आज का शब्द है दिगंचल, जिसका अर्थ है दिशा, दिशा का छोर। नरेन्द्र शर्मा की कविता- संध्या पावस की में हमारे साथ ले आ रहे हैं एक अनोखा यात्रा का संदेश।
रंगों की बौछार कर रही संध्या पावस की, जो कि शाम के समय होती है, जब दिन की तेजी से धूप में बदलने लगती है। उस समय, आकाश रंगों की गोल्डन बौछार में ढँका होता है, जिसमें विभिन्न प्रकार के रंग होते हैं।
यह दिगंचल रंगों की भावना हमें खींच लेती है और हमारे मन को पलक झपकने से पहले सुखदायक महसूस कराती है। इस समय, मिर्चीले बादल सूरज की ओर बढ़ते हुए आकाश को ढँक देते हैं। इन्हीं रंगों में हमारा मन गोता लगकर समाप्त होने लगता है।
हमारे दिन के अंतिम समय, जब विभिन्न प्रकार के रंग, जैसे कि लाल, सुनहला, बैंगनी और अन्य, आकाश को ढँक देते हैं। इन्हीं रंगों में हमारा मन समाप्त होने लगता है, जिससे हम अपने शरीर के अंतःस्थितियों से खुद को अलग कर लेते हैं।
नरेन्द्र शर्मा की कविता, संध्या पावस, हमें अपने दिन के अंतिम समय में एक अनोखा यात्रा का संदेश देती है, जिसमें रंगों की गोल्डन बौछार में हमारा मन समाप्त होने लगता है।
रंगों की बौछार कर रही संध्या पावस की, जो कि शाम के समय होती है, जब दिन की तेजी से धूप में बदलने लगती है। उस समय, आकाश रंगों की गोल्डन बौछार में ढँका होता है, जिसमें विभिन्न प्रकार के रंग होते हैं।
यह दिगंचल रंगों की भावना हमें खींच लेती है और हमारे मन को पलक झपकने से पहले सुखदायक महसूस कराती है। इस समय, मिर्चीले बादल सूरज की ओर बढ़ते हुए आकाश को ढँक देते हैं। इन्हीं रंगों में हमारा मन गोता लगकर समाप्त होने लगता है।
हमारे दिन के अंतिम समय, जब विभिन्न प्रकार के रंग, जैसे कि लाल, सुनहला, बैंगनी और अन्य, आकाश को ढँक देते हैं। इन्हीं रंगों में हमारा मन समाप्त होने लगता है, जिससे हम अपने शरीर के अंतःस्थितियों से खुद को अलग कर लेते हैं।
नरेन्द्र शर्मा की कविता, संध्या पावस, हमें अपने दिन के अंतिम समय में एक अनोखा यात्रा का संदेश देती है, जिसमें रंगों की गोल्डन बौछार में हमारा मन समाप्त होने लगता है।