुप रहना नहीं चाहिए। आदिवासी समाज की आवाज़ सुनने की जरूरत है, उनके अधिकारों को लेकर मंच पर खड़े रहना चाहिए और सरकार को साफ-साफ बताना चाहिए कि यह तो बहुत बड़ा आह्वान है और इसका जवाब देना चाहिए। 🚨👮
 
🚨आदिवासी समाज को बहुत आहत करने वाली घटनाएं होती जाती हैं और सरकार पर दबाव डालने की जरूरत है... 🤕 आदिवासी राजा सोमा मुंडा की हत्या पर लोगों ने बहुत विरोध किया था और झारखंड बंद का आह्वान किया गया था, लेकिन इस तरह की घटनाएं होती जाती हैं तो सरकार पर दबाव डालने में जरूरत नहीं है... 🙄 सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने वाले लोगों की भावनाओं को समझना जरूरी है, लेकिन यह भी जरूरी है कि विरोध से कोई गलत नतीजा न निकले।
 
भाई तो यह विरोध बहुत ही दिलचस्प है 🤣, पंचायत चेयरमैन की हत्या के बाद लोग सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं और नारेबाजी कर रहे हैं। लेकिन मुझे लगता है कि ये विरोध बहुत ही जरूरी है, अगर सरकार भी ध्यान नहीं देती तो और भी बड़े आंदोलन होंगे।

मैंने एक मजाकिया सवाल सुना, क्या आदिवासी नेताओं को "पड़हा" माना जाता है? 😂, नहीं तो यह एक बहुत ही मजेदार और सच्ची बात है!

लेकिन गंभीरता से देखें तो आदिवासी समाज को बहुत आहत किया गया है, उनकी जान गई। हमें सरकार से जवाबदेही मांगनी चाहिए और उनकी बात सुननी चाहिए।
 
इस तरह की बड़ी भीड़ वाले प्रदर्शन से पहले से ही पता चल जाता था कि कुछ लोगों ने पहले ही आदिवासी राजा सोमा मुंडा की हत्या में शामिल हो गए थे। लेकिन अभी भी तो बहुत से लोग नहीं समझ पाए कि झारखंड बंद का मकसद यही है कि सरकार पर ध्यान आकर्षित करे और आदिवासी समाज की समस्याओं पर बोलने वालों को भी खतरा में डाल दे।
 
मेरी भावनात्मकता में यह घटना बहुत दुखद है, लेकिन इसके पीछे कुछ गहरी समस्याएं भी हैं। आदिवासी समाज को हमें समझना चाहिए, वे जिस तरह से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं, वह एक बहुत बड़ी मुद्दा है। अगर हम उनकी बात नहीं सुनते और उनके दर्द-धूप को समझते नहीं, तो यह सब हिंसा में बदल जाएगा।

जिस तरह से पड़हा राजा सोमा मुंडा की हत्या हुई, वैसे ही यह समाज को आहत कर रही है। हमें अपने नेताओं और उनके समर्थकों की जान पर खतरा देखना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही, हमें यह भी समझना चाहिए कि आदिवासी समाज को लड़ने के लिए मजबूर किया गया है।

हमारी सामाजिक न्याय और अनुसंधान परिषद ने इस मामले में जांच शुरू कर दी है, और हम उम्मीद करते हैं कि उनकी रिपोर्ट में सच्चाई बताई जाएगी।

हमारा आदिवासी समाज बहुत ही साहसिक है। अगर वे अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, तो हम उन्हें सहानुभूति देने और उनकी मदद करने चाहिए।

मैं इस घटना से बहुत गुस्सा हूं, लेकिन मैं इसके पीछे की सच्चाई पर विचार करते रहना चाहता।
 
झारखंड बंद जैसी बड़ी आंदोलन से पहले खूंटी में हुई आदिवासी राजा सोमा मुंडा की हत्या पर लोगों ने विरोध किया, लेकिन फिर वो आह्वान हुआ। मेरे दोस्त यह बहुत अजीब है जब लोग अपनी समस्याओं को समझने और साथ में आमने-सामने होने के बजाय पहले तो बेचारे लोगों को विरोध करना शुरू कर देते हैं। आदिवासी समाज को बहुत आहत किया गया और पंचायत चेयरमैन की हत्या भी हुई। यह बहुत ही दुखद बात है। लेकिन मुझे लगता है कि शायद ये सबकुछ एक साथ नहीं हो सकता।
 
अरे वाह! ये ऐसी ही स्थिति है जिससे हम सभी को चिंता होती है। आदिवासी समाज के लोगों ने बहुत भावनाओं से और गुस्से से लड़ा। पंचायत चेयरमैन की हत्या बाद में हुई और सरकार भी अपने कदम उठाने लगी।

