पटना-गणतंत्र दिवस कार्यक्रम में राज्यपाल की कुर्सी पर बैठे नीतीश: CM की चेयर पर संजय झा, लेडी गवर्नर की सीट पर दिखे सम्राट चौधरी - Patna News

पटना में गांधी मैदान में आज राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने 77वें गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराया। इस समारोह में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी, विजय चौधरी और अन्य विधायक अपने राज्य सेवा शोभा यात्रा पर शामिल रहे।

सामूहिक तिरंगा फहराने के बाद गांधी मैदान में भव्य प्रतिभागों की आकर्षक झांकियां निकाली गईं। इनमें से 21 टुकड़ियों वाली परेड की शुरुआत हुई, जिसमें 12 विभागों की विशेषता थी। परिवहन विभाग की झांकी पहले, कृषि विभाग की दूसरी, और ऊर्जा विभाग की तीसरी स्थान पर रही।

इस समारोह में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने जूते पहनकर तिरंगा फहराया। इसके बाद उन्होंने अपने झंडा वापस ले लिया और लोगों को दूर भेज दिया।

इसी तरह, दलित समाज से जुड़े 60 वर्षीय सिद्धेश्वर मांझी ने तिरंगा फहराया, जो गांधी मैदान पर विधायक समारोह की शुरुआत कर रहे थे।

गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान ने आज कहा है कि पटना में सांस्कृतिक स्थितियों और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
 
अरे, ये तिरंगा फहराने का माहौल बहुत खूबसूरत था 🎉। मैंने सोचा कि यह समारोह कितना ही रोमांचक लगेगा, लेकिन बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने तिरंगा फहराने के बाद अपने झंडा वापस ले लिया और लोगों को दूर भेज दिया। यह थोड़ा अजीब लगा, मुझे लगता है कि इसका अर्थ यह हो सकता है कि वह अपनी राजनीतिक हरकतों पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। लेकिन, तिरंगा फहराने का माहौल बाकी सबको प्रभावित कर दिया, खासकर गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान जी ने तिरंगा फहराया। यह दिखाता है कि हमारे देश में सांस्कृतिक स्थितियों और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की जरूरत है। 🇮🇳
 
ज़रूरी है कि हमारी समाज में गणतंत्र दिवस की पूरी शुभकामनाएं मिलें, लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि तिरंगा फहराने की प्रक्रिया थोड़ी जटिल हो गई है। मैंने देखा है कि बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने अपने झंडा वापस ले लिया, और यह देखने से अच्छा नहीं लगा। क्या यह हमारे गणतंत्र दिवस के अवसर पर सच्चाई को दर्शाता है?
 
बिल्कुल सही तो यह हुआ, लेकिन यह सवाल उठता है कि तिरंगा फहराने से हमें क्या मिलता है? क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक समारोह ही नहीं है, बल्कि हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत को भी प्रदर्शित कर रहा है? लेकिन इसके पीछे की तर्कसंगतता क्या है? क्या यह विशेष रूप से पटना में होने का महत्व है, या फिर यह एक समान घटना को देश भर में आयोजित करने की जरूरत है? 🤔
 
ਬਸ, ਗਾਂਧੀ ਮैदान 'ਚ ਰਾਜ्यपाल 'ਤੇ ਟੀ. वी. ਲੱਗਦਾ ਹੈ... 😅 ਪਿਛਲੇ ਸਮੇਂ ਵਿੱਚ ਆਏ ਰਾਜ ਭਾਗ ਸਾਥ ਕਰਨ 'ਤੇ, ਹੁਣ ਟੈਲੀਵਿਊਨ 'ਤੇ ਬੀ. ਜੀ. ਪਾਏ ਜਾ ਰਹੇ ਹਨ... 😂 ਅਸੀਂ ਗਣਤੰਤਰ ਦਿਵਸ 'ਤੇ ਕਈ ਚੀਜ਼ਾਂ 'ਤੇ ਬੋਲੀਏ, ਪਰ ਇਹ ਵੀ ਮੁੱਲ ਛੋੜ ਦਿਆ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ... 🙄

