क्या हुआ इसी देश में, इंसानों की जिंदगी तो ऐसी है मानो, हम सब बोलते-सुनते, टिप्पणियां करते-मानने का, लेकिन फिर कभी-कभी लगता है की, व्यक्तिगत और पार्टी के काम से अलग रखना चाहिए।
नयी दफ्तर में ऐसा एक नियम बन गया है, जिसमें सोशल मीडिया पर बोलने को रोकने की बात कही गई, लेकिन क्या ये हमारी खुद की गली का मामला है? तो फिर कौन है जो यह नियम बना रहा, और किसी को भी उनका पालन करने के लिए मजबूर कर रहा।
ज़रूरत है, कुछ इस तरह से, जहां हम सब अपनी खुद की गली में राहत पा सकें, और फिर वाकई कोई बिगड़बत न हो।