पाकिस्तान में गहराया हुआ विद्रोह, अस्थिरता, आर्थिक दबाव और सेना-सरकार के बीच संघर्ष एक दूसरे पर टकराते हुए देश को खतरनाक मायनों में पुनर्गठन की ओर ले जा रहा है।
पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति इमरान खान बनाम सेना की लड़ाई से कहीं अधिक गंभीर है। सत्ता का दांव अब राजनीतिक वर्चस्व से लेकर सेना के संस्थागत प्रभुत्व तक पहुंच गया है। प्रांतों की क्षेत्रीय पहचान और अर्थव्यवस्था की बुनियादी जीवंतता पर भी इसका प्रभाव है।
सैन्य रणनीति में जनसमर्थन का सामाजिक भूगोल, आर्थिक दिवालियापन और सेना-सरकार के संबंध एक-दूसरे को बढ़ा-चढ़ाकर ले जाते हैं। पाकिस्तान में इस विद्रोह की सुलगती चिंगारी भीषण संघर्ष के मुहाने पर पहुंच गई है।
पाकिस्तानी सेना की रणनीति का पूरा ढांचा यह सुनिश्चित करने पर केंद्रित है कि राष्ट्रीय नैरेटिव, विदेश नीति और आंतरिक सुरक्षा पर उसकी पकड़ बनी रहे। लेकिन इमरान खान को इस बात मान लेना पड़ता है कि सत्ता के दांव में सेना की शक्ति और सरकार की पकड़ एक-दूसरे के खिलाफ हैं।
पुलिस-सेना की कार्रवाई के बावजूद पंजाब में पीटीआई के प्रति जनमत बरकरार है। खैबर पख्तूनख्वा में सेना और केंद्र के प्रति असंतोष ऐतिहासिक रूप से बढ़ रहा है।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर भी दबाव पड़ा है, जिसका असर पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था और सैन्य नियंत्रित शासन द्वारा देश बचाने में विफल रहने पर पड़ा।
इस संकट को हल करने का एकमात्र तरीका यह है कि सरकार आर्थिक आशा बनाम सैन्य-प्रशासकीय निराशा के समीकरण को समझे।
पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति इमरान खान बनाम सेना की लड़ाई से कहीं अधिक गंभीर है। सत्ता का दांव अब राजनीतिक वर्चस्व से लेकर सेना के संस्थागत प्रभुत्व तक पहुंच गया है। प्रांतों की क्षेत्रीय पहचान और अर्थव्यवस्था की बुनियादी जीवंतता पर भी इसका प्रभाव है।
सैन्य रणनीति में जनसमर्थन का सामाजिक भूगोल, आर्थिक दिवालियापन और सेना-सरकार के संबंध एक-दूसरे को बढ़ा-चढ़ाकर ले जाते हैं। पाकिस्तान में इस विद्रोह की सुलगती चिंगारी भीषण संघर्ष के मुहाने पर पहुंच गई है।
पाकिस्तानी सेना की रणनीति का पूरा ढांचा यह सुनिश्चित करने पर केंद्रित है कि राष्ट्रीय नैरेटिव, विदेश नीति और आंतरिक सुरक्षा पर उसकी पकड़ बनी रहे। लेकिन इमरान खान को इस बात मान लेना पड़ता है कि सत्ता के दांव में सेना की शक्ति और सरकार की पकड़ एक-दूसरे के खिलाफ हैं।
पुलिस-सेना की कार्रवाई के बावजूद पंजाब में पीटीआई के प्रति जनमत बरकरार है। खैबर पख्तूनख्वा में सेना और केंद्र के प्रति असंतोष ऐतिहासिक रूप से बढ़ रहा है।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर भी दबाव पड़ा है, जिसका असर पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था और सैन्य नियंत्रित शासन द्वारा देश बचाने में विफल रहने पर पड़ा।
इस संकट को हल करने का एकमात्र तरीका यह है कि सरकार आर्थिक आशा बनाम सैन्य-प्रशासकीय निराशा के समीकरण को समझे।