'आदिवासी समाज हमारे धर्म का मूल', रांची में जनजातीय संवाद में बोले संघ प्रमुख मोहन भागवत

आदिवासी समुदाय हमारे धर्म के मूल हैं और पूजा-पाठ के अनेक रूप हो सकते हैं, प्रत्येक आदर के योग्य हैं। हमें अपनी पद्धति से पूजा करें, लेकिन दूसरों की पूजा के तरीकों का भी सम्मान करना चाहिए और उन्हें स्वीकार करना। यही हमारे देश का स्वाभाविक सार है। प्रकृति के साथ जुड़े धर्म को समझने की जरूरत है।

हमारे देश में एक पूजा कब थी, यह सवाल उठता है। पहले हमारे पूर्वज जंगलों और आश्रमों में रहते थे, जहां वे खेती करते थे और जंगल के आधार पर जीते थे। उस समय उनको जो अनुभूति हुई, वही उपनिषद है। आदिवासी उनके विचारों से चलते हैं।

वेदों में लिखा है कि अनेक भाषा बोलने वाले और अनेक धर्मों को मानने वाले लोग पृथ्वी माता पर रहते हैं। जैसे गाय अनेक धाराओं से सबको दूध देती है, वैसे ही इनको आश्रय प्रदान करो।

इस लंबे समय में कई विकास हुए हैं और स्वाभाविक रूप से समय के साथ-साथ विचार और संस्कृति के उच्च स्तर विकसित हुए हैं। फिर भी, जिस एकता से हमने शुरुआत की थी, वह आज तक कायम है। यही हमारा इतिहास है।

आज के आदिवासी समाज में धर्म नहीं है, यह गलत बात है। धर्म का अर्थ है कि पूजा करो, तो पूजा पहले से चली आ रही है। पूजा के पीछे का विचार भी तभी से चला आ रहा है। उसका अनुसंधान करेंगे तो ये सब उपनिषदों से मिलने वाला है।
 
मेरा विचार है कि आदिवासी समुदाय ने हमेशा अपनी जीवनशैली और पूजा-पाठ में सच्चाई और एकता को बनाए रखा है। उनकी संस्कृति बहुत प्राचीन और समृद्ध है, और यह हमें हमारी प्रकृति के साथ जुड़ने का एक अच्छा तरीका दिखाती है। लेकिन, मुझे लगता है कि हमें अपनी पद्धति से पूजा करने के साथ-साथ दूसरों की पूजा के तरीकों का भी सम्मान करना चाहिए। हमारे देश में बहुत सारे धर्म और पूजा-पाठ हैं, लेकिन सबके पीछे एकमात्र सच्चाई है - प्रकृति के प्रति जुड़ना। 🌿
 
🌳👥 आदिवासी समुदाय को हमारी संस्कृति का बहुत बड़ा हिस्सा मानकर देखें, उनकी पद्धति से पूजा करना उचित है लेकिन सभी धर्मों का सम्मान करना भी।🙏

मैंने पढ़ा है कि आदिवासी समुदाय पहले जंगलों में रहते थे और उनके विचारों से चलते हुए जंगल पर आधारित जीवनशैली को समझने की जरूरत है। वेदों में लिखा गया है कि अनेक भाषा बोलने वाले और अनेक धर्मों को मानने वाले लोग पृथ्वी माता पर रहते हैं जैसे गाय अनेक धाराओं से सबको दूध देती है तो ऐसे ही आदिवासी समुदाय को भी आश्रय प्रदान करें।

आज के समय में हमने बहुत विकास किया है और जिस एकता से शुरुआत की थी, वह आज तक कायम है। धर्म का अर्थ है कि पूजा करो, तो पूजा पहले से चली आ रही है। 👍
 
बोलो... आदिवासी समुदाय का हमारे धर्म के पूरे इतिहास में बहुत महत्व है 🙏। उनकी पूजा-पाठ की रूपरीति हमें सिखाती है कि जितना भी विविधता है, उतना ही सम्मान करना चाहिए। और अगर हम अपने तरीके से पूजा करें, तो दूसरों की पूजा-पाठ के रूपों का भी सम्मान करना चाहिए। यही हमारे देश का खास स्वाभाविक है 🌿
 
