कश्मीरी पंडितों ने 1990 में अपना ‘पन्नun कश्मीर’ खोया था। तभी से उनकी जिंदगी की एक नई दिशा में बदलने का कोई विकल्प नहीं रहा है। याद रखने योग्य यह है कि 19 जनवरी, 1990, कश्मीर घाटी को नफरत और हिंसा से भर दिया गया था। उस समय कई लोगों की जान गई, और कई अन्य को अपने घरों से भागना पड़ा और उनकी संपत्ति को नष्ट कर दिया गया।
आज, 36 साल बाद, इस ऐतिहासिक घटना की याद में कश्मीरी पंडित समुदाय 'ब्लैक डेट' मना रहे हैं। लेकिन यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है कि क्या उनके घर वापस आ सकते हैं? इस पर जवाब देने में सरकार अकेली नहीं है, बल्कि जमीनी हकीकत भी यह बताती है कि पंडितों को अपने घर लौटाने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
अनुच्छेद 370 की समाप्ति और 'नया कश्मीर' बनने के बारे में सरकार के दावे इस घटना को एक नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि पंडितों के लिए अपने घर वापस आ जाना आसान नहीं है। उनकी संपत्ति और जमीनों को भी तोड़कर नष्ट कर दिया गया, जिससे उन्हें अब तक अपने घर लौटाने का मौका नहीं मिला है।
कश्मीरी पंडितों के साथ हुए यह दुर्व्यवहार, एक भावनात्मक दास्तां है जो आज भी दर्दनाक है। उनकी सांस्कृतिक पहचान और परंपराएं विलुप्त हो गई हैं, और उन्हें अपने घर लौटाने के लिए अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
आज, 36 साल बाद, इस ऐतिहासिक घटना की याद में कश्मीरी पंडित समुदाय 'ब्लैक डेट' मना रहे हैं। लेकिन यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है कि क्या उनके घर वापस आ सकते हैं? इस पर जवाब देने में सरकार अकेली नहीं है, बल्कि जमीनी हकीकत भी यह बताती है कि पंडितों को अपने घर लौटाने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
अनुच्छेद 370 की समाप्ति और 'नया कश्मीर' बनने के बारे में सरकार के दावे इस घटना को एक नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि पंडितों के लिए अपने घर वापस आ जाना आसान नहीं है। उनकी संपत्ति और जमीनों को भी तोड़कर नष्ट कर दिया गया, जिससे उन्हें अब तक अपने घर लौटाने का मौका नहीं मिला है।
कश्मीरी पंडितों के साथ हुए यह दुर्व्यवहार, एक भावनात्मक दास्तां है जो आज भी दर्दनाक है। उनकी सांस्कृतिक पहचान और परंपराएं विलुप्त हो गई हैं, और उन्हें अपने घर लौटाने के लिए अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।