Digital Addiction: नजरअंदाज मत कीजिए डिजिटल एडिक्शन, किसी भी नशे की लत से है ज्यादा खतरनाक

डिजिटल एडिक्शन की समस्या तेजी से बढ़ रही है। लोग अपने मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, गेमिंग आदि को इतना पसंद करते हैं कि इससे निपटने के लिए रातों-रात विद्यालय जाना पड़ता है, उनकी पढ़ाई पूरी नहीं हो पाती। इसके अलावा डिजिटल एडिक्शन से बच्चों को मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी हो रही हैं। यह बच्चों की मानसिक सेहत को नुकसान पहुंचा रहा है। मोबाइल फोन पर लोग इतनी ज्यादा निर्भर हो गए हैं कि बिना मोबाइल फोन के देखभाल नहीं करते हैं।

मानसिक सेहत विशेषज्ञ डॉ. एके सिंह कहते हैं, 'डिजिटल एडिक्शन बच्चों के मन मस्तिष्क पर बहुत बड़ा असर पड़ रहा है। इसने उनकी तनाव सहने की क्षमता को खराब कर दिया है।'

इस समस्या से निपटने के लिए सरकार इस मामले पर कोई कानून नहीं बना सकती। हमें अपने बच्चों को समझने की जरूरत है। यह तभी समाधान है जब हमें पता होता है कि वे डिजिटल एडिक्शन से कितना प्रभावित हैं। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार, स्कूलों में शिक्षकों, अभिभावकों और परिवार को मिलकर काम करना होगा। हमें अपने बच्चों की देखभाल में अधिक जागरूक रहना चाहिए।
 
"ज्ञान ही शक्ति है, लेकिन ज्ञान के साथ-साथ अनुशासन और जिम्मेदारी भी जरूरी है। 🤔"

मुझे लगता है कि यह समस्या हमारे बच्चों की देखभाल में कमजोरियां दिखाती है। हमें अपने बच्चों को सोशल मीडिया, गेमिंग आदि के साथ-साथ अन्य गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
 
मोबाइल फोन पर लोगों की निर्भरता तो एक बड़ी समस्या है, लेकिन इसके साथ ही सरकार की निगरानी में स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता भी कम हुई है 🤔। अगर सरकार मोबाइल फोन पर निर्भरता को रोकने के लिए कुछ नहीं करती, तो इससे बच्चों की शिक्षा प्रभावित होगी।

इसके अलावा, यह सवाल उठता है कि सरकार क्यों नहीं बनाई गई डिजिटल एडिक्शन नियंत्रण विधेयक, जिससे माता-पिता और शिक्षकों को इस समस्या से निपटने की सुविधा मिले। यह विधेयक तय करने में सरकार की गतिविधि कैसे हुई?

बच्चों की मनोवैज्ञानिक सेहत पर डिजिटल एडिक्शन का प्रभाव निर्धारित करने के लिए एक विशेष आयोग भी तय किया जाना चाहिए। इस तरह से हमें पता चलेगा कि यह समस्या कितनी गंभीर है और इसके खिलाफ कैसे लड़ाई लड़ी जाए।
 
मोबाइल फोन पर लोग इतना ज्यादा निर्भर हो गए हैं... मेरे चाचा के बेटे को अपने गेम्स में इतनी देर लग जाती है कि रात 12 बज जाने तक वह खेलता है, फिर भी उसकी स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं होती। और बच्चों की मनोवैज्ञानिक समस्याएं बढ़ रही हैं... मेरे दोस्त की बेटी डिजिटल एडिक्शन से पीड़ित है... उसकी तनाव सहने की क्षमता खराब हो गई है। हमें अपने बच्चों को समझने की जरूरत है, लेकिन सरकार इस पर कुछ नहीं कर सकती। हमें शिक्षकों, अभिभावकों और परिवार को मिलकर काम करना चाहिए।
 
मोबाइल फोन और सोशल मीडिया की वजह से बच्चों की मनोवैज्ञानिक समस्याएं बढ़ रही हैं 🤕। इससे उनकी तनाव सहने की क्षमता खराब हो जाती है और वे रातों-रात विद्यालय जाकर पढ़ाई करने के लिए मजबूर हो गए हैं। इसके अलावा, बच्चे अपने परिवार से दूर रहते हैं और उनकी देखभाल नहीं करते। इससे उनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है।

मेरे अनुसार, सरकार को इस समस्या को हल करने के लिए एक स्पष्ट रणनीति बनानी चाहिए। लेकिन इसके अलावा, हमें अपने बच्चों को समझने की जरूरत है। जब हमें पता होता है कि वे डिजिटल एडिक्शन से प्रभावित हैं, तभी हम उनकी मदद कर सकते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए, हमें शिक्षकों, अभिभावकों और परिवार को मिलकर काम करना होगा।
 
मोबाइल फोन और सोशल मीडिया की इतनी भारी निर्भरता बच्चों को बहुत हानि पहुंचा रही है 🤕। अगर हम अपने बच्चों को समय दें तो वे सीख सकते हैं कि कैसे इसका सही उपयोग करना है। लेकिन अगर वे इस पर इतना ज्यादा निर्भर हो गए हैं तो इससे उनकी पढ़ाई और मानसिक सेहत दोनों पर बुरा असर पड़ता है 📚. हमें अपने बच्चों को समझने की जरूरत है और उन्हें इसके खतरों के बारे में जागरूक करना चाहिए।
 
