राज्यसभा में महिलाओं के खिलाफ अपराध को लेकर पूछा गया गंभीर सवाल, जानें सरकार का जवाब

पॉक्सो अधिनियम के तहत महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों के त्वरित निपटान की बात में सरकार ने बहुत साहस कमाया है, लेकिन सच्चाई यह है कि अभी भी कई राज्यों में इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठने की जरूरत है। आइए देखें कि क्या सरकार ने वास्तव में इस मुद्दे को सीरियस लेते हुए कदम उठाए हैं या नहीं।

मामलों के समय पर निपटान के लिए कई कारक हैं, जिनमें न्यायाधीशों, समर्थन कर्मचारियों, भौतिक बुनियादी ढांचे, तथ्यों की जटिलता, साक्ष्य प्राप्त करने में समय, गवाहों और लिटिगेंट्स सहित प्रमुख हितधारकों का सहयोग शामिल है। लेकिन सरकार ने इन सभी कारकों पर ध्यान नहीं दिया है, जिसके कारण अदालतों में बाकी से अधिक व्यवधान हो रहे हैं।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग करने से नियमित समीक्षा बैठकों के माध्यम से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ जुड़ने में सरकार सफल रही है। लेकिन एफटीएससी को असम, बिहार, हरियाणा, तमिलनाडु और उत्तराखंड जैसे राज्यों को आवंटित करने से यह नहीं समझा गया कि इन राज्यों में विशेष अदालतों के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं या नहीं।

सरकार ने एक डैशबोर्ड विकसित किया है जो विस्तृत डेटा जुटाता है और उच्च न्यायालयों से इनपुट के माध्यम से एफटीएससी प्रदर्शन को ट्रैक करता है। लेकिन इसके अलावा, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने एक समर्पित पॉक्सो ट्रैकिंग पोर्टल विकसित किया है जो बाल कल्याण समितियों, जिला बाल संरक्षण इकाइयों, कानूनी सेवाओं के अधिकारियों और राज्य सरकारों के बीच अंतर-विभागीय समन्वय की सुविधा प्रदान करता है।
 
मेरे दोस्त, मैं तो आज कल पॉक्सो अधिनियम के बारे में बहुत उत्साहित हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि सरकार को अभी भी बहुत से काम करने होंगे। जैसे कि उन्हें पता होना चाहिए कि पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराधों को त्वरित निपटाने के लिए हमें न्यायिक ढांचे की जरूरत है, जैसे कि विशेष अदालतें, लेकिन मुझे लगता है कि सरकार ने अभी तक इसकी पर्याप्त योजना नहीं बनाई है। और फिर भी, उन्होंने एफटीएससी को कई राज्यों को आवंटित करने का प्रयास किया, लेकिन मुझे लगता है कि इससे सरकार को पता चला नहीं कि इन राज्यों में विशेष अदालतों के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं या नहीं।
 
सरकार ने पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराधों के त्वरित निपटान के लिए बहुत साहस कमाया है, लेकिन फिर भी कई राज्यों में इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठने की जरूरत है।

मुझे लगता है कि सरकार ने यह समझ नहीं ली है कि अपराध निपटान के लिए बुनियादी ढांचे और संसाधनों की कमी भी एक बड़ा कारक है, जो अदालतों में व्यवधान पैदा कर सकती है।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग करने से सरकार सफल रही है, लेकिन एफटीएससी को आवंटित राज्यों में पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।

सरकार ने एक डैशबोर्ड विकसित किया है जो विस्तृत डेटा जुटाता है, लेकिन इसके अलावा हमें यह भी देखना चाहिए कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसी) आर के पॉक्सो ट्रैकिंग पोर्टल कितना प्रभावी है।
 
ਸੱਚ ਤो ਇਹ ਅੱਜ ਵੀ ਨਿਰਣयਾਂ ਲੈਣ ਦਾ ਮੋਢਾ ਕਦੇ ਨਹੀਂ ਬਣਿਆ। ਸਾਰੀਆਂ ਪਛਾਣਾਂ, ਵਿਚਾਰ-ਤਰਕ ਅਤੇ ਸਮਾਜ ਦੇ ਹਮ-ਸ਼ਾਹੀ ਦੀ ਬਰਕਤਿ ਨਾਲ ਜਵਾਬ-ਪਛਾਣ ਦਿੱਤੀ ਗਈ।
 
मैंने देखा है कि सरकार ने पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराधों को त्वरित निपटान करने के लिए बहुत साहस कमाया है, लेकिन मुझे लगता है कि वे अभी भी अपने खेल में अच्छे नहीं हैं। ये तो सरकार की दोस्ती है, जैसे कि हम तो बोलते हैं "कोई बात न हो" 🤣

