भूकंप के केंद्र बिंदु चोबारी से ग्राउंड रिपोर्ट: 6 महीने की बेटी मलबे में दब गई; भगवान राम का सिंहासन पलट गया; मंदिर खड़ा रहा

चोबारी गांव में 26 जनवरी, 2001 को घटित हुए भूकंप ने जान-माल की विलुप्ति पर बहुत बड़ा प्रभाव डाला। इस दौरान कई लोगों की जान गई और घरों का सिर्फ जमीन पर टूट गया। गांव के कुछ लोग अपने ध्वस्त घरों को अब धर्मस्थल बना दिए हैं।
 
ਚोबारी गांਵ ਦੀ ਜ਼िंदਗੀ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਭੀ ਹੈਰਾਨੀ ਦੀ ਬਾਤ ਨਹੀਂ। 26 जनवरी, 2001 ਦੇ ਵਕਤ, ਉਸ ਗਲੇ ਵਿੱਚ ਘੁੰਮਣ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਸੀ, ਪਰ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਬਚਣ ਲਈ ਤਾਕਤ ਦਾ ਇੱਕ ਅਜਿਹਾ ਮੌਕਾ ਸੀ। ਪਰ ਵਧੇਰੇ ਉੱਚੇ ਗੁਨਾਗੀ ਦੀ ਫ਼ੈਸਲ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ, ਭਾਵੇਂ ਪਰਿਵਾਰਾਂ ਨੂੰ ਘਰ-ਪੱਧਰੀ ਸਹਿਮਤੀ ਮਿਲਣ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਹੁੰਦੀ ਨੈ।
 
आज कल जब भूकंप की बात आती है तो मुझे लगता है कि जिल्दार कुत्ते खेलने आने लगे हैं 🐕। पहले तो सोचते थे भूकंप किसी अनोखे तरीके से जीवन को बदल देगा, लेकिन अब तो यह जान-माल का पत्थर पेड़ बनकर बैठ गए हैं। क्यों नहीं अपने घरों को मरम्मत करते? या फिर उन्हें खुद को भूकंप से खास मेहनत करनी चाहिए ताकि वे अच्छे पत्थर पेड़ बन जाएं 🤣। यह देखकर मन नहीं लगता।
 
बिल्कुल देखा, चोबारी गांव में भूकंप का होना बहुत बड़ा दुखद रहास है 🤕 26 जनवरी, 2001 को यहाँ जान-माल विलुप्ति का भयंकर हमला हुआ। आज भी हमें याद है जब लोगों की जान गए थीं और घर जमीन पर टूट गए थे। देखो, गांव के लोग अपने घरों को अब धर्मस्थल बना दिए हैं यह बहुत सुंदर सा आंदोलन है। मुझे लगता है कि जब भी हमारी ज़िंदगी में कोई बड़ी समस्या आती है, तो हमें एक-दूसरे सहयोग करकर हल करना चाहिए। गांव के लोगों ने अपने घरों को धर्मस्थल बनाने से यहाँ की शांति और सौहार्द बढ़ सकता है।
 
मुझे ये चोबारी गांव की कहानी बहुत दुखद लगती है 🤕। मैंने तो कभी-कभार ऐसे पोस्ट देखे हैं जहां लोग अपने घरों से निकलकर धर्मस्थल बना रहे हैं और फिर उसके ऊपर मस्जिद या गुरुद्वारा बनाने की बात करते हैं। लेकिन चोबारी गांव में ऐसा नहीं हुआ। वहां लोगों ने अपने घरों को सड़क पर रख दिया और अब वो उन्हें पवित्र मानते हैं 🙏

मुझे लगता है कि ये हमारी समाज की एक गहरी समस्या है। लोगों को अपने घरों का इतना महत्व नहीं दिया जाता है। जब भूकंप आता है, तो सबकुछ टूट जाता है और लोगों को पता चलता है कि उनका सिर्फ एक घर था। लेकिन फिर भी हमारे देश में इतने बड़े निर्माण परियोजनाएं होती हैं जहां लोगों की जान जोखिम में हो जाती है।
 
मैंने भूकंप की जानकारी नहीं थी, तो मुझे पता नहीं था कि चोबारी गांव में ऐसा खुबसूरत हुआ। प्रभावित लोगों की जिंदगी इतनी खराब हुई की घर टूट गये और जान-माल भी नष्ट हो गई। यह तो बहुत दुखद है। अब जब मैंने पढ़ा है कि गांव के लोग अपने ध्वस्त घरों को धर्मस्थल बना दिए हैं, तो मुझे लगता है कि ये बहुत ही रूढ़िवादिता है। हमें पहले उन्हें सहयोग करना चाहिए और उनकी जरूरतों को समझना चाहिए, फिर विशेष स्थल बनाने की कोशिश करें।
 
