भारत में तीन साल के हर पांच बच्चों में से एक को प्लास्टिक बोतल से दूध पिलाया जाता है।
प्रति लीटर 1465 से 5893 माइक्रोप्लास्टिक कण छोड़ती हैं। इन बोतलों को गर्म करने, उबालने या लंबे समय तक इस्तेमाल के दौरान इनकी मात्रा दोगुनी तक हो जाती है। इससे शिशु रोज 2080 से 5910 तक माइक्रोप्लास्टिक कण निगल सकते हैं।
भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने साल 2015 में बच्चों के इस्तेमाल में लाई जाने वाली प्लास्टिक बोतलों में BPA के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन हैरानी की बात ये है कि अब भी कई कंपनियां इस केमिकल का इस्तेमाल कर रही हैं।
बीपीए एक एंडोक्राइन डिसरप्टर है। यह शरीर के हार्मोन सिस्टम में गड़बड़ी पैदा करता है। लंबे समय तक इसके संपर्क से इम्यून सिस्टम कमजोर हो सकता है। ब्रेन और नर्वस सिस्टम के विकास पर असर पड़ सकता है।
कुछ स्टडीज में इसे हार्ट डिजीज, लिवर डिजीज, मेटाबॉलिक प्रॉब्लम्स (जैसे मोटापा और डायबिटीज) और कुछ प्रकार के कैंसर से भी जोड़ा गया है। शिशु और छोटे बच्चे इसके दुष्प्रभावों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं।
माइक्रोप्लास्टिक शिशुओं को लाखों बार फिर कोई शरीर में पहुंच सकता है। इससे कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
लंबे समय तक प्लास्टिक बोतल से दूध पिलाने पर शिशु के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक और कुछ खतरनाक केमिकल्स पहुंच सकते हैं। इससे कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
माइक्रोप्लास्टिक की वजह से ये शरीर में जमा होकर क्रॉनिक इंफ्लेमेशन पैदा कर सकता हैं। इससे पाचन तंत्र, इम्यून सिस्टम और मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है।
बोतलों पर ‘BPA-Free’ लेबल का मतलब सिर्फ ये है कि उस बोतल में बिसफेनॉल-ए नहीं यूज किया गया है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वह पूरी तरह सुरक्षित है। कई मामलों में BPA की जगह BPS, BPF या अन्य प्लास्टिक केमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है। इनसे शरीर पर असर भी हो सकता है।
इसलिए जहां तक संभव हो, ग्लास, स्टील या अन्य नॉन-प्लास्टिक विकल्प ही यूज करें।
प्रति लीटर 1465 से 5893 माइक्रोप्लास्टिक कण छोड़ती हैं। इन बोतलों को गर्म करने, उबालने या लंबे समय तक इस्तेमाल के दौरान इनकी मात्रा दोगुनी तक हो जाती है। इससे शिशु रोज 2080 से 5910 तक माइक्रोप्लास्टिक कण निगल सकते हैं।
भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने साल 2015 में बच्चों के इस्तेमाल में लाई जाने वाली प्लास्टिक बोतलों में BPA के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन हैरानी की बात ये है कि अब भी कई कंपनियां इस केमिकल का इस्तेमाल कर रही हैं।
बीपीए एक एंडोक्राइन डिसरप्टर है। यह शरीर के हार्मोन सिस्टम में गड़बड़ी पैदा करता है। लंबे समय तक इसके संपर्क से इम्यून सिस्टम कमजोर हो सकता है। ब्रेन और नर्वस सिस्टम के विकास पर असर पड़ सकता है।
कुछ स्टडीज में इसे हार्ट डिजीज, लिवर डिजीज, मेटाबॉलिक प्रॉब्लम्स (जैसे मोटापा और डायबिटीज) और कुछ प्रकार के कैंसर से भी जोड़ा गया है। शिशु और छोटे बच्चे इसके दुष्प्रभावों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं।
माइक्रोप्लास्टिक शिशुओं को लाखों बार फिर कोई शरीर में पहुंच सकता है। इससे कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
लंबे समय तक प्लास्टिक बोतल से दूध पिलाने पर शिशु के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक और कुछ खतरनाक केमिकल्स पहुंच सकते हैं। इससे कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
माइक्रोप्लास्टिक की वजह से ये शरीर में जमा होकर क्रॉनिक इंफ्लेमेशन पैदा कर सकता हैं। इससे पाचन तंत्र, इम्यून सिस्टम और मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है।
बोतलों पर ‘BPA-Free’ लेबल का मतलब सिर्फ ये है कि उस बोतल में बिसफेनॉल-ए नहीं यूज किया गया है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वह पूरी तरह सुरक्षित है। कई मामलों में BPA की जगह BPS, BPF या अन्य प्लास्टिक केमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है। इनसे शरीर पर असर भी हो सकता है।
इसलिए जहां तक संभव हो, ग्लास, स्टील या अन्य नॉन-प्लास्टिक विकल्प ही यूज करें।