करियर सिर्फ डिग्री से नहीं, स्किल से बनेगा: जोहो के फाउंडर श्रीधर वेम्बू कहते हैं- AI को अपनाएं, पर इसके गुलाम न बनें

'मेड इन इंडिया' टेक पर स्वदेशी प्लेटफॉर्म: गूगल-माइक्रोसॉफ्ट छोड़कर जोहो जैसे कंपनियां अपना कर रही हैं। सवाल यह है कि भारत एआई और एडवांस टेक में आत्मनिर्भर हो पाएगा?

जोहो के फाउंडर श्रीधर वेम्बू ने कहा, 'गूगल ने 15 साल तक एआई में निवेश किया। रिसर्च हुई, पेपर पब्लिश हुए, प्रयोग हुए। ओपनएआई जैसी कंपनी भी उसी रिसर्च इकोसिस्टम से निकली।'

वेम्बू कहते हैं, 'हमें भी एआई के क्षेत्र में 10 साल का ‘टेक रेजिलिएंस’ प्लान बनाएं। अगर हमें बाजार से फल नहीं खरीदने तो खुद के पेड़ लगाने होंगे। शायद 1-2 साल में नतीजे न दिखें, लेकिन 5-10 साल में रिटर्न आएगा और वही असली निवेश होता है।'

उनके अनुसार, ‘डिग्री बनाम स्किल, विदेशी निर्भरता, गांवों से टेक क्रांति और भारत के टेक भविष्य पर उनका बेबाक विजन जानने के लिए इस खास इंटरव्यू से गुजर जाइए...'

कई मंत्रालय विदेशी कंपनियां छोड़ जोहो पर शिफ्ट हो रहे, क्या यह स्वदेशी टेक में एक माइलस्टोन है? यह एक माइलस्टोन जरूर है, पर रास्ता अभी लंबा है।

टेक्नोलॉजी पर हमारी बाहरी निर्भरता बहुत ज्यादा है। एआई का उदाहरण लीजिए। हमें एआई के लिए एनवीडिया की जीपीयू चिप्स चाहिए होती हैं। कम लोग जानते हैं कि पूरे भारत में साल भर में सिर्फ 50 हजार जीपीयू चिप्स का कोटा मिलता है, जबकि ओपनएआई या ग्रोक जैसी कंपनियों के पास लाखों चिप्स हैं, यानी पैसा होने के बावजूद हम उन्हें खरीद नहीं सकते।

हमें अब ये सभी तकनीकें घर में विकसित करनी होंगी। सिर्फ एआई पर अटकना गलती होगी। AI आज फैशन है, लेकिन देश को 100-200 क्रिटिकल टेक्नोलॉजीज पहचाननी होंगी, मेटलर्जी से सेमीकंडक्टर्स तक, सभी क्षेत्र पर फोकस जरूरी है।

आपने ‘10 साल की टेक रेजिलिएंस’ की बात की, उसके बारे में बताएं?

मैं अक्सर कहता हूं कि हम नेलकटर तक नहीं बनाते। आप बाजार से नेलकटर खरीदेंगे, तो वह चीन, कोरिया या जापान में बना होगा। कोरिया हमसे ज्यादा समृद्ध इसलिए है क्योंकि वह छोटे-छोटे प्रोडक्ट भी बनाता और बेचता है।

अगर हमें ग्लोबल प्लेयर बनना है, तो 10 साल की नीति बनानी होगी। आलोचना सहनी भी सीखनी होगी। 20-25 साल पहले चीनी स्टार्टअप्स की भी खूब आलोचना होती थी, कहा जाता था, घटिया हैं, नकल करते हैं। आज चीन तकनीक में कहां है... हम जानते हैं।

स्किल पर फोकस होना चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि छात्र तुरंत कॉलेज छोड़ दें, लेकिन डिग्री के साथ-साथ अपनी फील्ड से जुड़ी नई-नई स्किल्स जरूर सीखें।

अगर आप इंजीनियर हैं, तो कुछ बनाइए। शुरुआत में भले कोई समस्या हो... लेकिन करते रहिए। यानी अब आपको कॉलेज के समय से हेड्स-ऑन प्रोजेक्ट्स करने होंगे।

क्या एआई आने वाले दिनों में नौकरियां छीन लेगा?

