CJI: मुख्य न्यायाधीश बोले- विवेक ज्ञान से अलग है, कानून के शब्दों और मकसद को समझना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि विवेक (समझदारी) ज्ञान से अलग होता है। यह समझना जरूरी है कि जब हम बोलते हैं, तो कब हमें बोलना चाहिए और कब हमें खामोश रहना चाहिए।

विवेक यह जानना है कि कानून के शब्दों पर कब जोर देना है, और कब उसके मकसद को समझना है। ज्ञान किताबों, शायद क्लासरूम, और ट्रेनिंग से जल्दी हासिल किया जा सकता है, लेकिन उसे अनुभव, गलतियों और लगातार सोचने-समझने से बहुत धीरे-धीरे आकार देता है।

सीजेआई ने कहा है कि हम ऐसे जमाने में रह रहे हैं जहां तुरंत राय बन जाती है, और बिना इंतजार किए जवाब की उम्मीद की जाती है। ऐसी दुनिया में समझदारी दुर्लभ हो गई है और इसलिए यह बहुत कीमती है।

जहां दक्षता निष्पक्षता के साथ मुकाबला करती है, जहां नंबरों में मापी गई प्रोफेशनल सफलता अजीब तरह से खोखली लगती है, ऐसे पलों में, सिर्फ नियम आपका मार्गदर्शन नहीं करेंगे, बल्कि आपकी समझदारी करेगी।
 
मेरे दोस्त, यह बात बहुत सच है 🤔 जस्टिस सूर्यकांत की। हमें कभी-कभी बोलना चाहिए और कभी-कभी खामोश रहना चाहिए। मैंने अपने दोस्तों से बात की और उन्होंने बताया कि जब वह डॉक्टर होते थे, तो हमेशा उनका ध्यान रोगी की बात पर रहता था। लेकिन जब वे अब तक क्लिनिक में आते हैं, तो वे पूछते हैं कि अपने मरीजों को सही सलाह देने के लिए हमें सोच-विचार करने का समय कब दिया जाए। यह बहुत सच है कि समझदारी सीखना मुश्किल है, लेकिन वह बहुत जरूरी है।
 
मुझे यह बात बहुत पसंद आयी 🤩, जस्टिस सूर्यकांत की तो हमेशा इतनी सच्चाई बोलते हैं! विवेक और ज्ञान में अंतर समझना जरूरी है, खासकर जब समाज तेजी से बदलता है। लोगों को यह सीखना चाहिए कि कब बोलना है और कब शांत रहना है। यह तो आसान नहीं होता, लेकिन जीवन में समझदारी के बिना कोई भी निर्णय गलत होगा। मैं समझता हूँ कि अनुभव से ज्ञान मिलता है, लेकिन यही reason है कि हमें और अधिक सीखने की जरूरत है। तो चलिए, सबको एक-एक करके समझदारी की दिशा में बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। 👍
 
मैंने देखा कि लोग तेजी से बोल रहे हैं और सोचते नहीं हैं। विवेक ज्ञान से अलग है और हमें उसे सीखना चाहिए। लेकिन आजकल लोग तो मेरे पास आने के बाद ही फोन करते हैं, और पूछते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। मुझे लगता है कि अगर हमें अनुभव, गलतियों और सोचने-समझने का मौका मिलता है, तो हम समझदार लोग बन सकते हैं।
 
मेरा विचार है कि जस्टिस सूर्यकांत ने बिल्कुल सही कहा है। आजकल लोग बहुत जल्दी बोलते हैं और कभी सोचते नहीं। विवेक सिर्फ ताकतवर करने की चाल है, यह समझदारी सीखने की कला है। हमें अपने शब्दों का मायना समझना चाहिए, न कि बस बोलना या खामोश रहना।
 
मैंने पढ़ा है कि सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि विवेक और ज्ञान अलग-अलग चीजें हैं। यह तो समझ में आता है, लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि हमारी दुनिया में बोलने से पहले खामोश रहने का समय बहुत कम हो गया है।

मैंने अपने बच्चों को पढ़ाया है कि कैसे एक गलती करनी चाहिए और कब न होना चाहिए, लेकिन उन्हें यह नहीं समझाया है कि कभी-कभी तो बोलने से पहले खामोश रहना भी जरूरी है। मुझे लगता है कि हमारे समय में कानूनों और नियमों को याद रखना बहुत आसान है, लेकिन समझदारी और अनुभव को दूसरा नहीं तय किया जा सकता।

