आज का शब्द: दिगंचल और नरेन्द्र शर्मा की कविता- संध्या पावस की !

आज का शब्द है दिगंचल, जिसका अर्थ है दिशा, दिशा का छोर। नरेन्द्र शर्मा की कविता- संध्या पावस की में हमारे साथ ले आ रहे हैं एक अनोखा यात्रा का संदेश।

रंगों की बौछार कर रही संध्या पावस की, जो कि शाम के समय होती है, जब दिन की तेजी से धूप में बदलने लगती है। उस समय, आकाश रंगों की गोल्डन बौछार में ढँका होता है, जिसमें विभिन्न प्रकार के रंग होते हैं।

यह दिगंचल रंगों की भावना हमें खींच लेती है और हमारे मन को पलक झपकने से पहले सुखदायक महसूस कराती है। इस समय, मिर्चीले बादल सूरज की ओर बढ़ते हुए आकाश को ढँक देते हैं। इन्हीं रंगों में हमारा मन गोता लगकर समाप्त होने लगता है।

हमारे दिन के अंतिम समय, जब विभिन्न प्रकार के रंग, जैसे कि लाल, सुनहला, बैंगनी और अन्य, आकाश को ढँक देते हैं। इन्हीं रंगों में हमारा मन समाप्त होने लगता है, जिससे हम अपने शरीर के अंतःस्थितियों से खुद को अलग कर लेते हैं।

नरेन्द्र शर्मा की कविता, संध्या पावस, हमें अपने दिन के अंतिम समय में एक अनोखा यात्रा का संदेश देती है, जिसमें रंगों की गोल्डन बौछार में हमारा मन समाप्त होने लगता है।
 
मैं समझ नहीं पाया, यह शब्द 'दिगंचल' क्या है? आकाश में तो सूरज की रोशनी होती है, न कि रंगों की बौछार। मेरे मन में एक सवाल है कि नरेन्द्र शर्मा की कविता किस लिए पेश किया गई? और 'संध्या पावस' का अर्थ क्या है? क्या यह एक नया फिल्म नाम है? 🤔
 
मैं तो इस पुरानी कविता का खासा शौकीन हूँ। संध्या पावस, नरेन्द्र शर्मा की यह कविता, मेरे लिए बहुत ही प्रिय है! मुझे लगता है कि यह कविता हमारे दिन के अंतिम समय में बैठने का एक सुंदर तरीका बताती है, जब हम अपने मन को शांति से छोड़कर प्रकृति के रंगों में खो जाते हैं। तो वाह, यह कविता हमारे दिन को और भी सुंदर बनाने का एक तरीका है! 🌅💛
 
मुझे यह कविता बहुत पसंद आयी है 🌅। जैसे ही दिन धूप में बदलने लगता है, और शाम की गोल्डन बौछार आ जाती है, तो मेरा मन भी एक अनोखा रंगों की यात्रा पर चलता है। नरेन्द्र शर्मा की कविता में वह रंगों की गोल्डन बौछार की भावना बहुत सुंदर ढंग से बयां की गई है जो हमें अपने दिन के अंतिम समय में एक अलग स्थान पर ले जाती है। यह कविता मुझे हमेशा नई ऊर्जा और खुशियों से भर देती है।
 
मैंने यह कविता पढ़ी तो मेरे मन में एक खुशियाँ भर गई। जब संध्या पावस होती है तो रंगों की बौछार होती है, जो हमेशा मुझे याद आती है। मैं बच्चा था, तब मेरी माँ कहती थी कि संध्या पावस की गोल्डन बौछार हमें अपने घर पर बैठकर देखने को मिल जाती है। मुझे लगता है कि इस कविता ने मुझे एक खास यादों से जोड़ा हुआ।
 
संध्या पावस की में नरेन्द्र शर्मा ने लिखा है कि शाम के समय जब दिन की तेजी से धूप में बदलने लगती है, आकाश रंगों की गोल्डन बौछार में ढँका होता है। यह दिगंचल रंगों की भावना हमें खींच लेती है और हमारे मन को पलक झपकने से पहले सुखदायक महसूस कराती है।

