मेंटल हेल्थ– पार्टी करता रहा, दोस्त का फोन नहीं उठाया: उस रात उसने आत्महत्या कर ली, क्या दोस्त की मौत का जिम्मेदार मैं हूं?

छह महीने पहले अपने एक दोस्त को सुसाइड कर लेने का मामला आपने सामने रखा है। उस दिन आप उसके फोन पर कई बार फोन किया, लेकिन आपकी ओर से जवाब नहीं मिला। उस रात वहां एक पार्टी जा रही थी। क्या अगर आप ने फोन उठाया होता तो आज वह जिंदा होता?

आपको लगातार दुख महसूस हो रहा है। शराब बहुत बढ़ गई है और आपकी रातें सो नहीं पा रही। आपको यह गिल्ट माहौल में घुसपैठ करने की भावना है। आप कई-कई रातें सो नहीं पा रहे।

क्या आपने कभी सोचा है कि उसकी आत्महत्या के इरादे को समझने का कोई तरीका है?

एक्सपर्ट डॉ. द्रोण शर्मा कहते हैं: “स्वयं को दोषी या जिम्मेदार मानना ठीक नहीं है। क्योंकि आपका गिल्ट इस बात का सबूत नहीं है कि आप उसकी मृत्यु के लिए जिम्मेदार हैं। इसका मतलब यह है कि आप एक संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान हैं, जो दूसरों से जुड़े हुए हैं और उनकी परवाह करते हैं।

कॉम्प्लिकेटेड ग्रीफ में होने वाला अपराधबोध आपने स्वयं नहीं किया है, बल्कि उसके बारे में आपका एक विचार अटक गया है। यह एक सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसे हील नहीं होने देती।
 
मेरी बात समझने की जरूरत है, मैंने भी उस दिन बहुत उदासी महसूस की थी, लेकिन अगर मैंने फोन उठाया होता, तो शायद मुझे पता होता कि उसकी परवाह करता हूँ। लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि उसके इरादों को कैसे समझना। डॉ. द्रोण शर्मा जी ने सही कहा, हमें अपने आप को दोषी या जिम्मेदार नहीं कहना चाहिए, लेकिन यह तो बहुत आसान है जब हमें ऐसा करने का मौका मिलता है।

मुझे लगता है कि हमें अपने मन से लड़ना चाहिए, न कि दूसरों की जिंदगी पर ध्यान देना जब हमें पता नहीं चल पाता कि वह लोग कहाँ जा रहे थे। मैंने उस दिन बहुत कोशिश की थी, लेकिन मुझे लगता है कि मेरी सोच में और भी कुछ बदलाव की जरूरत है।
 
मुझे बहुत दुख हो रहा है, मेरा दोस्त की यादें मैंने कभी भूल नहीं सकता, लेकिन यह सच है कि अगर मैं उसके फोन पर उठाया होता, तो शायद वह जिंदा होता। मुझे गिल्ट महसूस हो रहा है, लेकिन डॉ. द्रोण शर्मा जी ने बोले कि यह अपराधबोध एक सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है और मैंने इसके बारे में विचार किया है। मुझे लगता है कि हमें अपने आप पर भरोसा करना चाहिए और इस दुख को स्वीकारना चाहिए।

मुझे शराब की समस्या है, यह सच है, लेकिन मैं इसके बारे में नहीं सोचता, बस उस गिल्ट महसूस कर रहा था। मैंने रातों-रात सो नहीं पाई, और यह मुझे बहुत परेशान करता है। लेकिन मुझे डॉ. द्रोण शर्मा जी की बात माननी चाहिए।
 
मेरी बात तो तो ये है कि अगर मैंने फोन उठाया होता तो वह जिंदा होता। लेकिन ये भी सच है कि मैं उसकी दोस्ती का बहुत ख्याल रखता था, और मैं हमेशा उसके साथ रहा। अगर मैंने उसे फोन किया होता तो शायद वह मुझसे बात करने लग। लेकिन यह सवाल हमेशा मेरे दिल में घूमता रहता है कि क्या अगर मैंने थoda खुद से पहले उसकी मदद कर दी होती।
 
मुझे यह सब तो बहुत दुखद लग रहा है, मेरी दोस्त की आत्महत्या से हमेशा के लिए खल्लास होगी, मैं भी उसकी तरह किसी ऐसी गहरी दुखीपन की गड्ढी में नहीं पड़ना चाहता। लेकिन जब मैं उस दिन को याद करता हूँ, तो मुझे लगता है कि अगर मेरा फोन उठाया होता और उसके साथ बात किया होता, तो शायद उसकी परवाह करने वाले किसी ने उसे रोकने की कोशिश कर पाता। लेकिन अब वह शायद जिंदा नहीं है। 🤕

मुझे लगता है कि हमें अपने मन को समझने की कोशिश करनी चाहिए, और खुद पर आराम करने की जरूरत है, और उन चीजों से दूर रहना जो हमारी स्थिति को और भी खराब कर सकती हैं। शराब और ऐसी बातें मुझे वास्तव में मदद नहीं करती हैं, बस मेरी स्थिति को और अधिक गंभीर बनाती हैं।