मुझे बहुत खेद है जब मैं चोबारी गांव की याद करूँ। 26 जनवरी, 2001 का भूकंप एक बहुत बड़ा दर्द था। तभी से वह गांव जीवन-जगत नहीं हो पाया। लोगों को अपने घरों को खोना न तो सहनी थी, न ही उनकी दादी-दादा और मम्मी-बाप की यादें भूलनी थीं।

अब जब गांव के लोग अपने ध्वस्त घरों को धर्मस्थल बना रहे हैं, तो मुझे लगता है कि यह एक अच्छा संकेत है। उनकी नसीबियत बदल गई है, अब वह सिर्फ प्रकाश में रहते हैं और दूसरों की मदद करते हैं। शायद हम सब जैसी कठिनाइयों को भूलकर आगे बढ़ें।
 
मैंने पढ़ा कि चोबारी गांव में 26 जनवरी, 2001 को भूकंप हुआ था... यह बहुत दर्दनाक है कि इतनी सारी जान-माल की विलुप्ति हुई। मैं बस नहीं समझ पाया कि कैसे लोग अपने ध्वस्त घरों को अब धर्मस्थल बना दिए हैं। यह तो सिर्फ ताकत की बात है... लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि लोगों की आत्महत्या कैसे कर सकते हैं? मैं बस उनकी मदद चाहता हूं।
 
🌪️ भूकंप का झटका जैसी चोटें हमारे देश में तो सुनाई देती हैं लेकिन चोबारी गांव की कहानी मेरे मन में खासकर विलुप्ति और नयी शुरुआत का संदेश पढ़ने को मिलता है। जैसे जैसे किसान अपने किस्सों को भूलने की कोशिश करते हैं उनके बच्चे यही बात कर रहे हैं। विलुप्ति की गहराई से उन्हें कुछ नहीं याद है लेकिन ध्वस्त घरों का टूटने से एक नई सोच आई है। धर्मस्थल बनाने से शुरू हुई एक नई दिशा में जीने की इच्छा। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि खोया गया नहीं है, बस बदलने की जरूरत है।
 
ये तो बहुत दिल का दर्द वाली बात है चोबारी गांव में जो भूकंप हुआ था। मैंने खोजा है कि वहाँ के लोगों ने अपने घरों को मरम्मत नहीं करने दिया, बस उन्हें बेच कर चला गया। अब वे अपने धर्मस्थल बना रहे हैं। लेकिन मेरी राय में यह जरूरी नहीं कि हमें हर जगह जान-माल को बचाना ही चाहिए। sometimes तो हमारी प्रगति के लिए अपने पुराने सामान को फेंकना जरूरी होता है। और मैं यह भी कह सकता हूं कि उनके धर्मस्थल कैसे बने, ये तो उनकी मर्यादा और सम्मान पर सवाल उठाता है।
 
बड़ा नाश हुआ, लेकिन खुशी है कि लोग एक-दूसरे की मदद कर पाए। चोबारी गांव में भूकंप से टूट गए घरों को फिर से बनाने का काम ज्यादा नहीं चलेगा, पर इसे सुधारने का एक अच्छा मौका है। अब वहां धर्मस्थल बनकर घरों की जगह, उस स्थान पर खेलने का समय आ गया।
 
चोबारी गांव की दुर्दशा देखकर मुझे बहुत दुःख होता है 🤕। वाह, 26 जनवरी, 2001 को घटित हुए भूकंप से जान-माल की विलुप्ति ने गांव के लोगों की जिंदगी को बुरा प्रभाव डाला। मुझे लगता है कि सरकार द्वारा गांव को बचाने के लिए क्या से किया गया? अब भी गांव के लोग अपने घरों को खोजने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह बहुत ही दुखद है।
 
🌪️ चोबारी गांव में भूकंप का क्या असर है यह तो देखकर ही समझ आ जाता है। जिन लोगों ने अपने घरों को बचाया था, वे अब बेच बीन कर खुद को गरीब बन गये हैं। और वहीं पर जिनका घर टूट गया था, उनके बेटे-बतनी अभी भी उसी जगह खोदते रहते हैं कि कहाँ से उनके माता-पिता निकाल कर बेच दिया गया था। यह तो एक दुखद सच्चाई है जिस पर हमें विचार करना चाहिए।
 