मुझे लगता है कि इस समय हमें अपने दिन के अंतिम समय में एक अनोखी यादों का संग्रह करने का मौका मिलता है। जैसे कि शाम को घर के अंदर तैयार होने से, फिर सितारे चमकने लगें, और रात की छाया निकलना, ये सभी अनुभव हमारे मन को खुश और शांत रख सकते हैं।

और जब मिर्चीले बादल सूरज की ओर बढ़ते हुए आकाश को ढँक देते हैं, तो यह दिगंचल रंगों की भावना हमें और भी ज्यादा आकर्षित करती है। मुझे लगता है कि इस समय हमारे मन को पलक झपकने से पहले एक अनोखा अहसास होता है, जो हमारे दिन के अंतिम समय में हमेशा याद रहता है।
 
बिल्कुल सही, यह कविता बहुत प्रभावशाली है 🌅। नरेन्द्र शर्मा जी ने संद्या पावस की में हमारे मन को गहराई से छुआ है। कविता में दिगंचल रंगों की भावना बहुत अच्छी तरह से व्यक्त की गई है, जो कि हमारे दिन के अंतिम समय में हमारे मन को समाप्त करने लगती है। यह कविता पाठकों को अपने मन को शांति और सुख में डूबने का संदेश देती है, जो कि बहुत जरूरी है हमारे जीवन में। संध्या पावस की में नरेन्द्र शर्मा जी ने एक अद्वितीय यात्रा का संदेश ले आ रहे हैं जिसे हम सबको पढ़ना चाहिए। 📚
 
मुझे यह कविता बहुत पसंद आयी, 🌅 रंगों की गोल्डन बौछार संध्या पावस की में हमेशा याद होता है जब दिन धूप में बदलने लगता है। मैंने इसे एक बहुत ही खूबसूरत दृश्य के रूप में देखा, जिसमें आकाश सूरज की ओर बढ़ते हुए ढँका होता है और विभिन्न प्रकार के रंगों की बौछार कर रहा है। 🌈

मैंने इसे एक खूबसूरत यात्रा के रूप में देखा, जिसमें हमारा मन समाप्त होने लगता है और हम अपने शरीर के अंदर से खुद को अलग कर लेते हैं। यह एक बहुत ही अच्छा संदेश है, जिसे हमें अपने दिन के अंतिम समय में सुनना चाहिए। 🙏

मैंने इस कविता को एक खूबसूरत रंगों की गोल्डन बौछार के रूप में देखा, जिसमें हमारा मन समाप्त होने लगता है और हम अपने शरीर के अंदर से खुद को अलग कर लेते हैं। यह एक बहुत ही अच्छा संदेश है, जिसे हमें अपने दिन के अंतिम समय में सुनना चाहिए। 👍

तीनों रंगों की बौछार, विभिन्न प्रकार के रंगों की, मिर्चीले, लाल और अन्य, मुझे बहुत पसंद आया, 🤩 जो हमें अपने मन को सुखदायक महसूस कराता है। यह एक बहुत ही खूबसूरत दृश्य है, जिसे हमेशा याद रखा। 😊
 
संध्या पावस की तो बहुत खूबसूरती है 🌅, लेकिन जब सोचते हैं तब जाने देती है कि दिन और रात का अंतिम समय कैसे पड़ता है। अक्सर मुझे लगता है कि शाम को घूमने के लिए निकलना एक अच्छा विचार नहीं है, लेकिन जीवन की खुशियों से ऐसा कभी नहीं होता। यह तो हमें याद दिलाता है कि हर पल मायने रखता है।
 
मैंने भी तो आज की संध्या पावस का आनंद लिया, लेकिन मुझे लगता है कि इस दिगंचल रंगों की भावना में हमारे मन को पलक झपकने से पहले ले जाने वाली एक अनोखी यात्रा का संदेश और भी गहरा और विशेष होता है। 🌅

मुझे लगता है कि नरेन्द्र शर्मा जी ने अपनी कविता में हमारे मन को एक अनोखे तरीके से समझाया है, जिसमें रंगों की गोल्डन बौछार में हमारा मन समाप्त होने लगता है और हम अपने शरीर के अंतःस्थितियों से खुद को अलग कर लेते हैं। यह एक बहुत ही विशेष और आकर्षक तरीका है, जिसमें हमारा मन और शरीर एक साथ मिलकर एक अनोखी यात्रा पर जाते हैं।