मुझे बहुत दुःख हुआ तुम्हारी समस्या से 🤕 यह डिजिटल एडिक्शन कितनी बुरा प्रभाव डाल रहा है। तुम्हारे बच्चों को अपनी पढ़ाई और स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरूरत है, न कि मोबाइल फोन पर। हमें अपने बच्चों को समझने की जरूरत, उनकी जरूरतों को पहचानने की जरूरत। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी स्कूलों में डिजिटल एडिक्शन के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए। हमें अपने बच्चों की देखभाल में अधिक जागरूक रहना चाहिए और उन्हें स्वस्थ जीवनशैली में लाने का प्रयास करना चाहिए 💖
 
😕 मोबाइल फोन पर इतनी ज्यादा निर्भर होना स्कूली बच्चों को बहुत हानि पहुंचा रहा है। उनके शैक्षिक करियर को पूरा नहीं करने देना चाहिए।

बच्चों को डिजिटल एडिक्शन से निपटने के लिए रोजमर्रा की जिंदगी में भी पढ़ाई और खेल का संतुलन बनाना चाहिए। शैक्षिक करियर को पूरा करने के अलावा परिवार, शिक्षकों और समाज की सहायता से ही बच्चों को इस समस्या से निपटने में मदद मिल सकती है।

कहते हैं ज्यादा गेम खेलने से मानसिक स्वास्थ्य पर भारी दबाव पड़ता है तो डिजिटल एडिक्शन को कम करने के लिए कुछ फेरबदल जरूरी हैं। 📱
 
मोबाइल फोन पर इतना समय बिताना अच्छा नहीं है 🤔, यह तो बच्चों के लिए पढ़ाई पूरी नहीं हो पाती है। मैंने अपने भाई के बच्चों को देखा है वे स्कूल से घर आते ही फोन उठाते हैं और रात भर फोन पर बैठते रहते हैं। इससे उनकी पढ़ाई पूरी नहीं होती। 📚📱

मुझे लगता है कि मीडिया में भी इस समस्या को ध्यान नहीं दिया जाता है। हमारे देश में बच्चों की शिक्षा पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। शिक्षकों को किसी तरह से प्रशिक्षण देने चाहिए ताकि वे बच्चों को समझ सकें। 🤝📚
 
मोबाइल फोन पर लोग इतना निर्भर हो गए हैं कि वे स्कूलों में पढ़ाई छोड़कर भी खेल और गेमिंग करते हैं। यह तो हमारे देश के बच्चों की भविष्य की राहों पर पूरा असर डाल रहा है। सरकार को ऐसे स्कूलों में शिक्षकों को कम वेतन देने का क्या फायदा? नहीं दिया, तो लोग छोड़ देंगे। हमें अपने बच्चों की पढ़ाई और भविष्य पर ध्यान देने की जरूरत है, न कि खेल और गेमिंग पर।
 
मोबाइल फोन पर निर्भर होने से बच्चे किसी भी चीज़ को नहीं पूरी तरह समझ सकते , वही तो गेम्स को खेलना और सोशल मीडिया पर घूमना उनके लिए सबसे ज्यादा पसंद है।

मुझे लगता है कि स्कूलों में शिक्षकों और अभिभावकों को अपने बच्चों को समझने की जरूरत है, फिर न तो उन्हें गेम्स या सोशल मीडिया पर मजबूर करना चाहिए, न ही उनको पूरी तरह पढ़ाई बंद कर देना चाहिए।

क्योंकि अगर बच्चे को पूरी पढ़ाई नहीं होती तो वे जीवन में सफल नहीं बन पाते।

तो शिक्षकों और अभिभावकों को अपने बच्चों को समझना चाहिए।
 
मोबाइल फोन और इंटरनेट की समस्या तो बढ़ गई ही, लेकिन यह सच नहीं है कि हर व्यक्ति डिजिटल एडिक्शन से पीड़ित है। कुछ लोग अपने समय को अच्छी तरह से व्यवस्थित करते हैं और फोन का सही उपयोग करते हैं। हमें अपने बच्चों को समझने की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें जागरूक करने की। परिवार, स्कूल और सरकार मिलकर काम करके इस समस्या से निपटने की कोशिश कर सकते हैं।
 
मोबाइल फोन की इस तेजी से बढ़ती आदत से बच्चों को बहुत नुकसान हो रहा है। विद्यालय जाने के बजाय रातों-रात घर पर ही खेलना और गेमिंग करना इससे उनकी पढ़ाई पूरी नहीं हो पाती। और फिर देखभाल नहीं करते हुए बिना मोबाइल फोन के कुछ भी नहीं करना। यह तो बच्चों की मानसिक सेहत को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है। मेरा ख्याल है कि हमें अपने बच्चों को समझने की जरूरत है, उनकी देखभाल करनी चाहिए। स्कूलों और परिवारों को मिलकर इस समस्या से निपटने की जरूरत है।
 
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