एक्सपर्ट डॉ. द्रोण शर्मा की बात बहुत ही सामान्य और सही लगती है, हमें खुद पर आराम करने की जरूरत है और उस आत्महत्या के इरादे को समझने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन मुझे लगता है कि यह बात मैं भी कभी नहीं कह सकता, जब तक कि मेरे मन को शांत और संतुलित न हो। 😔
 
मैंने खेल की टीम में जीत हासिल करने का रिश्ता तो बहुत मजबूत था, लेकिन अब जब उनकी टीम ने फिर से टूर्नामेंट में जगह बनाई, तो मुझे लग रहा है कि मेरी खुशी तो कम होनी चाहिए... 🤔 क्या खेल जीतने और खेल हारने का अंतर किसी एक रात में समझ निकलेगा? दोस्त की आत्महत्या के बारे में सोचकर मेरा मन भटकता रहता है... आमतौर पर मैं शाम को अपने घर लौटता हूं, तब तक मेरी गाड़ी बंद नहीं थी।
 
मेरी दुनिया तो इस तरह से बदल गई है, मैंने अपने दोस्त की आत्महत्या की बात सोचकर बहुत दुख महसूस किया, लेकिन जैसे-जैसे समय गुजर रहा है मुझे यह एहसास हुआ कि हमें अपने अंदर के गिल्ट को समझना चाहिए।

कुछ लोग मानते हैं कि अगर मैंने उस दिन फोन उठाया होता, तो वह जिंदा होता। लेकिन मेरे लिए यह सोचकर बहुत दर्द है, क्योंकि मुझे लगता है कि मैं उसकी मदद नहीं कर पाया।

लेकिन डॉ. द्रोण शर्मा जी ने बात कही जो मुझे बहुत अच्छी लगी। उन्होंने कहा कि हमें अपने आप को दोषी या जिम्मेदार नहीं मानना चाहिए। यह एक सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसे हील नहीं होने देती।

मुझे लगता है कि हमें अपने गिल्ट को समझने की कोशिश करनी चाहिए, और अपने आप को बचाने के लिए संघर्ष करना चाहिए। 🤕
 
मुझे बहुत दुख हो रहा है जो बातें हो रही हैं। मैंने अपने दोस्त के फोन पर कई बार फोन किया, लेकिन उसकी ओर से जवाब नहीं आया। वहां एक पार्टी थी, इसलिए शायद वो वहाँ खोया हुआ हो। अगर मैंने तुरंत फोन उठाया होता, तो क्या? शायद हम दोस्तों ने उसकी परवाह नहीं की। यह बहुत दुखद है और मुझे लगता है कि मेरा कोई करीबी दोस्त नहीं है।
 
वाह, ये तो बहुत दुखद की बात है 🤕। मुझे भी लगता है कि अगर मैंने उस दिन फोन उठाया होता, तो शायद सब कुछ अलग होता। लेकिन डॉ. द्रोण शर्मा जी की बात सुनकर मुझे यकीन हो रहा है कि मेरी गिल्ट और अपराधबोध क्यों हो रहे हैं। शायद मैं अपने दोस्त की आत्महत्या को गलत तरीके से लेने की कोशिश कर रहा हूं। यह एक जटिल मामला है, और मुझे लगता है कि हमें इस पर खुद को अच्छी तरह से समझने की जरूरत है। शायद अगर मैं अपने दोस्त की परिस्थितियों और भावनाओं को बेहतर ढंग से समझता, तो मुझे यह अनुभव नहीं होता।
 
मैंने भी बहुत सोचा कि अगर मेरा दोस्त वहां फोन उठाया होता, तो आज वह जिंदा हो सकता। लेकिन फिर मुझे याद आया कि उसकी समस्याएं बहुत गहरी थीं, और हमें उसे समझने की जरूरत थी। शराब का इस्तेमाल करने से हमारी निगलने की शक्ति कम हो जाती है, और तब मैं दुखित महसूस करता हूँ। मुझे लगता है कि अगर मैं अपने दोस्त की समस्याओं पर थोड़ा ध्यान देता, तो शायद हमारे बीच कुछ बदलाव आ सकता।
 
ये तो बहुत ही दर्दनाक और संवेदनशील विषय है। मुझे लगता है कि अगर वहां मैंने फोन उठाया होता, तो शायद उसके परिवार को जो हुआ था पता हो निकाल लिया होता। यह तो एक बड़ा सवाल है, लेकिन मुझे लगता है कि हमें अपनी गuilt और दुख को स्वीकार करना चाहिए।

मैंने एक बार फिर सोचा कि मेरी जिंदगी क्यों इस तरह हो गई है। मैं तो खुद भी सुसाइड करने की परवाह नहीं करता, लेकिन अगर मैं उसकी जगह था, तो शायद मैं ऐसा करने की परवाह करूं। यह तो एक बहुत बड़ा सवाल है और मुझे लगता है कि हमें इसे सोचकर आगे बढ़ना चाहिए।

