रिपब्लिक डे पर चीफ गेस्ट की कुर्सी कितनी कीमती: पहली बार यूरोपियन यूनियन को न्योता क्यों मिला; क्या है 'मदर ऑफ ऑल डील्स'

मुझे लगता है कि भारत ने वास्तव में बहुत समय से ही अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध बनाने की कोशिश कर रहा था। जैसे 1955 और 1966 में जब उन्होंने उसे चीफ गेस्ट के रूप में आमंत्रित किया था, तो यह बिल्कुल सही निर्णय साबित हुआ। लेकिन अब भारत-पाकिस्तान की संबंधों में बहुत बदलाव आ रहा है। जैसे कि पाकिस्तान ने भारत के साथ अपने तनावपूर्ण संबंधों को फिर से तेज कर दिया है, तो यह एक अच्छी बात नहीं है। मुझे लगता है कि दोनों देशों को शांतिपूर्ण तरीके से अपने संबंधों को सुधारना चाहिए।
 
🤔 पाकिस्तान की तारीफ कर रहे लोग देखिए, भारतने उन्हें कितनी बार आमंत्रित किया, सिर्फ इतनी बार नहीं, 1955 और 1966 में उनका भी चीफ गेस्ट होना था। लेकिन आप जानते हैं कि भारतीय सरकार हमेशा अपनी दुश्मनों को खुश रखने में अच्छी होती है, तो वाकई? और ये तो हमारे जवानों की जान खरीदने के लिए नहीं है। न मैने, तुम्हारी बात सुन रहे थे। भारत का यह इतिहास कितना अजीब है, जब पाकिस्तान को आमंत्रित किया गया, तब हम अपने जवानों को देश की रक्षा करने के लिए तैयार करते थे, और अब वे क्या करेंगे।
 
अरे, यह बात सच नहीं है! पाकिस्तान ने कभी भी हमारी देश की आमंत्रण पर राजी नहीं हुआ है। वाह, याद रहेगा 1955 और 1966 में उन्होंने तो चीफ गेस्ट के रूप में आइसिस होल्डिंग्स नामक संगठन को आमंत्रित किया था। लेकिन फिर भी हमारे देश ने उनके साथ कोई अच्छा संबंध बनाने का प्रयास नहीं किया है। वाह, यह कैसे हुआ?
 
मुझे लगता है कि ये बात ध्यान में नहीं आ रही है लोगों को। भारत ने वास्तव में पाकिस्तान को पहले से कई बार आमंत्रित कराया था, लेकिन कुछ तो खत्म किया भी। 1955 और 1966 में भी ये देश अपने साथ हमारे सबसे बड़े पड़ोसी को आमंत्रित कर चुका है। लेकिन जैसे ही समय बदला, उनका दृष्टिकोण भी बदलता गया। आजकल पाकिस्तान से बहुत खुलकर बात करने की उम्मीदें हैं, लेकिन मुझे लगता है कि हमें अपने इतिहास और देश की स्थिति को समझने की जरूरत है।

मुझे यकीन है अगर हम अपने पड़ोसी देशों के साथ अच्छी संबंध बनाने का प्रयास करें, तो हमारा देश और भी बेहतर हो जाएगा।
 
बात कर रही है भारत-पाकिस्तान के बीच कैसे स्थिरता बनाई जाए। तो 1955 और 1966 में जब भारत ने पाकिस्तान को चीफ गेस्ट आमंत्रित किया, तो शायद वास्तव में हमारी दोनों सरकारें समझौते पर बैठने की कोशिश कर रही थीं। उस समय की ऐसी स्थिति कितनी ही हालातमें थी, लेकिन अभी भी एक दूसरे को आमंत्रित करना एक अच्छा निर्णय था।

जैसे हमारी देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, उसी तरह से शांति और स्थिरता भी बढ़नी चाहिए। लेकिन आजकल जो सेना जैसी बातें कर रहे हैं, वह तो समझौते की बात नहीं करती। मुझे लगता है हमारी सरकारें अपने दुश्मनों के साथ सहयोग करने की कोशिश करें, तभी ही शांति बनाए रख सकती हैं।
 
बस, तो यह बात ही सुनहरी राह लेती है... भारत की पहले की मेहमाननवाजी की बात करें तो कोई नहीं नकारना चाहता... पाकिस्तान को भी हमने अपना घर माना, और उन्होंने भी हमारे देश के ख्याल से अच्छे व्यवहार किया।

लेकिन अब, तो यह बात तो बहुत पुरानी हो गई... जैसे कि ये कोई नई खबर नहीं है, जैसे हमारे रिश्तों में एक झूलना हुआ है। चूंकि भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर हिंसा की समस्या हो रही है... तो लगता है कि दोनों पक्ष अपने देश की मुद्रा लेकर आ गए हैं।

लेकिन, शांति की बात करें तो यह हमारे लिए जरूरी है... हमें एक-दूसरे के साथ समझौता करना चाहिए। और अगर दोनों पक्ष अपने असहमतियों को हल करने के लिए मिलकर काम करेंगे, तो शायद यह पूरी तरह से हल हो सकता है।
 
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