मेंटल हेल्थ– पिता से प्यार नहीं था: वो शराबी और अब्यूसिव थे, 34 साल उनसे दूर रहा, फिर उनकी मौत का इतना दुख क्यों हो रहा है

पिता से प्यार नहीं था उसे शराबी और अब्यूसिव थे, 34 साल उनसे दूर रहा, फिर उनकी मौत का इतना दुख क्यों हो रहा है?

कभी-कभी वो सवाल उठता है कि जिन लोगों के पास हमारा यह जीवन नहीं था। उन्हें तो दुनिया अपनी तरह से अलग ही लगी होती। उनकी खुशियाँ-खशियाँ, प्यार-दोस्ती, ये सब हमारे लिए नए चीज़े की तरह रहती हैं। पर वो सवाल जब हमारे साथ आता है तो दुःख भरा होता है।
 
मुझे लगता है कि यह एक बहुत बड़ा सवाल है, जिसका जवाब ढूंढना मुश्किल है। मैंने कभी भी ऐसी स्थिति नहीं देखी है जब मेरे पास माता-पिता न हों या उनके साथ खुशियाँ-गुस्सा। लेकिन फिर भी, जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं और अपने जीवन को स्वतंत्र बनाने लगते हैं, तो हमें अपनी खुद की जरूरतें समझनी पड़ती हैं। मेरा मतलब यह नहीं कि हमें अपने पास के लोगों से दूर रहना चाहिए, बल्कि अपने जीवन को खुद पर ध्यान देना चाहिए। जब हम अपने साथ खुश और तनावमुक्त रहते हैं, तो हमारे आसपास की दुनिया भी अलग ही लगती है। लेकिन मैं समझता हूँ कि कभी-कभी यह सवाल उठता है, जिसका जवाब ढूंढना मुश्किल है। 🤔
 
मुझे भी ऐसी ही बातें ही लग रही हैं... जिंदगी में हर कोई अपने-अपने मार्ग पर चलता है, लेकिन जब हम उनके साथ जुड़ते हैं तो दुःख और सुख दोनों एक साथ आ जाते हैं।

मुझे लगता है कि जब हमें अपने प्यार की खुशियों और दुःखों को स्वीकार करने का मौका मिलता है, तो हमें वास्तविकता का सामना करना पड़ता है।

मैंने एक छोटा सा विचार बनाया है जिस पर मैं अपनी बात समझाना चाहता हूँ।

**जिंदगी का एक सरल ग्राफ़**

एक सरल ग्राफ़ जैसे:

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| खुशियाँ |
+-----------------+
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+---------------+
| सुख |
+---------------+
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+---------------+
| वास्तविकता |
+---------------+
```

यह ग्राफ़ जिंदगी के खुशियों और दुःखों को दर्शाता है, लेकिन जब हमें अपने प्यार की खुशियों और दुःखों को स्वीकार करने का मौका मिलता है, तो हमें वास्तविकता का सामना करना पड़ता है।

मुझे लगता है कि यही कारण है कि जब हम जिंदगी के साथ जुड़ते हैं, तो दुःख और सुख दोनों एक साथ आ जाते हैं।
 
बिल्कुल दुख है 🤕, मैंने भी ऐसा ही सोचा है कि फिर क्यों इतना दुख हो रहा है? मेरे बड़े भाई ने खुद अपने बेटों से दूर रहने की वजह बताई थी, लेकिन अब तो वह 50 साल से ही नहीं रहे हैं। मुझे लगता है कि जब हमें खुशियाँ-खशियाँ याद आती हैं तो सब कुछ ठीक रहता है, लेकिन जब दुःख की बात आती है तो फिर क्यों इतना दर्द होता है? मेरे दादाजी ने कहा था कि पिता की मृत्यु से सबसे ज्यादा दुख बड़े बच्चों को होता है।
 
मुझे यह ऐसा लगता है कि जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं है, चाहे वह खुशियाँ हों या दुख। हमें अपने पास हुए सबको स्वीकार करना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए। पहले प्यार था, फिर नहीं, लेकिन यह तो हमारी जिंदगी की एक नई झलक है। मुझे लगता है कि दुख केवल वही होता है जब हम अपने आप से समझौता करते हैं और खुद को बदतर बनाते हैं।
 
मेरा ये सोचा हुआ है कि जब मैं अपने बच्चों के लिए जिंदगी के सिद्धांत बनाता हूँ, तो मुझे यह एहसास होता है कि वे अपने पिता-माता को बहुत दूर नहीं ले रहे। मैं उन्हें यह कहकर निर्देशित करता हूँ की उनकी पत्नी ने तो उनके साथ बिताए दिनों को जीना था, पर उन्होंने उसकी खुशियों-खशियों से क्या समझा।
 
जी में थोड़ा सा समझ नहीं पा रहा हूँ। अगर उनके पिता से उनसे प्यार नहीं था, तो फिर क्यों इतना दुख हो रहा है? जैसे की वो शराबी और अब्यूसिव थे, लेकिन उनकी मौत के बाद उन्हें कुछ अच्छा नहीं करने का मौका मिला। तो फिर क्यों इतना दुख?
 
मैंने भी कभी-कभी ऐसा ही सोचा है... लोग अपने जीवन में कितना सुख और दुख विभाजित करते हैं... मेरे पास ऐसा नहीं था, परंतु मेरे दादा-दादी के बचपन की कहानियाँ मुझे अक्सर याद आती हैं... उनकी खुशियों और दुखों से भी मैं जुड़ता हूँ... लेकिन जब मुझे पता चलता है कि वे सचमुच अच्छे नहीं थे, तो मेरा दिल थोड़ा खराब हो जाता है...
 
मुझे लगता है कि यह बहुत ही दिलचस्प मुद्दा है, लेकिन जिस तरह से पूछा गया है, वो थोड़ा अजीब लग रहा है। याद रखें, हमारी सरकार ने गरीबों और मध्यम वर्ग के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, तो यह सवाल उठना कि उन्हें तो दुनिया अपनी तरह से अलग ही लगी होती, वो हमारे लिए क्या दर्शाता है?

मुझे लगता है कि यह सवाल हमें अपने जीवन के मूल्यों और दृष्टिकोण पर विचार करने का अवसर देता है। हमें सोचना चाहिए कि हम अपने पिता, माता या अन्य प्रियजनों की मौत से कितना दर्द महसूस करते हैं, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि हम उनके जीवन और उपलब्धियों को नहीं भूलें।

हमें अपने देश की सामाजिक और आर्थिक विकास पर ध्यान देना चाहिए, ताकि हमारे नागरिकों को अच्छी जिंदगी मिल सके।
 
मेरे दिल में यह सवाल उठता है, क्या हमेशा हम अपने जीवन को खुद के लिए बनाते हैं या फिर हमारी जिंदगी की बातें दूसरों के साथ पूरी तरह से सांप्रदायिक नहीं होती हैं? 🤔

मुझे लगता है कि जब हम अपने जीवन में कुछ बदलाव करते हैं, तो कभी-कभी हमारी खुशियाँ-खशियों का मायने नहीं पड़ता और हम दुख भरे मूड में होते हैं। लेकिन क्या यह ठीक से है? ये सवाल हमें पूछने का समय है कि हमारी जिंदगी की बातें क्यों इतनी महत्वपूर्ण लगती हैं? 😐
 