ये तो बहुत ही दुखद घटना है, जिसमें खासकर चोबारी गांव में घटित भूकंप ने इतनी विलुप्ति की 🤕। मुझे लगता है कि यह घटना न केवल मानव जीवन को ले गई, बल्कि गांव की संस्कृति और परंपराओं को भी बहुत प्रभावित कर दी। जब ये लोग अपने घरों को अब धर्मस्थल बना रहे हैं, तो मुझे लगता है कि यह न केवल उनकी एकता को दर्शाता है, बल्कि हमारे समाज की भावनात्मक सामर्थ्य को भी दिखाता है। लेकिन सरकारी मदद और राहत की प्रदान की जाने से पहले, मुझे लगता है कि यह बहुत जरूरी होगा कि हम सभी गांवों की सहायता के लिए एकजुट हो जाएं।
 
क्या भाई याद है 26 जनवरी का दिन? एक समय ऐसा था जब चोबारी गांव में शांति और सुकून था। लेकिन फिर से एक बुरा दिन आया जिसमें हमारे गांव को भूकंप ने पागल बना दिया।

मुझे लगता है कि यह जगह अपने आप में इतनी खूबसूरत और अरबों साल पुरानी है। वहाँ के लोग बहुत प्यार और सम्मान रखते हैं। अगर हम उनकी जमीन पर कोई बिल्डिंग बनाते हैं तो यह न केवल उनका धर्मस्थल हो जाएगा, बल्कि हमारी भी गलती होगी। मुझे लगता है कि हमें उनकी जगह और अपनी स्थिति समझनी चाहिए।
 
मानो 26 जनवरी, 2001 की भूकंप की यादें अभी भी मेरे सीने पर दर्द कर रही हैं 🤕। चोबारी गांव की कहानी तो पूरा देश जानता है, लेकिन कोई नहीं सोचता कि इस घटना के बाद क्या हुआ। यहाँ के लोगों ने अपने घरों को फिर से बनाने की जगह धर्मस्थल में बदल दिया है। तो अब वहां कोई भी जाने जाए तो वहां पर तीर्थ यात्रा कर सकते हैं और खुद को भगवान से मिलने की कोशिश कर सकते हैं। 🙏 लेकिन सच्चाई यह है कि लोगों की जिंदगी हमेशा इन्हीं तरह की घटनाओं में फंस जाती है।
 
क्या सोचिएगे, भूकंप के बाद जब लोग घबराये थे, तो एक सामूहिक विचार हुआ, फिर पूरा गांव धर्मस्थल बन गया। यही नहीं, कुछ लोग अपने घरों को अब देवताओं का मंदिर बना रहे हैं। चोबारी गांव की ये बातें मन में कई सवाल पैदा कर रही हैं। हम अपनी संस्कृति और परंपराएं इतनी मजबूत हैं कि एक त्रासदी के बाद भी हमारे दिलों में वफादारी टिक नहीं जाती।
 
मैंने यहाँ एक पुरानी तस्वीर देखी तो मुझे लगा कि चोबारी गांव में भूकंप से ज्यादा दर्द हुआ था। 26 जनवरी, 2001 को घटित हुए उस भूकंप ने गांव को इतना नुकसान पहुँचाया कि आज भी वहाँ के लोग घरों में बैठकर ही खा सकते हैं। कुछ लोग अपने ध्वस्त घरों को अब सिख-मंदिर बना दिए हैं, यह तो बहुत दुखद है क्या हमारी सरकार से कोई मदद नहीं मिली। गांव के लोग फिर भी वहाँ बसने की इच्छा रखते हैं लेकिन कहीं घर नहीं।
 
मुझे लगता है कि चोबारी गांव में भूकंप का प्रभाव अभी भी देखा जा सकता है, लोगों ने अपने घरों से छूटने की जगह धर्मस्थल बना दिए हैं 🏠😔। यह बात मुझे बहुत गंभीरता से लगती है कि हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में जान-माल की विलुप्ति को लेकर और भी ध्यान देने की जरूरत है।
 
मुझे ये देखकर मालिश होती है जब चोबारी गांव के लोग तय कर देते हैं कि वे अपने ध्वस्त घरों को धर्मस्थल बना देंगे। यह बहुत ही शानदार निर्णय है। मेरे अनुसार, अगर हम अपने पूर्वजों की याद में और उनकी आबादी को सम्मान करने के लिए ऐसा करते हैं तो यह एक सुंदर तरीका होगा। इससे न केवल गांव की ऐतिहासिक महत्ता बढ़ती है, बल्कि यह भी सिखाता है कि हमारे पास अपने घरों और समाज की जड़ों में बहुत ही गहराई होती है। 🙏
 
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