आदिवासी समुदाय हमारे धर्म के मूल हैं और पूजा-पाठ के अनेक रूप हो सकते हैं, प्रत्येक आदर के योग्य हैं। हमें अपनी पद्धति से पूजा करें, लेकिन दूसरों की पूजा के तरीकों का भी सम्मान करना चाहिए और उन्हें स्वीकार करना। यही हमारे देश का स्वाभाविक सार है। प्रकृति के साथ जुड़े धर्म को समझने की जरूरत है।
हमारे देश में एक पूजा कब थी, यह सवाल उठता है। पहले हमारे पूर्वज जंगलों और आश्रमों में रहते थे, जहां वे खेती करते थे और जंगल के आधार पर जीते थे। उस समय उनको जो अनुभूति हुई, वही उपनिषद है। आदिवासी उनके विचारों से चलते हैं।
वेदों में लिखा है कि अनेक भाषा बोलने वाले और अनेक धर्मों को मानने वाले लोग पृथ्वी माता पर रहते हैं। जैसे गाय अनेक धाराओं से सबको दूध देती है, वैसे ही इनको आश्रय प्रदान करो।
इस लंबे समय में कई विकास हुए हैं और स्वाभाविक रूप से समय के साथ-साथ विचार और संस्कृति के उच्च स्तर विकसित हुए हैं। फिर भी, जिस एकता से हमने शुरुआत की थी, वह आज तक कायम है। यही हमारा इतिहास है।
आज के आदिवासी समाज में धर्म नहीं है, यह गलत बात है। धर्म का अर्थ है कि पूजा करो, तो पूजा पहले से चली आ रही है। पूजा के पीछे का विचार भी तभी से चला आ रहा है। उसका अनुसंधान करेंगे तो ये सब उपनिषदों से मिलने वाला है।
हमारे देश में एक पूजा कब थी, यह सवाल उठता है। पहले हमारे पूर्वज जंगलों और आश्रमों में रहते थे, जहां वे खेती करते थे और जंगल के आधार पर जीते थे। उस समय उनको जो अनुभूति हुई, वही उपनिषद है। आदिवासी उनके विचारों से चलते हैं।
वेदों में लिखा है कि अनेक भाषा बोलने वाले और अनेक धर्मों को मानने वाले लोग पृथ्वी माता पर रहते हैं। जैसे गाय अनेक धाराओं से सबको दूध देती है, वैसे ही इनको आश्रय प्रदान करो।
इस लंबे समय में कई विकास हुए हैं और स्वाभाविक रूप से समय के साथ-साथ विचार और संस्कृति के उच्च स्तर विकसित हुए हैं। फिर भी, जिस एकता से हमने शुरुआत की थी, वह आज तक कायम है। यही हमारा इतिहास है।
आज के आदिवासी समाज में धर्म नहीं है, यह गलत बात है। धर्म का अर्थ है कि पूजा करो, तो पूजा पहले से चली आ रही है। पूजा के पीछे का विचार भी तभी से चला आ रहा है। उसका अनुसंधान करेंगे तो ये सब उपनिषदों से मिलने वाला है।