लेकिन इसके पीछे कौन सी वजह थी, यह समझने की जरूरत है। आदिवासी समाज को बहुत अधिक नुकसान हुआ। आदिवासी नेताओं और पड़हा राजा सोमा मुंडा की हत्या के खिलाफ सरकार पर लिखित पत्र भेजने वाले शाक्तीपुर ब्लॉक के पंचायत चेयरमैन जो जेल गये थे, उनकी हत्या हुई और अब वह फिर से सड़कों पर निकल आएंगे।

यह घटना बहुत गंभीर है और हमें इसका समाधान ढूंढने की जरूरत है। आदिवासी समाज को अपनी आवाज सुनने की जरूरत है और सरकार द्वारा उनके अधिकारों की रक्षा करनी होगी।
 
यह तो बहुत दुखद है पंचायत चेयरमैन जी की हत्या से . उनकी सरकार को पत्र भेजने वाले लोगों को जेल में रखना ठीक नहीं है . यह आदिवासी समाज को बहुत आहत कर रहा है और फिर झारखंड बंद जैसे बड़े आंदोलन का तरीका भी इसी हिंसक घटना से लिया गया है। इसके पीछे क्या वजह है, यह समझने की जरूरत है . आदिवासी समाज को हमें समझाना होगा कि हिंसा नहीं करनी चाहिए, लेकिन अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण तरीकों से जुड़कर लड़ना ही सही है।
 
जो हुआ उसका खेद है आदिवासी समाज को। यह तो बहुत भयानक घटना है। पुलिस क्या नहीं कर पाई जो मुश्किल स्थिति पर ने पड़ा आदिवासी राजा सोमा मुंडा। झारखंड बंद जैसी बड़ी आंदोलन से पहले इन लोगों ने खूंटी में क्यों सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किया? इसके पीछे कुछ विशेष कारण नहीं दिखाई दे रहे हैं। आदिवासी समाज को बहुत आहत करने वाली घटना है और इस पर सरकार से बातचीत होनी चाहिए।
 
ਅਰੇ ਵੀਰ... ਇਹ ਸਾਡੇ ਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਬਹੁਤ ਗੁੱਸਾ-ਖ਼ੁਸ਼ੀ ਦਾ ਮਾਹੌਲ ਹੈ... ਜਦੋਂ ਵੀ ਕੁਝ ਵਿਰੋਧ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਸੰਗਠਨਾਂ ਤੇ ਆਦਿਵਾਸੀ ਕਮੇਟੀਆਂ ਖ਼ੁਦ ਹੀ 'ਬੰਦ' (ਜਾਂ ਆਪਣੇ ਤੋਂ) ਦਾ ਐਲਾਨ ਕਰ ਲੈਂਦੀਆਂ ਹਨ... ਅਸੀਂ ਬਹੁਤ ਚਿੰਤਾਵਾਂ ਤੇ ਮੱਦਦ ਭੇਜਣ ਵਾਲੇ ਆਪਣੇ ਸਿਆਸੀ ਨੇੜਲੇ ਹਨ...
 
ज़रूरी है कि हमें अपनी आवाज़ उठाकर याद रखना चाहिए कि आदिवासी समाज को भी उनके अधिकारों और सुरक्षा की बात करनी चाहिए। झारखंड बंद जैसे बड़े आंदोलन से पहले आदिवासी राजा सोमा मुंडा की हत्या पर लोगों ने विरोध किया, लेकिन फिर भी उनकी आवाज़ नहीं सुनाई दी गई। यह बहुत ही पुरानी समस्या है और हमें इस पर और अधिक जोर देना चाहिए
 
क्या फिर क्यों भड़क रहे हैं लोग? पहले पड़हा राजा सोमा मुंडा की हत्या हो गई, तो दूसरे आदिवासी नेताओं और पंचायत चेयरमैन की जेल जाने का मामला चल गया, फिर झारखंड बंद का विरोध शुरू हुआ... यह बहुत अजीब है 🤔

मुझे लगता है कि लोगों ने अपने गुस्से को सही तरीके से नहीं दूर किया। पड़हा राजा सोमा मुंडा की हत्या पर विरोध करना एक अच्छा कदम था, लेकिन झारखंड बंद जैसे बड़े आंदोलनों में शामिल होने से पहले अपने शब्दों और कार्रवाइयों को सोच-विचार कर लेना चाहिए।

आदिवासी समाज को अपने अधिकारों की लड़ाई में संयम और समझदारी का तरीका ढूंढना चाहिए, न कि हिंसा और भड़काऊ बयानबाजी। 🙏
 
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