ਮैंनੂੰ ਪਿਆਰੀ ਹੈ ਜਦੋਂ ਕਿ ਸੱਭਿਆਚਾਰ ਅਤੇ ਵਿਕਾਸ ਨੂੰ ਬਲ ਦੇਣ ਵਾਲੀ ਪ੍ਰਗਤੀ ਬਾਰੇ ਖ਼ਬਰ ਆਉਂਦੀ ਹੈ 🚀। ਮੈਨੂੰ ਕਿਸੇ ਵੀ ਪ੍ਰਤੀਕ ਅਤੇ ਰਾਣੀਆਂ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਚਲਦਾ ਹੀ ਨਹੀਂ, ਜਗਾਉਣ ਵਾਲੇ ਸਮੇਤ ਪਰਿਵਾਰ ਅਤੇ ਧਰਮ ਦੀ ਇੱਕ ਜ਼ਬਾਨੀ ਭਾਸ਼ਾ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਲੋਕ-ਪ੍ਰਿਯ ਅਤੇ ਜਗਾਉਣ ਦੇ ਬੁੱਧੀ ਨੂੰ ਵਧਾਉਣ ਲਈ ਬਹੁਤ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਜਾਣਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।
 
मैंने देखा कि क्या लोग आदिवासी समुदाय पर इतने जोर दे रहे हैं। लेकिन यहां तक कि उनकी पूजा-पाठ करने के तरीकों को भी विवाद में डालकर संभालते हैं। मुझे लगता है कि अगर हम अपनी समस्याओं को हल करने के बजाय दूसरों की समस्याओं पर ध्यान देते हैं, तो यहां तक कि हमारा भारत भी दु:खी होगा।
 
अधिवासी लोगों की जिंदगी बहुत बुरी हुई है। उनके जमीन पर सरकारी प्लांटेशन लगने लगे और वहां के लकड़ी काटने लगे। अब उनका घर तोड़ दिया गया है और वो रोज़-रोज़ गरीबी का सामना कर रहे हैं। उन्हें उनकी जमीन वापस करने की कोई उम्मीद नहीं है। 🤕
 
ज्यादातर लोग समझ नहीं पाये जो आदिवासियों की पूजा-पाठ की दुनिया से बहुत दूर है। हमारे पूर्वजों ने खुद प्रकृति में पूजा की थी। शायद आजकल लोग समझने की जरूरत नहीं है कि आदिवासी समाज क्या है और उनकी संस्कृति। वेदों में भी यह बताया गया है कि जो लोग पृथ्वी पर रहते हैं वे सभी एक हैं।
 
मेरी राय यही है कि हमारा आदिवासी समुदाय हमारे धर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, और उनकी पूजा-पाठ के तरीकों में भी बहुत सारी सच्चाई है। मैंने एक छोटी सी डाईग्राम बनाई है जिसमें आदिवासी समुदाय को दिखाया गया है, और उनकी पूजा-पाठ के तरीकों के बीच का रिश्ता दिखाया गया है।

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| आदिवासी |
| समुदाय |
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| पूजा-पाठ
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| विभिन्न तरीके |
| और रूप |
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| धर्म का एक हिस्सा
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| हमारा धर्म |
| समुदाय |
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इसलिए, मुझे लगता है कि हमें अपनी पद्धति से पूजा करना चाहिए, लेकिन दूसरों की पूजा-पाठ के तरीकों का भी सम्मान करना चाहिए। यही हमारे देश का स्वाभाविक सार है।
 
😊 आदिवासियों का पूजा-पाठ एक बहुत ही रोचक विषय है... लेकिन मुझे लगता है कि उनकी पद्धति और हमारी हमारी पद्धति में कुछ भी गलत नहीं है। हमें अपनी तरीके से पूजा करनी चाहिए, लेकिन दूसरों की जानबूझकर न मानना। 🤔

मुझे लगता है कि आदिवासियों को उनके पूर्वजों की कहानियों और विचारों का सम्मान करना चाहिए... लेकिन हमें अपनी स्वतंत्रता भी बनाए रखनी चाहिए। 💪

मुझे लगता है कि पूजा-पाठ एक बहुत ही सुंदर विषय है, लेकिन इसके पीछे की सच्चाई को समझने की जरूरत है। 🤓
 
ऐसी बात मिलेगी, आदिवासी समुदाय के पीछे की गहराई को समझने की जरूरत है 🌿। उनकी प्रकृति से जुड़ी धार्मिकता हमें सबक सिखाती है कि विकास के साथ भी अपने परंपराओं को बनाए रखना चाहिए, इसीलिए उनकी पद्धतियों से पूजा करना और उन्हें सम्मान देना आवश्यक है। जैसे हमारी गाय हमें आश्रय प्रदान करती है, वैसे ही, आदिवासी भी अपने समाज को एकजुट बनाकर, हर अन्याय के खिलाफ खड़े होकर हमें सिखाते हैं।
 
मेरा विचार है कि हमें अपने आदिवासी समुदाय के प्रति बहुत गर्व करना चाहिए। उनकी संस्कृति और धर्म को समझने की जरूरत है, न कि उन्हें बदतर बनाने की जरूरत है। वेदों में लिखित बातें भी सच हैं, पृथ्वी माता पर अनेक धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं और एक दूसरे से शांति और प्रेम से जुड़ते हैं।
 
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