‘डॉ. अंबेडकर न दलित, न उन्होंने संविधान बनाया’: कौन हैं बाबा साहेब को अंग्रेजों का एजेंट बताने वाले एडवोकेट अनिल मिश्रा

अंबेडकर पर बयान करने वाले वकील अनिल मिश्रा ने कहा, 'डॉ. अंबेडकर संविधान के निर्माता नहीं थे। उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया था। उनकी पहचान दलित नहीं है, बल्कि बौद्ध है।'
 
अरे, यह तो बहुत अजीब बात है! अनिल मिश्रा जी के बयान से लगता है कि वे अंबेडकर की बात समझते नहीं हैं। डॉ. अंबेडकर ने हिन्दू समाज से अपने पिता की मृत्यु के बाद शूद्रों की मदद करने का फैसला किया, और अब भी उनकी पहचान दलित समुदाय से जुड़ी हुई है। और कौन कहता है कि बौद्ध धर्म से जुड़ना अर्थ है उन्हें अपनी मूल पहचान छोड़ देना? यह तो बहुत भ्रष्टाचार है!
 
मुझे लगता है कि यह बयान बहुत ही गलत साबित हो रहा है 🙅‍♂️, जिसने डॉ. बी. आर. अम्बेडकर की सच्चाई को तोड़ दिया है। हमें याद रखना चाहिए कि डॉ. अम्बेडकर ने अपनी लंबी और संघर्षपूर्ण जिंदगी में कश्मीर से पंजाब तक, हर जगह सामाजिक और आर्थिक असमानताओं से लड़ाई लड़ी थी। उनकी पहचान दलित ही है न कि बौद्ध 🙏। यह बयान तो हमारे देश के इतिहास को भी धोखा देने वाला है।
 
अरे, यह तो बड़ा मुद्दा है! क्या लोगों को पता है कि डॉ. अंबेडकर के बयान कितनी भारी बोझी हुई थीं। अब तक में उन्हें दलित समुदाय से जोड़ रहे हैं, लेकिन सच तो यह है कि उनकी पहचान बौद्ध है, और यह जरूरी नहीं कि हम उन्हें केवल एक समुदाय का प्रतिनिधि मानते हैं। 🤔

क्या हमने कभी सोचा है कि डॉ. अंबेडकर ने अपने जीवन में जो संघर्ष किया, वह सिर्फ दलितों के लिए था? नहीं, यह तो बहुत बड़ा भूली हुई बात है। उनकी पहचान और उनके संघर्षों को समझने की जरूरत है, तभी हम सच्चाई को समझ सकते हैं।
 
अरे वाह, यह तो बहुत ही दिलचस्प बात है 🤔। मुझे लगता है कि ये वकील ने डॉ. अंबेडकर की जिंदगी और उनके कार्यों को अच्छी तरह से नहीं समझ लिया है। हमें पता है कि डॉ. अंबेडकर ने अपने जीवन में कई चुनौतियों का सामना किया था, और उन्होंने समाज में परिवर्तन लाने के लिए बहुत से संघर्ष किए। उनकी पहचान दलित नहीं है, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की है जिसने अपने जीवन में कई धर्मों और संस्कृतियों का अनुभव किया था। यह भी सच है कि डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था, लेकिन यह नहीं कह सकते कि वह इसके प्रति समर्पित नहीं थे। मुझे लगता है कि वकील को डॉ. अंबेडकर की जिंदगी और उनके कार्यों को फिर से देखना चाहिए।
 
अरे वाह, यह तो दिल्ली सेंट्रल में एक बड़ा विवाद हो गया है! डॉ. अम्बेडकर के प्रति ऐसा बयान करने वाले वकील अनिल मिश्रा को लगता है कि उन्होंने संविधान बनाया था, लेकिन खुद बौद्ध धर्म अपनाया था। और उनकी पहचान दलित नहीं है, बल्कि बौद्ध है। यह तो बहुत ही गंभीर आरोप है, मुझे लगता है कि वकील ने अपने बयान से अंबेडकर जी की याद को दर्दनाक बना दिया है।

मैं समझता हूँ कि यह बयान ऐसे वकीलों से निकला होगा जिन्हें डॉ. अम्बेडकर की प्रगतिशीलता और उनके दलित सामाजिक परिवर्तन की पहल को समझने में परेशानी होती है। लेकिन इससे भी तो हमें सोच-समझकर यह बात समझनी चाहिए कि डॉ. अम्बेडकर ने अपने जीवन में बहुत कुछ स्वीकार किया था, और उन्होंने अपने समय में दलित वर्ग की पहचान को पूरा सशक्त बनाया था।