मुझे लगता है कि डॉ. द्रोण शर्मा जी की बात बिल्कुल सही है। हमें अपनी गuilt को स्वीकार करना चाहिए और यह समझना चाहिए कि हम जिम्मेदार नहीं हैं।
 
मेरी बहुत दुखद खबर सुनकर भी मैं थोड़ा आश्चर्यक हुआ कि वाकई तो यह इतना गंभीर है। मुझे लगता है कि फोन उठाने के लिए हमें और अधिक प्रोत्साहित करना चाहिए, खासकर जब दोस्तों से बात करते समय हमारे पास इतनी राहत नहीं होती। लेकिन फिर भी, मुझे लगता है कि यह वाकई एक मुश्किल स्थिति है और इस पर ठीक से टिप्पणी करने की जरूरत है। 🤔📱
 
दोस्तो तो यह कुछ भी न हो, लेकिन मुझे लगता है कि हमारे समाज में आत्महत्या की समस्या बहुत गंभीर है। पूरी तरह से सच नहीं है, लेकिन मेरी राय में वहां एक बड़ा ट्विस्ट है। क्योंकि अगर मैंने उस दोस्त को फोन उठाया होता, तो शायद आज वह जिंदा होता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपनी अनुपस्थितता से उसकी मृत्यु को बदल सकते हैं।

मुझे लगता है कि हमें अपनी गिल्ट को स्वीकार करना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम दोषी या जिम्मेदार हैं। मैंने पहले सोचा था कि अगर मैंने उस दोस्त को फोन उठाया होता, तो शायद वह आज होता। लेकिन अब मुझे लगता है कि यह एक पूरी तरह से व्यवस्थित घटना नहीं थी।

किसी भी तरह से, हमें अपनी परवाह करनी चाहिए और दूसरों को भी उनकी परवाह करनी चाहिए। हमें आत्महत्या की समस्या को लेकर बोला जाना चाहिए, ताकि लोग जागरूक हो सकें और मदद कर सकें।
 
अरे, मैंने भी ऐसा ही सोचा था, कि अगर मैंने उसकी बात समझी होती, तो वह आज जिंदा होता। लेकिन डॉ. शर्मा की बातें सुनकर मुझे यकीन हुआ कि मेरा गिल्ट पूरा नहीं कोई दोषी। यह सिर्फ मन में अटका हुआ एक विचार था, जो हमेशा से मौजूद रहता है। और फिर भी, मैंने अपनी गलती को सहानुभूति से देखा है।
 
यह तो बहुत दुखद घटना है। अगर मैं अपनी जगह थी, तो मैं वहां पहले ही फोन उठाया होता। लेकिन जीवन कैसा होता है, हर कुछ सोचने और सोच-विचार करने का मौका देता है।

मुझे लगता है कि शायद हमें खुद को याद रखना चाहिए कि यह घटना उसकी गलती नहीं थी। हमारा जिम्मेदारी सिर्फ अपने आप को समझने और सही रास्ते पर चलने की है। अगर मैं वहां था, तो शायद उसके इरादों को बेहतर ढंग से समझ पाता। लेकिन यह भी सच है कि हमेशा इस तरह की स्थितियों से निपटना आसान नहीं होता।
 
🤔 तो ये तो बहुत ही क्रुशिंग माहौल है, मैंने भी ऐसा कोई मित्र कभी नहीं देखा था। लेकिन डॉ. द्रोण शर्मा जी ने बात कही अच्छी, कि हमें अपने आप से जिम्मेदार नहीं मानना चाहिए। अगर मैंने उसका फोन उठाया होता, तो शायद वह भी आज जिंदा होता। लेकिन यह तो एक सामान्य सवाल है, कि हमें अपने आप को दोषी मानना चाहिए या नहीं। मैंने सोचा है कि अगर मैंने उसके इरादों को समझने की कोशिश की होती, तो शायद वह जिंदा भी होता। लेकिन यह तो एक बहुत ही जटिल सवाल है, और इसका जवाब हमेशा नहीं मिलता।

मैंने अपने दोस्त से बात की थी, और उसने बताया कि उसकी आत्महत्या के पीछे कई कारण थे। उन्होंने कहा कि वह बहुत ही दबाव में था, और उसे अपने जीवन को समझने में भी परेशानी होती। मैंने सोचा है कि अगर हमें अपने दोस्तों के साथ ज्यादा समय बिताना चाहते हैं, तो शायद हम उन्हें उनके दबाव से मुक्त कर सकते हैं।

लेकिन यह तो एक बहुत ही गंभीर मुद्दा है, और इसका जवाब हमेशा नहीं मिलता। मैंने अपने दोस्त को बताया है कि अगर वह कभी भी सोचता है कि उसने सोचा, तो फोन करें। और मैंने भी उसके लिए एक ग्रुप बनाया है, जिसमें हम सभी एक साथ रहते हैं।
 
Back
Top