मुझे लगता है कि सरकार ने सिर्फ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग करके राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ जुड़ने में सफल रही, लेकिन फिर भी उन्होंने एफटीएससी को ऐसे राज्यों को आवंटित करने का चुनाव नहीं किया, जहां विशेष अदालतों के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। यह तो सरकार की मेहनत का मतलब है कि "मुझे दिल्ली में ही रहना चाहिए, और सबको दूसरे राज्यों को रखना चाहिए" 🤦‍♂️

लेकिन फिर भी, सरकार ने एक डैशबोर्ड विकसित किया है जो विस्तृत डेटा जुटाता है, और एनसीपीसीआर ने एक समर्पित पॉक्सो ट्रैकिंग पोर्टल विकसित किया है। यह तो अच्छा है, लेकिन मुझे लगता है कि सरकार को अभी भी अपने खेल में सुधार करने की जरूरत है, जैसे कि "बच्चों को बचाने के लिए" 🌟
 
सरकार ने तो बिल्कुल ठीक किया है... फिर भी, अदालतों में व्यवधान हो रहा है, लोगों की जिंदगी पर असर पड़ रहा है 🤕. और सरकार ने राज्यों को आवंटित एफटीएससी को सुनिश्चित करने के लिए बात नहीं की, तो अब यह देखना ही दिलचस्प होगा कि क्या वास्तव में सरकार ने इस मुद्दे पर ध्यान दिया है या नहीं। 🤔
 
सरकार ने पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराधों के त्वरित निपटान पर बहुत साहस दिखाया है, लेकिन अभी भी कई राज्यों में इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठने की जरूरत है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग करने से सरकार ने नियमित समीक्षा बैठकों में जुड़ने में सफलता पाई, लेकिन एफटीएससी को असम, बिहार, हरियाणा, तमिलनाडु और उत्तराखंड जैसे राज्यों को आवंटित करने से यह नहीं समझा गया कि इन राज्यों में विशेष अदालतों के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं।

सरकार की ओर से डैशबोर्ड विकसित करने से निराश हूं। हमें एक ऐसा पोर्टल चाहिए जो वास्तव में अपराधों के निपटान में मदद करे। सरकार द्वारा विकसित किया गया यह पोर्टल बेहतर है, लेकिन हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी राज्यों में इसकी उपलब्धता और उपयोग को बढ़ावा दिया जाए। 🚫💼
 
मैं तो लगता है कि सरकार ने पॉक्सो अधिनियम को लेकर बहुत बड़ी बात की है, लेकिन अब यह देखना इंटरेस्टिंग होगा कि वास्तव में उन्होंने इसे कैसे सीरियस लेते हुए कदम उठाए हैं। तो आइए देखें, क्या वे नियमित समीक्षा बैठकों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग कर रहे हैं या नहीं। और फिर यह सवाल उठता है कि एफटीएससी को जिस राज्यों में आवंटित किया गया, वहाँ विशेष अदालतों के लिए पर्याप्त संसाधन क्यों नहीं हैं। तो सरकार को यह जरूर साबित करना होगा कि उनके पास इन सब चीजों की योजना है। और फिर मैं सोचता हूँ कि अगर सरकार ने इतनी बड़ी बात की, तो क्या लोकसभा में भी चर्चा हुई?
 
सरकार ने पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराधों के त्वरित निपटान की बात में बहुत साहस कमाया है, लेकिन अभी भी कई राज्यों में इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठने की जरूरत है। मुझे लगता है कि सरकार ने वास्तव में इस मुद्दे को सीरियस लेते हुए कदम उठाए हैं और अब भी बहुत कुछ करने की जरूरत है।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग करने से सरकार सफल रही है, लेकिन एफटीएससी को आवंटित राज्यों में पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने एक समर्पित पॉक्सो ट्रैकिंग पोर्टल विकसित किया है जो बाल कल्याण समितियों और जिला बाल संरक्षण इकाइयों के बीच अंतर-विभागीय समन्वय की सुविधा प्रदान करता है।

मुझे लगता है कि सरकार ने अपने लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए कदम उठाए हैं, लेकिन अभी भी बहुत कुछ करने की जरूरत है।
 
मुझे लगता है कि सरकार ने यह कदम लेने में बहुत धैर्य रखा, लेकिन अभी भी कई राज्यों में पॉक्सो अधिनियम की प्रभावशीलता पर सवाल उठने की जरूरत है। आइए देखें कि सरकार ने वास्तव में इस मुद्दे को सीरियस लेते हुए कदम उठाए हैं या नहीं।

मेरे अनुसार, सरकार ने बहुत अच्छी बातें की हैं, जैसे कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग करने से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ जुड़ने में सफलता हुई है। लेकिन, एफटीएससी को असम, बिहार, हरियाणा, तमिलनाडु और उत्तराखंड जैसे राज्यों को आवंटित करने से यह नहीं समझा गया कि इन राज्यों में विशेष अदालतों के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं या नहीं।

मुझे लगता है कि सरकार ने एक अच्छी शुरुआत की है, लेकिन अभी भी बहुत काम करने की जरूरत है।
 
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