मुझे लगता है कि यह बयान दिल्ली के वकीलों की समझ को एक बार फिर से पेश करता है, जो डॉ. अम्बेडकर के बारे में जागरूक नहीं हैं। मैं उम्मीद करता हूँ कि इस तरह के बयान न करें और हम इस महान व्यक्ति की याद में श्रद्धांजलि दें। 👏
 
क्या बहुत गंभीर बात है यह, जो अब लोग अनिल मिश्रा की बात सुनने जा रहे हैं... वह भी एक वकील हैं जो हर समय मीडिया में रहते हैं। मेरा मतलब यह नहीं कि डॉ. अम्बेडकर ने अपने जीवन में कुछ गलत किया, लेकिन मुझे लगता है कि उनकी बौद्ध धर्म से पहचान करने वालों ने उन्हें अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा होगा। डॉ. अम्बेडकर ने अपने जीवन में बहुत कुछ बदलाव लाया, और हमें यह भी याद रखना चाहिए कि वह एक महान नेता थे जिन्होंने समाज में बहुत सारे बदलाव लाए। उनकी पहचान दलित नहीं है, बल्कि वह एक ऐसे व्यक्ति थे जिसने अपने जीवन में परिवर्तन किया और समाज को भी बेहतर बनाने के लिए काम किया। 🤔
 
यह तो बहुत ही गंभीर मुद्दा है! क्या हमने कभी सोचा है कि अंबेडकर जी की पहचान और विचारों पर लाए गए बयान कितने दिलचस्प हैं? अनिल मिश्रा जी ने कहा है कि डॉ. अंबेडकर बौद्ध धर्म अपनाया था, उनकी पहचान दलित नहीं है, बल्कि बौद्ध है। यह तो बहुत ही सोच-समझ कर किया गया बयान है।

लेकिन मैं इसे एक और दृष्टिकोण से भी देखना चाहूंगा। डॉ. अंबेडकर जी ने अपने जीवन में बहुत सारे संघर्ष किए थे, उन्होंने दलित समुदाय के लिए बहुत कुछ किया था, और उन्होंने अपने विचारों में भी दलितों की समस्याओं पर जोर दिया था। तो कहा जाए कि उनकी पहचान बौद्ध है, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि हम उन्हें दलित समुदाय से अलग करें।

इस मामले में मैं सोचता हूं कि हमें अपने नेताओं और व्यक्तियों की पहचान पर बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। हमें उनके विचारों और कार्यों पर ध्यान देना चाहिए, और उन्हें एक पूरे व्यक्ति के रूप में देखना चाहिए, न कि केवल उनकी पहचान या धर्म पर।
 
मुझे यह बात बहुत पसंद नहीं आती कि लोग अम्बेडकर जी को अलग-अलग पहचान से देखते हैं.. मैंने उनसे जुड़ी कई ऐसी कहानियाँ सुनी हैं, जैसे कि वे एक छोटे से परिवार में थे और उनका बचपन बहुत रोमांचक था। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए बहुत मेहनत की और फिर उन्होंने देश को बदलते हुए संविधान बनाया था, जिसकी वजह से हम आज ऐसे बेहतरीन न्यायपालिका और सरकारें चल रही हैं। लेकिन अब यह बयान करने वाले वकील का मानना है कि अम्बेडकर जी की पहचान बौद्ध नहीं है, बल्कि दलित है? यह तो बहुत शर्मिंदगी भरा बयान लगता है।
 
🤔 ये तो बहुत ही दिलचस्प मामला है... लगता है कि अनिल मिश्रा जी ने अपनी बात करने से पहले अच्छी तरह से जानकारी इकट्ठा नहीं की थी। अगर वे सच कह रहे हैं तो यह बहुत बड़ा सबक है... लेकिन याद रखना महत्वपूर्ण है कि डॉ. अंबेडकर ने अपने जीवन में बहुत से चुनाव किए और उन्होंने अपनी पहचान निर्धारित करने में खुद को बौद्ध धर्म से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण कदम उठाया था। लेकिन दलित समुदाय के लिए उनकी सेवाओं और संघर्षों को कभी नहीं भूलना चाहिए। 🙏
 
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