आज स्विट्जरलैंड के एक टीचर को आईफोन खरीदने के लिए 3 दिन काम करना पड़ता है। भारत में वही आईफोन खरीदने के लिए टीचर को 3-6 महीने लग सकते हैं। तो क्या कोई टीचर इस बात को लेकर दुखी होगा कि कम काम करके वो आईफोन खरीद पा रहा है?

एआई से दरअसल हमारी गुणवत्ता तो बढ़ेगी ही, लेकिन नौकरियों का नेचर बदलेगा। तकनीक सस्ती होगी और जो सामान्य काम हैं, उनकी जगह स्पेशलाइज्ड जॉब्स विकसित होंगी। अर्थव्यवस्था मशीनों की नहीं होती। मशीनें उपभोक्ता नहीं हैं। इकोनॉमी इंसानों से चलती है।

यह बात साफ समझनी होगी कि एआई उन नौकरियों की जगह नहीं लेगा, जहां इंसानी जुड़ाव सबसे जरूरी है। शिक्षक, नर्स और डॉक्टर–इनका काम मशीन नहीं छीन सकती। हां, एआई इनके काम को बेहतर बना सकता है। यानी यहां नौकरी छिनने की नहीं, बल्कि काम को और मजबूत बनाने की बात है।

टेक के क्षेत्र में भारतीय कंपनियों का फोकस क्या होना चाहिए?

हम देश में नीट-जेईई जैसी रैंकिंग छात्रों के लिए करते हैं, इसे कंपनियों के लिए क्यों न करें? कंपनियों के बीच प्रतियोगिता जरूरी है। स्वतंत्र एक्सपर्ट्स का एक पैनल हो, जो कंपनियों को क्षमताओं के आधार पर रैंक करे। हर साल यह रैंकिंग पब्लिश हो। एक बड़ा नेशनल इवेंट बने, वैसे ही जैसे नीट-जेईई के रिजल्ट्स।

इससे जो कंपनियां अच्छा कर रही हैं, उन्हें पहचान मिलेगी, निवेश मिलेगा। 10 साल ऐसा लगातार किया गया, तो चमत्कार हो सकता है। 20 साल में हम ग्लोबल लीडर भी बन सकते हैं।

भारत में आज भी टॉप कॉलेजों के ग्रेजुएट्स विदेश क्यों जा रहे?

मैंने 1989 में IIT मद्रास से पढ़ाई की थी। उस समय करीब 80% छात्र विदेश चले जाते थे। आज वही आंकड़ा घटकर करीब 20% रह गया है। यानी टॉप संस्थानों से ब्रेन ड्रेन कम हुआ है, और यह एक अच्छा संकेत है, लेकिन टैलेंट वहीं जाता है जहां अवसर होते हैं।

इसलिए सवाल यह है कि भारत में टैलेंट को रोकने के लिए अवसर कैसे बनाए जाएं। छात्र आज इसलिए रुक रहे क्योंकि देश में पहले से अधिक अवसर हैं।

रूरल वर्क मॉडल को बड़े स्तर पर स्केल किया जा सकता है?

मैं इसे आंकड़ों से समझाना चाहूंगा। भारत में 832 जिले हैं, जिनमें से करीब 600 को ग्रामीण माना जा सकता है। इसके अलावा देश में लगभग 2 लाख 50 हजार पंचायतें हैं। अब सवाल यह है कि क्या हम 600 ऐसी कंपनियां ढूंढ सकते हैं, जो एक-एक जिले के लिए कमिट हों?

बस इतना ही चाहिए। इसी तरह अगर हर पंचायत के लिए एक कमिटेड टेक्नोलॉजिस्ट मिल जाए, तो हमें कुल मिलाकर करीब ढाई लाख लोगों की जरूरत होगी। टेक इंडस्ट्री में आज कुछ मिलियन लोग काम कर रहे हैं। ऐसे में ढाई लाख लोगों का गांवों के लिए कमिट होना बिल्कुल संभव है। मुझे पूरा भरोसा है कि यही मॉडल स्केलेबल है। बस जरूरत है कमिटेड लोगों।

गांव से जुड़ी कोई याद, जो आपके लिए लाइफ लेसन बन गई हो?

