परंपराओं से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है पेरेंटिंग।
सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना पेरेंटिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ये बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं और उन्हें अपनेपन का एहसास कराती हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या बच्चों को ‘फोर्स’ करके फैमिली ट्रेडिशन्स फॉलो कराना सही है? इसका सीधा जवाब है, नहीं।
किसी भी चीज को, खासकर संस्कृति, आस्था और भावनाओं से जुड़ी बातों को जबरदस्ती थोपने से अक्सर इसका उल्टा असर होता है। जब आप अपने बेटे को मजबूरी में पूजा या किसी रिवाज में शामिल कराती हैं, तो उसके मन में उस परंपरा के प्रति सम्मान के बजाय नकारात्मक भाव पैदा हो सकते हैं।
आपका बेटा अब 15 साल का है। यह वह उम्र है, जहां बच्चे हर चीज को चुनौती देते हैं, हर चीज पर सवाल करते हैं। उन्हें पसंद नहीं होता कि उन पर कोई भी चीज थोपी जाए। आपके लिए जो अनमोल है, उसे वह 'बोरिंग और कंजर्वेटिव' लग रहा है। उसे ये सब करने का कारण समझ में नहीं आ रहा है।
इसलिए, बहुत लंबी रस्मों से बचना चाहिए। उन्हें छोटा, हल्का और रोचक बनाएं, ताकि वह बोझ नहीं, खुशी लगे।
परंपराओं को उसकी रुचि, जैसेकि टेक्नोलॉजी से जोड़ें। उसे त्योहारों के पलों को रिकॉर्ड करके परिवार के लिए एक छोटी रील/वीडियो बनाने को कहें। इससे वह आधुनिक तरीके से अपनी संस्कृति को पहचान देगा।
परिवार के ट्रेडिशन में बदलाव करें, अगर कोई बहुत पुरानी या लंबी रस्म आपके बेटे के लिए अर्थहीन है। बदलाव उन्हें कमजोर नहीं, मजबूत बनाता है।
तुलना, ताने और दबाव से बचें। उसे डांटने या ताना देने से बचें। जब बच्चा जज नहीं होता, तभी वह अपनी सोच, उलझन और सवाल खुलकर सामने रख पाता है।
बच्चों को फोर्स करना कितना सही? कभी-कभी, माता-पिता बच्चों को पूजा में बैठाएंगे, हवन में शामिल करेंगे ताकि वो अपने–आप परंपराओं से जुड़ें। लेकिन मनोविज्ञान कहता है कि फोर्स करने से इंसान सीखता नहीं है, बल्कि इससे रेजिस्टेंस ही पैदा होता है।
सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना पेरेंटिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ये बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं और उन्हें अपनेपन का एहसास कराती हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या बच्चों को ‘फोर्स’ करके फैमिली ट्रेडिशन्स फॉलो कराना सही है? इसका सीधा जवाब है, नहीं।
किसी भी चीज को, खासकर संस्कृति, आस्था और भावनाओं से जुड़ी बातों को जबरदस्ती थोपने से अक्सर इसका उल्टा असर होता है। जब आप अपने बेटे को मजबूरी में पूजा या किसी रिवाज में शामिल कराती हैं, तो उसके मन में उस परंपरा के प्रति सम्मान के बजाय नकारात्मक भाव पैदा हो सकते हैं।
आपका बेटा अब 15 साल का है। यह वह उम्र है, जहां बच्चे हर चीज को चुनौती देते हैं, हर चीज पर सवाल करते हैं। उन्हें पसंद नहीं होता कि उन पर कोई भी चीज थोपी जाए। आपके लिए जो अनमोल है, उसे वह 'बोरिंग और कंजर्वेटिव' लग रहा है। उसे ये सब करने का कारण समझ में नहीं आ रहा है।
इसलिए, बहुत लंबी रस्मों से बचना चाहिए। उन्हें छोटा, हल्का और रोचक बनाएं, ताकि वह बोझ नहीं, खुशी लगे।
परंपराओं को उसकी रुचि, जैसेकि टेक्नोलॉजी से जोड़ें। उसे त्योहारों के पलों को रिकॉर्ड करके परिवार के लिए एक छोटी रील/वीडियो बनाने को कहें। इससे वह आधुनिक तरीके से अपनी संस्कृति को पहचान देगा।
परिवार के ट्रेडिशन में बदलाव करें, अगर कोई बहुत पुरानी या लंबी रस्म आपके बेटे के लिए अर्थहीन है। बदलाव उन्हें कमजोर नहीं, मजबूत बनाता है।
तुलना, ताने और दबाव से बचें। उसे डांटने या ताना देने से बचें। जब बच्चा जज नहीं होता, तभी वह अपनी सोच, उलझन और सवाल खुलकर सामने रख पाता है।
बच्चों को फोर्स करना कितना सही? कभी-कभी, माता-पिता बच्चों को पूजा में बैठाएंगे, हवन में शामिल करेंगे ताकि वो अपने–आप परंपराओं से जुड़ें। लेकिन मनोविज्ञान कहता है कि फोर्स करने से इंसान सीखता नहीं है, बल्कि इससे रेजिस्टेंस ही पैदा होता है।