मैंने सुना है कि जहां दक्षता और निष्पक्षता का खेल होता है, वहां तो नियमों की जरूरत नहीं होती। मुझे लगता है कि हमें अपनी समझदारी पर भरोसा करना चाहिए, न कि सिर्फ नियमों पर।
 
अरे भाई, यह तो सच में बहुत महत्वपूर्ण बात कह रहे हैं जस्टिस सूर्यकांत न्यायाधीश के। विवेक और ज्ञान का फर्क सोच समझकर पहचानना बहुत जरूरी है, खासकर जब हम बोलते हैं तो हमें यह सोचना चाहिए कि कब बोलना चाहिए और कब शांत रहना चाहिए।

मुझे लगता है कि आज की दुनिया में लोग तुरंत राय बनाने और जवाब की उम्मीद करने की आदत दूर नहीं कर सकते। इसके बाद समझदारी बहुत जरूरी होती है, जो हमें गलतियों से सिखाती है और अनुभव से हमारा ज्ञान बढ़ाती है।

मैं तो पूरी तरह से सहमत हूँ कि नियम का मार्गदर्शन जरूरी होता है, लेकिन समझदारी भी बहुत महत्वपूर्ण होती है जब हम अपने फैसलों और राय बनाते हैं। 🤔💡
 
मैंने पहले भी कहा था कि ज्ञान और समझदारी का अंतर समझना बहुत जरूरी है। तो अब जस्टिस सूर्यकांत ने भी यही बात कही है, लेकिन मेरा ख्याल है कि हमें इसके पीछे कारण समझने की जरूरत है। क्या हमारी शिक्षा प्रणाली इतनी अच्छी नहीं है कि हमें समझदार बनने के लिए पर्याप्त मौका देती है? 🤔

और मैं सीजेआई की बात से सहमत हूँ, ज्ञान और अनुभव का अंतर बहुत जरूरी है। हमें ऐसे समय में रहकर नहीं चाहते कि हम तुरंत राय बनाएं और लोगों को जवाब देने की उम्मीद करें। 🙅‍♂️

लेकिन मेरा एक सवाल है - क्या हमारी समाज में समझदारता को बढ़ावा देने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है? 🤷‍♂️
 
अरे दोस्त, ये तो सच तो सच है! हम लोग ज्यादा बात क्यों करते हैं? कभी-कभी पूरा फायदा उठाकर कोई निर्णय लेने से पहले थोड़ा सोचें... समझदारी कितनी जरूरी है! मैंने तो मोबाइल के बंद होने पर भी कुछ देर रुक जाता हूं, क्योंकि फिर मुझे सोचने का मौका मिलता है। विवेक और समझदारी सीखना हमें बहुत आगे ले जा सकता है... 🤔
 
😊 समझदारी ज्ञान की तरह तो अलग है... कभी सोचो क्या बोल रहे हैं और कब रख दो। यह समझना जरूरी है कि जब हम बातें करते हैं तो कहीं भी सही और गलत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। कानूनी शब्दों पर जोर देना या समझना मुश्किल है। ज्ञान खिताबों से निकलता है, लेकिन अनुभव, गलतियां और लगातार सोचने-समझने से। हम तो ऐसे जमाने में रह रहे हैं जहां तुरंत राय बन जाती है और जवाब की उम्मीद होती है। समझदारी आज बहुत दुर्लभ हो गई है, इसलिए यह बहुत कीमती है। ताकि जब तुम्हें नियमों से मार्गदर्शन करना हो, तो याद रख की समझदारी तुम्हारा सहायक होगी। 🤔
 
अरे, यह तो सच है कि हमारे देश में बहुत जल्दी राय बन जाती है, और फिर गलतियाँ करते रहते हैं 🤦‍♂️। परन्तु सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की बात समझदारी से समझनी चाहिए, विवेक और ज्ञान अलग-अलग हैं तो लोग अक्सर गलतियाँ करते रहते हैं।