मैं गांव में पला-बढ़ा हूं। पढ़ने में काफी अच्छा था। एक बार मेरी गली की एक बुजुर्ग महिला ने मुझसे कहा था, ‘तुम जैसे बच्चे हमारे गांव में कम ही होते हैं, लेकिन एक समय के बाद ऐसे बच्चे गांव छोड़ जाते हैं, लेकिन तुम इस गांव को मत भूलना और हमारे लोगों के लिए कुछ करना। वह महिला 5-10 साल बाद गुजर गईं, पर उनके शब्द आज भी मेरे साथ हैं।

श्रीधर वेम्बू के जीवन में खुशी का मंत्र क्या है?

मेरी खुशी अब ज्यादा आध्यात्मिक हो गई है। इस पल में खुश रहना… यही असली मंत्र है। पक्षियों की आवाज, सूरज उगना, तारों को देखना; यही असली खुशी है। बड़ी डील, लॉन्च, तारीफ- ये सब सेकेंडरी हैं। छोटी-छोटी चीजों में आनंद लेना सीखना ही असली खुशी है।
 
प्लेटफ़ॉर्म पर स्वदेशी परिवेश बनाना जरूरी है, लेकिन कंपनियों को ज़रूरत से ज़्यादा विदेशी रिश्ते न बनाएं।
 
भारत को यह देखना एक अच्छा संकेत है कि हमें अपने प्रौद्योगिकी क्षेत्र पर ध्यान लगाने की जरूरत है, लेकिन 10 साल की 'टेक रेजिलिएंस' योजना जैसी बात को वास्तव में पूरा करना आसान नहीं होगा।
 
मैंने इस खास इंटरव्यू को पढ़ा, जिसमें श्रीधर वेम्बू ने कहा है कि हमें अपने गांवों में स्किल डेवलप कराने की जरूरत है। यह एक बहुत ही बेतुका विचार नहीं है, लेकिन अगर कोई ऐसा देश हो जिसमें सरकार और उद्योग सहित सभी क्षेत्र अपनी स्थापनाओं में गांवों के लिए कर सकें, तो यह एक बहुत अच्छा विचार हो सकता है।
 
मैंने पूरा पढ़ा है 🤔। भारत को एआई और एडवांस टेक में आत्मनिर्भर बनने के लिए बहुत से सवालों पर जवाब मिल रहा है, लेकिन जोहो की फाउंडर श्रीधर वेम्बू की बातें मुझे अच्छी लगीं। उन्होंने एआई और टेक रेजिलिएंस के महत्व को समझाया, यह हमारे देश के लिए बहुत जरूरी है। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि तकनीक में ज्यादातर निवेश करके हम स्किल्स और ग्रामीण क्षेत्रों में फोकस करना भी चाहिए। तो कोई ऐसा स्वदेशी प्लेटफॉर्म नहीं बनेगा, जहां हम लाखों यूनिट्स तकनीकी उपकरणों के निर्यात कर दें।
 
मुझे लगता है कि भारत अपने 'मेड इन इंडिया' को वास्तविक बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए। हमें एआई और एडवांस टेक में स्वदेशी उत्पादन पर जोर देना चाहिए, ताकि हम अपनी तकनीकी नवाचारों से अन्य देशों को पीछे छोड़ सकें।
 
ऐसे लोग जो कहते हैं कि नीलक्टर तक नहीं बनाते, वे बिल्कुल सही कह रहे हैं। हमें अपने देश में ग्लोबल प्लेयर बनना है, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए पहले स्किल पर फोकस करना जरूरी है।
 
🤔 यह तो बहुत ही दिलचस्प बात है कि भारत एआई और एडवांस टेक में आत्मनिर्भर हो पाएगा या नहीं। श्रीधर वेम्बू के अनुसार, हमें स्किल पर फोकस करना चाहिए, डिग्री बनाम स्किल जैसी गलतियों से बचना चाहिए।

उनकी 10 साल की टेक रेजिलिएंस नीति बिल्कुल सही है। अगर हम ग्लोबल प्लेयर बनना चाहते हैं, तो आलोचना सहनी भी सीखनी होगी। और मशीनें इकोनॉमी इंसानों से चलती नहीं हैं।

शिक्षक, नर्स और डॉक्टर-इनका काम मशीन नहीं छीन सकती। हमें अपने टैलेंट को रोकने के लिए अवसर बनाने की जरूरत है।