ਗਾਂਧੀ ਮैदान 'ਚ ਕਈ ਪਰਿਭਾਸ਼ਾਵਾਂ ਨੂੰ ਬੇਸ਼ੱਕ ਅਤਿਆਚਾਰਣਾ ਦੱਸੀਆਂ ਜਾਣੀਆਂ ਹਨ... 😕 ਮੈਂ ਗੁਰਮਿਤ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਭਾਲਣ ਦੀ ਆਪਵਾਦ ਕਰਨ ਲਈ ਟੀ. V ਬਣਾਉਣ ਲਈ ਜ਼ੋਰ ਦਿੱਤਾ, ਪਰ ਮੈਂ ਕੁਝ ਆਖਣ ਨਹੀਂ ਚਾਹੁੰਦਾ... 😊
 
🌹 मैंने अपने बचपन में जब तिरंगा फहराने का खेल था तो यह बहुत मजेदार था। आज भी जब आरिफ मोहम्मद खान ने गांधी मैदान में तिरंगा फहराया तो मुझे लगता है कि पटना में सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की जरूरत है। लेकिन जब मैंने देखा तो बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने जूते पहनकर तिरंगा फहराया, तो मुझे लगा कि यह बहुत अजीब है और ऐसा नहीं होना चाहिए। 🤔
 
बिल्कुल सही, 77वें गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने का माहौल बहुत अच्छा लगा। मैंने देखा था कि सामूहिक तिरंगा फहराने के बाद भव्य प्रतिभागों की आकर्षक झांकियां निकली गईं, जिसमें परिवहन विभाग की झांकी सबसे पहले, कृषि विभाग की दूसरी और ऊर्जा विभाग की तीसरी स्थान पर रही।

मैंने देखा कि बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने जूते पहनकर तिरंगा फहराया, लेकिन जल्द ही उन्होंने अपने झंडा वापस ले लिया। यह बहुत ही दिलचस्प है। और दलित समाज से जुड़े 60 वर्षीय सिद्धेश्वर मांझी ने तिरंगा फहराया, वह बहुत अच्छा दिख रहे थे।

मुझे लगता है कि गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान ने सही कहा है, पटना में सांस्कृतिक स्थितियों और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
 
मैंने बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी को देखा तो बहुत हैरान रह गया, जूते पहनकर तिरंगा फहराया। मुझे लगता है कि वह अपने झंडा वापस लेने के बाद इतना खुश था कि चेहरे पर एक सुंदर मुस्कान थी। लेकिन जब उन्होंने लोगों से दूर जाने की बात कही तो मुझे लगा कि वह जल्द ही फिर से अपने झंडे को फहराएगा।
 
अरे भाई, ये गणतंत्र दिवस क्या मुश्किल हुआ? पटना में गांधी मैदान में तिरंगा फहराने का क्या बड़ा मामला है? संजय सरावगी ने जूते पहनकर तिरंगा फहराया, और फिर झंडा वापस ले लिया? यह तो बहुत अच्छा तरीका है अपने राजनीतिक विरोधी को दूर भेजने का।

और सिद्धेश्वर मांझी ने तिरंगा फहराया, लेकिन यह तो थोड़ा अजीब है। अगर उन्हें गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने का मौका मिला, तो शायद वे अपने धर्म या समुदाय की झलक देना चाहेंगे। लेकिन नहीं, वे सिर्फ किसी अन्य पुरुष के रूप में तिरंगा फहराते हैं। यह बहुत अजीब है।

और गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान ने कहा है कि पटना में सांस्कृतिक स्थितियों और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। लेकिन यह तो बहुत आसान है। बस थोड़े पैसे डाल दो, और हमारे समाज में बदलाव आ जाएगा। लेकिन नहीं, यह तो बहुत भारी काम है।

क्योंकि मैं आपको बता रहा हूँ, भाई, कि गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने का मतलब हमेशा से ही एक बड़ा खेल था। और अगर आप इस खेल में शामिल नहीं हैं, तो आप बहुत पीछे रह जाएंगे।
 
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