जैसे हमें किताबों से ज्ञान मिल सकता है लेकिन अनुभव के बिना वह समझा नहीं जा सकता। फिर भी हमें अपनी गलतियों से सीखना चाहिए, और सही समय पर सही स्थान पर खड़े रहना चाहिए। मुझे लगता है कि अगर हम ऐसा करें तो हमारी दुनिया में समझदारी बढ़ सकती है। 🤓
 
मैंने ये पढ़ा तो बस यकीन नहीं है कि लोग सब सही समझ रहे हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने बोला है कि विवेक और ज्ञान अलग होते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि लोग सिर्फ शब्दों में मगन रहते हैं और समझदारी की बात नहीं करते। उन्हें यकीन नहीं है कि कितनी बार गलतियां होती हैं और हमें कितनी बार सोचना-समझना चाहिए। मेरी तो लगती है कि ज्ञान जल्दी में मिलता है, लेकिन वास्तविकता को समझने में बहुत समय लगता है। और ये दुनिया हमारे पास नंबरों और रिकॉर्ड से भरी हुई है, बस कि तुम्हें नियमों का पालन करना है... 🤔
 
मेरे दोस्त, यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है जस्टिस सूर्यकांत ने कही है। तो तुमने कभी नहीं सोचा था कि हमारे समाज में तुरंत राय बनाने और जवाब की उम्मीद करने की यह प्रवृत्ति इतनी बड़ी हो गई है?

मुझे लगता है कि हमें समझदारी की जरूरत है, लेकिन हमारे दैनिक जीवन में यह बिल्कुल न होता है। हम तो बस अपने शब्दों पर चल पड़ते हैं और जल्दी से जवाब चाहते हैं। लेकिन यह समझना कि हमें कब बोलना चाहिए और कब खामोश रहना चाहिए, यह बहुत मुश्किल है।

मुझे लगता है कि जिस तरह तुम्हारे बच्चे को पढ़ाई करनी है, उसी तरह हमें भी पढ़ना-लिखावा होना चाहिए, लेकिन हमें समझदारी सीखने में समय देना चाहिए। और जब हम बात करते हैं, तो अपने शब्दों को समझने की जरूरत है, नहीं तो हम खुद गलती कर लेते हैं।

अरे, यह एक बहुत बड़ी बात है जिस पर हमें विचार करना चाहिए। अगर हम समझदारी सीखते हैं और अपने शब्दों को समझने की कोशिश करते हैं, तो हमारे जीवन में बदलाव आ सकता है।
 
मैने सोचा कि आजकल लोग बोलते समय बहुत जल्दी बोल जाते हैं और फिर दूसरों पर दबाव डालते हैं। वो नहीं समझते की कानून की तारीफ करने से कुछ भी नहीं होता। तुम्हें पता है कि जब तुम खामोश हो, तो तुम्हारी बात माफ कर दी जाती है।

मैंने सोचा कि विवेक कितना जरूरी है। अगर हम समझदार हो जाएं, तो हम अपने निर्णय लेने में भी सही होते हैं। लेकिन आजकल लोग तुरंत कह देते हैं कि यह सही है और वहां तक चलें।

सीजेआई जी ने बिल्कुल सही कहा है। हमें अपने सोचने की प्रक्रिया में धैर्य रखना चाहिए। अगर हम समझदार होते हैं, तो हम अपने जीवन में खुशहाली पाते हैं।
 
ये तो बहुत सच है! जब भी हम कोई फैसला लेते हैं या कुछ बोलते हैं, तो हमें पहले सोच-विचार करना चाहिए कि यह बोलने या खामोश रहने का सही समय है। नियमों को समझना जरूरी है, लेकिन हमें सीखने और अनुभव प्राप्त करने के लिए खुले रहने की भी जरूरत है 🤔

जस्टिस सूर्यकांत जी की बात बिल्कुल सही है। ज्ञान किताबों से जल्दी नहीं मिलता है, हमें अनुभव, गलतियाँ और लगातार सोचने-समझने से समझदारी बनानी चाहिए। आजकल तो लोग इतने तेज़ सोचते हैं कि समझदारी दुर्लभ हो गई है! 😂