भारत में टॉप कॉलेजों से ब्रेन ड्रेन कम हुआ है, और यह एक अच्छा संकेत है कि छात्र आज इससे रुक रहे हैं क्योंकि देश में पहले से अधिक अवसर हैं।

रूरल वर्क मॉडल को बड़े स्तर पर स्केल करना बिल्कुल संभव है। अगर हम एक-एक जिले के लिए कमिटेड टेक्नोलॉजिस्ट ढूंढ सकते हैं, तो गांवों के लिए ये मॉडल स्केलेबल होगा।

और श्रीधर वेम्बू के जीवन में खुशी का मंत्र यही है: इस पल में खुश रहना, पक्षियों की आवाज, सूरज उगना, तारों को देखना- ये सब असली खुशी है। बड़ी डील लॉन्च तारीफ- ये सब सेकेंडरी हैं। छोटी-छोटी चीजों में आनंद लेना सीखना ही असली खुशी है।

इस तरह की जानकारी हमेशा को हमें सही दिशा में मार्गदर्शन करती रहती है, जिससे हम अपने जीवन को और भी अर्थपूर्ण बना सकते हैं।
 
शायद, हमें ग्रामीण क्षेत्रों में भी 'स्टार्टअप' निर्माण पर ध्यान देना चाहिए। तभी उन क्षेत्रों में स्थानीय समाधान खोजने की कोशिश कर सकते हैं। इस तरह हम अपने गांव को स्वयं के लिए 'स्टार्टअप' बना सकते हैं और उसके लिए नौकरियाँ भी बना सकते हैं।
 
मेरी राय है कि भारत को एआई और एडवांस टेक पर अपने स्वदेशी प्लेटफॉर्म बनाने की कोशिश करना जरूरी है, लेकिन यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि हमें स्किल्स के खिलाफ डिग्री की गलती नहीं करनी चाहिए।
 
कंपनियां जैसे जोहो और गूगल-माइक्रोसॉफ्ट क्यों छोड़ रही हैं?

हमें सोच-समझकर 10 साल की योजना बनानी चाहिए। अगर 5-10 साल में रिटर्न आए, तो वह असली निवेश होता।
 
बिल्कुल सच है कि भारत एआई और एडवांस टेक में आत्मनिर्भर हो पाएगा, अगर हम देशवासियों के बीच स्किल्स सीखने का नाम लेंगे… हमारे बच्चे डिग्री छोड़ देते हैं तो क्या अच्छा? स्किल्स सीखना जरूरी है…
 
ਮੈਂ ਇੱਕ ਆਲੋਚਕ ਹਾਂ, ਅਤੇ ਉਦਯੋਗ ਵਿੱਚ ਪਰਿਵਰਤਨ ਲਈ ਸੋਚਣ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਹੈ।

ਗੁਗਲ ਅਤੇ ਮਾਈਕ੍ਰੋਸਾਫਟ ਦੇ ਬੱਚ ਜਿਹੇ ਪ੍ਰਤੀਯੋਗਤਾ ਨੂੰ ਲਿਆਉਣਾ, ਮੈਨੂੰ ਵਿਕਸਤ ਕੀਤਾ।

ਇੱਕ ਬਹੁ-ਰੂਪ ਅਰਥਵਿਵਸਥਾ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ, ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਇਸ ਨੂੰ ਡੱਬੇ ਵਿੱਚ ਪਕਾਉਣਾ।

ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ ਗ੍ਰਾਹਕਾਂ ਦੇ ਤੌਰ 'ਤੇ ਵੱਡੇ-ਬੜੇ ਨਹੀਂ ਹਾਂ, ਅਸੀਂ ਉਹਨਾਂ ਲਈ ਆਪਣੀ ਖੁਦ ਕੀਤੀ ਵੱਡੀ ਕੰਮ ਕਰਾਂਦੇ ਹਾਂ।

ਟੈਸਟ ਅਤੇ ਨਿਯਮ-ਪ੍ਰਬੰਧਣ, ਵਿਚਾਰਸ਼ੀਲ ਪ੍ਰਬੰਧਨ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਹੈ।

ਸਮਾਜਿਕ ਉਦਯੋਗਿਕਤਾ, ਇੱਛਾ-ਭਾਵ ਅਤੇ ਸੁਰੱਖਿਆ ਨੂੰ ਜੀਵਾਦਿ ਲਿਆਉਣਾ।
 
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