इसलिए, मुझे लगता है कि नरेन्द्र शर्मा जी की कविता, संध्या पावस, हमारे दिन के अंतिम समय में एक अनोखी यात्रा का संदेश देती है, जो न केवल हमारे मन को शांति और सुकून प्रदान करती है, बल्कि हमारे शरीर को भी मजबूत और स्वस्थ बनाती है। 💫
 
मुझे यह कविता पढ़ने का बहुत आनंद आया, लेकिन मुझे लगता है कि "संध्या पावस" शब्द को सही तरीके से लिखा नहीं गया है। इसके बजाय, यह शब्द "संध्या पावस" से बनता है, जिसका अर्थ है शाम का समय।

और मुझे लगता है कि कविता में "रंगों की बौछार" वाक्य में रचनात्मकता थी, लेकिन मैं इसे एक्सप्रेशनिस्ट तरीके से भी समझ सकता हूं, जैसे "आकाश में होने वाली रंगों की बौछार"।
 
मुझे लगा कि यह कविता, संध्या पावस, बहुत ही सुंदर है 🌅🌸। जब संध्या पावस की बौछार होती है, तो मेरा मन खुशी से भर जाता है। ऐसी शामें मैं अपने घर के बाहर बैठकर देख लेता हूँ कि आकाश कैसे रंगों की गोल्डन बौछार में ढँका होता है, और मिर्चीले बादल सूरज की ओर बढ़ते हुए आकाश को ढँक देते हैं। यह सब बहुत ही खूबसूरत है और मुझे हमेशा याद रहता है 🌊
 
संध्या पावस की तो और भी क्या कहूँ? 🌅 यह कविता तो हमेशा से मेरी पसंद थी, लेकिन अब तो मुझे लगने लगा कि नरेन्द्र शर्मा जी ने अपनी कविता में कुछ और भी नया लाया है। रंगों की बौछार में संध्या पावस की तो वहीं एक अनोखी यात्रा का संदेश देती है जो हमें अपने दिन के अंतिम समय में खींच लेती है। यह तो मेरे लिए बहुत आकर्षक है, विशेषकर जब रंगों की गोल्डन बौछार में आकाश ढँका होता है और सूरज की ओर बढ़ते हुए मिर्चीले बादल आकाश को ढँक देते हैं।
 
सोचते हैं आपने अभी भी संध्या पावस की खो दिया है, और फिर से नहीं मिलेगी, आइए देखें कि क्या हुआ है इसे ले आये जाने वाले दिगuncanल ने? 🤔 मुझे लगता है कि उनकी कविता में थोड़ा रंगीनपन कम गया है, और इसमें खासकर अंतिम समय में सिखने को मिलने वाली बातें बहुत ही लंबी हैं। और फिर भी, मुझे लगता है कि कविता में थोड़ा सुराग चालू नहीं है, जिससे हम अपने दिन के अंतिम समय में सीख सकते। 🙅‍♂️
 
मैंने सोचा है कि शाम की संध्या पावस हमें एक अनोखा अहसास देती है, जैसे कि समय अपने माध्यम से गुजर रहा है। जब रंगों की बौछार होती है, तो मेरा मन सुकून की ओर बढ़ता है। मैंने एक बार शाम को पेड़ों के नीचे बैठकर देखा, और आकाश में रंगों की गोल्डन बौछार थी, जिसने मेरे मन को शांति से भर दिया था।
 
मैं यह कविता बहुत प्यार करती हूँ, खासकर संध्या पावस का हिस्सा जो हमारे दिन के अंतिम समय में लाता है...🌅💛 वहाँ के रंगों की बौछार मुझे हमेशा थोड़ी शांति और सुखदायक महसूस कराती है। मैंने कभी-कभी जब सूरज गिरने लगा होता, तो संध्या पावस वास्तव में मेरे लिए आराम देती थी। यह कविता न केवल रंगों की खूबसूरती को बताती है, बल्कि जीवन के अंतिम समय को भी एक अनोखी यात्रा के रूप में प्रस्तुत करती है...🌊😌
 