जस्टिस जी ने कहा है कि जब हम तुरंत राय बनाते हैं और जवाब की उम्मीद करते हैं, तो यह समझदारी का खेल नहीं है। वहां सिर्फ नियमों का पालन करने की जरूरत है, लेकिन जिस समय परिस्थितियाँ बदल गई हैं, हमें अपनी समझदारी और अनुभव द्वारा मार्गदर्शन करना चाहिए। बहुत सच है! 👍
 
मेरी बात, मैंने कहा था कि विवेक और ज्ञान अलग-अलग चीजें हैं, लेकिन अब मैं कह रहा हूँ कि नहीं, वे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब तुम्हारे पास अनुभव, गलतियाँ और लगातार सोचने-समझने की क्षमता है, तो तो फिर तुम समझदारी से ज्ञान की मदद लेते हो।

मैंने कहा था कि हमें बोलना चाहिए, जब तो उस पर पूरा ध्यान दें, लेकिन अब मैं कह रहा हूँ, शायद कभी ऐसा जरूरी नहीं है। कुछ बार खामोश रहना भी ज़रूरी है, और तुम्हें समझना होगा जब तो विवेक से ज्ञान मिलना चाहिए।

मैंने कहा था कि समझदारी बहुत कीमती है, लेकिन अब मैं कह रहा हूँ, शायद यह भी जरूरी नहीं है। अगर आपके पास निष्पक्षता, दक्षता और अनुभव हैं, तो फिर तो बाक़ी सब कुछ ठीक से चलेगा।
 
बस, जो कुछ भी आज सुन रहा है वह सभी को याद होगा, जब हमने पुरानी दुकानों में खिड़कियाँ बंद करके सोचा था कि यह बहुत अच्छा है। लेकिन सच तो यह है कि समझदारी कभी भी बंद नहीं होती, बस उसे समय मिल जाए।
 
अरे दोस्त, तो तुमने पढ़ा की Supreme Court ke main naye naye naye adhikari aate hain? 😂 main bhi samajhta hun ki Jaise Justice Suryakant ne bola hai ki vivek aur jnana alag-alag hote hain. Jab hum bolte hain to kab hume bolna chahiye, aur kab hume shanti rahne chahiye. Main socha ki yeh samajhna zaroori hai ki kahaan pe kanon ke shabd par zor dena hai, aur kahan se can's meaning ko samajhna hai. 🤔

Main lagta hun ki books, classes, aur training se jnana jalde hi mil sakta hai, lekin anubhav, galtiyan, aur dhire-dhire sochne ke dauran hi uska poora prabandhan hota hai. Aur ab hum kisi bhi cheez par ruke hain, sabse pehle rai ban jati hai, aur jawab ki ummeed milti hai? 😱 main samajhta hun ki aaj ka yah samay vichar aur samajhdaari se gehra rahega. jab koi bhi tarah ke anumanyata se mukabala karte hain, to sirf rules nahi safaalta ki tarike de sakte hain. Main samjhana chahta hun ki hume apne vicharon ko dhire-dhire soch kar aur galtiyon se seekhkar nikaalna chahiye. 💡
 
अरे भाई, यह तो बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही गई है 🤔। जस्टिस सूर्यकांत जी की बात सुनकर मुझे याद आ गया है जब मैं अपने पिताजी से बात करता था, वह कहते थे कि समझदारी सीखने के लिए समय लगता है, उसे अभ्यास और अनुभव से मिला होता है। यह तो हमें याद दिलाने की जरूरत है कि ज्ञान सिर्फ किताबों और शिक्षा से नहीं मिलता, बल्कि वास्तविक जीवन के अनुभवों और गलतियों से।

जस्टिस सूर्यकांत जी ने सही कहा है, हमें तुरंत राय बनाने की जरूरत नहीं होती, बल्कि समझने की जरूरत है कि कौन सा तरीका सबसे अच्छा होगा। यह तो एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है।
 
😒 क्या तो सब बोल रहे हैं कि ज्ञान विवेक से अलग है, लेकिन मुझे लगता है कि यह ज्ञान तो पहले से मिल जाता है, और अनुभव चाहिए ताकि समझदारी विकसित हो सके। अगर तुमने पढ़ाई की, ट्रेनिंग ली, तो तुम्हें विवेक निकल आएगा, नहीं तो बस एक पुस्तक से ज्ञान मिल जाएगा और बाकी कुछ भी।
 
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