सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि विवेक (समझदारी) ज्ञान से अलग होता है। यह समझना जरूरी है कि जब हम बोलते हैं, तो कब हमें बोलना चाहिए और कब हमें खामोश रहना चाहिए।
विवेक यह जानना है कि कानून के शब्दों पर कब जोर देना है, और कब उसके मकसद को समझना है। ज्ञान किताबों, शायद क्लासरूम, और ट्रेनिंग से जल्दी हासिल किया जा सकता है, लेकिन उसे अनुभव, गलतियों और लगातार सोचने-समझने से बहुत धीरे-धीरे आकार देता है।
सीजेआई ने कहा है कि हम ऐसे जमाने में रह रहे हैं जहां तुरंत राय बन जाती है, और बिना इंतजार किए जवाब की उम्मीद की जाती है। ऐसी दुनिया में समझदारी दुर्लभ हो गई है और इसलिए यह बहुत कीमती है।
जहां दक्षता निष्पक्षता के साथ मुकाबला करती है, जहां नंबरों में मापी गई प्रोफेशनल सफलता अजीब तरह से खोखली लगती है, ऐसे पलों में, सिर्फ नियम आपका मार्गदर्शन नहीं करेंगे, बल्कि आपकी समझदारी करेगी।
विवेक यह जानना है कि कानून के शब्दों पर कब जोर देना है, और कब उसके मकसद को समझना है। ज्ञान किताबों, शायद क्लासरूम, और ट्रेनिंग से जल्दी हासिल किया जा सकता है, लेकिन उसे अनुभव, गलतियों और लगातार सोचने-समझने से बहुत धीरे-धीरे आकार देता है।
सीजेआई ने कहा है कि हम ऐसे जमाने में रह रहे हैं जहां तुरंत राय बन जाती है, और बिना इंतजार किए जवाब की उम्मीद की जाती है। ऐसी दुनिया में समझदारी दुर्लभ हो गई है और इसलिए यह बहुत कीमती है।
जहां दक्षता निष्पक्षता के साथ मुकाबला करती है, जहां नंबरों में मापी गई प्रोफेशनल सफलता अजीब तरह से खोखली लगती है, ऐसे पलों में, सिर्फ नियम आपका मार्गदर्शन नहीं करेंगे, बल्कि आपकी समझदारी करेगी।