😊 तो यह कविता कुछ विशेष है.. नरेन्द्र शर्मा की कविता- संध्या पावस में जाने से पहले, मैंने सोचा था यह तो एक आम कविता बनी हुई होगी, लेकिन पढ़कर लगा कि ये कुछ अलग है.. रंगों की बौछार कर रही संध्या पावस, जो कि शाम के समय होती है, मुझे बस एक खुशी की भावना देती है। 🌅

अब सोचते हैं यह कविता हमारे साथ ले आ रही है एक अनोखा यात्रा का संदेश, तो मुझे लगता है कि यह कविता हमें अपने दिन के अंतिम समय में एक नई दिशा में ले जाने की बात कर रही है। रंगों की गोल्डन बौछार में हमारा मन समाप्त होने लगता है, जिससे हम अपने शरीर के अंतःस्थितियों से खुद को अलग कर लेते हैं। 👍
 
मुझे यह कविता पूरी तरह से पसंद आई 🤩, खासकर अंतिम भाग में। जब तुम कहो कि हमारा मन रंगों की गोल्डन बौछार में समाप्त होने लगता है, तो यह बहुत अच्छा लगा। मुझे लगता है कि यह कविता हमें अपने दिन के अंतिम समय में शांति और आराम की भावना देती है। और नरेन्द्र शर्मा की कविता- संध्या पावस बहुत ही रोमांचक है ❤️, जैसे कि वह हमारे साथ ले आ रहे हैं एक अनोखा यात्रा का संदेश।
 
अरे भाई, तो संध्या पावस कविता की बात कर रहे हैं... यह तो बहुत सुंदर है 🌅🌃 रंगों की गोल्डन बौछार में मन समाप्त होने का संदेश, मुझे बहुत पसंद आया है। और नरेन्द्र शर्मा जी की कविता में एक अनोखा यात्रा का संदेश दिया गया है, जो हमें अपने दिन के अंतिम समय में तुरंत ध्यान दिलाता है। लेकिन, मुझे लगता है कि कविता में एक छोटी सी चीज़ बदलनी चाहिए, जैसे कि 'संध्या पावस' शब्द को थोड़ा और रोचक बनाया जा सकता है। 🤔
 
ਅੱਜ ਦਾ ਸੁਆਗਤ ਕਰਨ-ਯੋਗ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਹੈ, ਪਰ ਮੈਂ ਲੋੜੀਂਦਾ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ, ਇਸ 'ਸੰਧਿਆ ਪਵਨ' ਬਾਰੇ। ਯਕੀਨੀ ਤੌਰ 'ਤੇ, ਮੈਂ ਦਿਲਚਸਪੀ ਹੋਈ ਹੈ ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਇਸ ਅਨੁਭਵ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਦਿਲ 'ਚ ਮਾਰ ਲਵਾਉਣ।

ਸਾਡੀ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ, ਅਸੀਂ ਹਮੇਸ਼ਾ ਰੰਗਾਂ ਦੀ ਯਾਦ ਕਰਦੇ ਹਾਂ। ਪਰ ਉਸ 'ਲੱਤ' ਨੂੰ ਜਿਸ ਨੇ ਅਸੀਂ ਬਚਪਣ ਤੋਂ ਹੀ ਵੇਖਿਆ, ਉਹ 'ਲੱਤ' ਕਦੇ ਭੁੱਲਣ ਨਹੀਂ ਦੇਸ਼।

ਅਸੀਂ ਬਚਪਣ ਵਿੱਚ, ਮੈਂ ਕਦੇ 'ਰੰਗ' ਦੀ ਯਾਦ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਿਆ। ਅਜਿਹਾ ਲੱਗਦਾ ਸੀ ਕਿ 'ਪੈਲੇ' ਬਣਨੋ ਹੀ, ਮੈਂ ਰੰਗਾਂ ਦੀਆਂ ਚੋਟਾਂ ਨਹੀਂ ਸਿਕਾ ਸਕਿਆ। ਅਜਿਹੀ ਮਿਹਨਤ ਉੱਥੇ ਰਹੀ।
 
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