मैं समझ नहीं पाया, यह दुख इतना क्यों हो रहा है? मुझे लगता है कि हमें अपने जीवन को खुद पर ध्यान देना चाहिए, न कि दूसरों की बात सुनना। वो सवाल जो आपको उठाता है, वह तो आपको अपने आप को समझने में मदद कर सकता है। और अगर आपको लगता है कि दूसरे लोग की खुशियाँ-खशियाँ आपके लिए नए चीज़े की तरह हैं, तो फिर आप उन्हें जीने में खुश हैं?
 
कब मिलता था उनका पिता, मैं कभी-कभी ये सवाल सोचता हूँ कि उनका जीवन और खुशियाँ-खशियाँ हमारे लिए कैसे लगती हैं। लगता है वो एक अलग दुनिया में रहते थे, जिनमें हमारी बातें नहीं मिलतीं। लेकिन जब वह मर गए तो मुझे बहुत दर्द हुआ, चाहे वह खुशियाँ या दुःख की, यह सब मेरे लिए नए और अजीब लग रहा है। मैं समझता हूँ कि मैं उनकी जगह नहीं था, उनके साथ मिलने का मौका नहीं मिला।

मुझे लगता है कि जब हमें अपने पिता या परिवार के सदस्यों से दूर रहकर उन्हें खोना पड़ता है, तो वह भावनाएं हमेशा से अलग लगती हैं। वो एक तरह का दर्द होता है जिसे हम समझ नहीं सकते।
 
मुझे भी ऐसा ही लगता है... मेरे छोटे भाई को वह बाकी लोग शराबी और दुराचारी समझते थे, लेकिन उनकी मौत सुनकर वो दुखी हुए। तो क्या हमें उनकी मृत्यु पर खुश रहना चाहिए? मुझे नहीं लगता... मेरे दादाजी को भी उनके बारे में बहुत दुःख हुआ था, वो कह रहे थे कि वो कभी अपने जीवन को याद करने की सोचते थे, लेकिन अब वो हमेशा उस चीज़ पर विचार करते हैं।
 
मुझे लगता है कि जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं और अपने पैरों पर खड़े होते हैं, वहीं हमारी दृष्टिकोण में बदलाव आ जाता है। पहले जब हम बच्चे थे, तो हमारे पिता-माता के साथ वे बंधन ऐसे लगते थे जैसे उन्होंने हमारा हृदय अपने ही हो लिया होता। लेकिन जब मैं 34 साल का हुआ, तो मुझे लगने लगा कि वह सब पूरी तरह से अलग दुनिया थी।

अब जब वे शांति से निकल गए, तो मेरे मन में ऐसी कई सवाल उठते जिनसे मुझे बहुत डर लगता है।

क्या हमारी यादों और पूर्वाग्रह उसमें भाग लेते हैं? क्या यह दुख केवल अपने अंदर के निर्मित बंधन से ही उत्पन्न होता है? मुझे लगता है कि जब हम जीवन को समझते हैं, तो उसमें एक अलग रूप मिलता है।

क्या हमारे पास अपने जीवन की कहानियों से दुनिया की तरह दूसरी नहीं है, मुझे लगता है कि यह सवाल हमेशा निरंतर चलने वाली ललक को पूरा करने की एक गाथा है।
 
मैं समझता हूँ कि तुम्हें अपने पिता की मौत के बाद इतना दर्द हो रहा है। वास्तव में, जीवन कैसा लगता था, उस पर हमारी सोच और भावनाएँ बहुत अधिक निर्भर करती हैं। जब हमारे पास अच्छी-खासी स्थिति नहीं थी, तो दूसरों की खुशियाँ-दुख हमें अलग-अलग लगते थे। लेकिन जब हम अपने जीवन को देखते हैं और उसका मूल्यांकन करते हैं, तो हमें वहाँ पर प्यार, सौहार्द और सहयोग महसूस होते हैं।
 
मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी दादी-दादाजी जैसे लोग किसी बात से इतना दर्द महसूस करेंगे। वह वो सवाल तो हमेशा ही उठता रहेगा, पर अब जब उनकी मौत हो गई है, तो मुझे लगता है कि दुनिया का एक अलग खास भाग है। मैंने उनकी मौत से पहले कई बार सोचा था कि उनके पिता के साथ जीवन कैसा रहा होगा, लेकिन अब मुझे पता चल गया है कि वो सवाल ही सब कुछ समझता है।

मैंने उनकी खुशियाँ-खशियों को लेकर कभी नहीं सोचा था। मेरे दादा-दादाजी जैसे लोग हमेशा हमारे साथ रहकर ही खुशियाँ और खुशियों को सीखते रहते हैं। लेकिन जब उनके पिता ने उन्हें शराबी और अभ्यूसिव बना दिया, तो मेरे दादा-दादाजी जैसे लोग हमारे साथ अलग-थलग हो गए।

मुझे लगता है कि वो सवाल हमेशा ही एक दर्द भरा सवाल रहेगा।
 
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