RAC: 'पूरे किराये में आधी सीट सही नहीं', संसदीय समिति ने की आरएसी यात्रियों को आंशिक किराया लौटाने की सिफारिश

भारतीय रेलवे में पूरी तरह से किराया वसूलने की नीति उचित नहीं है, ऐसा लोक लेखा समिति (पीएसी) ने अपनी नई रिपोर्ट में कहा है।

इस दौरान, समिति ने सुपरफास्ट ट्रेनों के मानदंडों पर भी सवाल उठाए हैं। यहां परिचालन शुरू होने के बाद अतिरिक्त पड़ावों के प्रभाव से कुछ ट्रेनों की औसत गति प्रभावित हुई है, और इसीलिए इन्हें नियमित रूप से नहीं माना जाता।

समिति को यह भी पता चला है कि 478 सुपरफास्ट ट्रेनों में से 123 ट्रेनों की निर्धारित गति 55 किमी प्रति घंटा से कम है। इनमें से ज्यादातर ट्रेनों को व्यस्तता की स्थिति में चौटे करना पड़ता है, इसीलिए यह उनके अधिकारों के खिलाफ है और इसके लिए रेलवे पर दबाव डालने की आवश्यकता है।

इस दौरान, समिति ने पांच तेजस वायुसेना में शामिल होने को तैयार ताकि वह 2008-19 तक महंगाई भत्ते की मांग कर सकें।
 
मुझे लगता है कि रेलवे नीतियों में बदलाव करना चाहिए, लेकिन पूरी तरह से किराया वसूलने की नीति ऐसा नहीं है। हमारे देश में गरीबों और मध्यम वर्ग को बहुत परेशानी होती है, इसलिए इन्हें फायदा होना चाहिए।

और सुपरफास्ट ट्रेनों के बारे में, यह ध्यान रखना जरूरी है कि इनमें से कई ट्रेनों की गति बहुत कम है। इससे उन्हें व्यस्तता की स्थिति में चौटे करना पड़ता है, जो उनके अधिकारों के खिलाफ है। हमें ऐसे नीतियों को बनाना चाहिए जिससे हर किसी को सम्मान मिले।
 
रेलवे में ऐसी नीति बनाने से अच्छा नहीं लग रहा, जिसमें सभी ट्रेनों को किराया वसूलने की आवश्यकता है। यह लोगों के लिए बहुत परेशान करेगा। और भी चिंताजनक बात यह है कि सुपरफास्ट ट्रेनों के मानदंडों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, जिससे उन्हें नियमित रूप से नहीं माना जाता। और यह बताया गया है कि कई ट्रेनों की निर्धारित गति 55 किमी प्रति घंटा से कम है, जो कि बहुत ही कम है।
 
रेलवे पर सरकार का यह निर्णय बहुत ही चिंताजनक है... क्या हमारे देश की रेलवे सेवाएं अपने ग्राहकों को विश्वास दिलाने के लिए या फिर अपने खुद के हितों को बढ़ाने के लिए बनाई गई हैं?

क्या हमारी सरकार समझती है कि रेलवे सेवाएं न केवल ग्राहकों के लिए बल्कि पूरे देश के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं?

क्या हम अपने ट्रेनों को विकसित करने और उनकी गति बढ़ाने पर पैसे खर्च करते हैं, लेकिन साथ ही साथ हमारे ग्राहकों की जरूरतों और अपेक्षाओं को भी ध्यान में रखें?

इसलिए, मुझे लगता है कि सरकार को अपने दिशा-निर्देशों में बदलाव लाना चाहिए ताकि हमारी रेलवे सेवाएं ग्राहकों के लिए बेहतर बन सकें...
 
भारतीय रेलवे में किराया वसूलने की नीति से लोगों को परेशान होने की ज्यादा बात नहीं है, लेकिन जो ट्रेनों की गति 55 किमी प्रति घंटा से कम है उनके अधिकारों के खिलाफ यह बहुत है। रेलवे में व्यस्तता की स्थिति में चौटे करना भी नहीं चाहिए, हमें आर्थिक समस्याओं को हल करने के लिए सोचना चाहिए।
 
मुझे लगता है कि रेलवे नीतियों में बहुत सारे अंतराल हैं। जैसे कि समिति ने कहा, पूरी तरह से किराया वसूलने की नीति उचित नहीं है। लेकिन क्या हमें यह पता है कि रेलवे को कितना खर्च आता है? और अगर वे पैसे कमाने की कोशिश करते हैं तो क्या इससे रेलफares में वृद्धि नहीं होती।

मुझे लगता है कि समिति ने सही सवाल उठाए हैं, लेकिन उनकी जांच और मूल्यांकन भी अच्छा नहीं था। क्या उन्होंने रेलवे की बजट से वास्तविक खर्च की तुलना नहीं की? और अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो यह रिपोर्ट में पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं है।

मुझे लगता है कि ट्रेनों की गति पर भी बहुत सारी गलतियाँ हैं। क्या हम उन्होंने जांचा कि क्यों ऐसा हुआ? और अगर वे तेजी से चलाने की कोशिश करते हैं तो इससे कोई फायदा नहीं होता।

मुझे लगता है कि हमें इन सभी सवालों के जवाब मिलने चाहिए। लेकिन अगर रिपोर्ट में पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं है, तो इसका कोई महत्व नहीं है।
 
रेलवे सिस्टम में इतनी जटिलताएं हैं कि सरकार सोच रही है कि सब कुछ किराया पर चलेगा, लेकिन वास्तविकता तो और अधिक जटिल है। रेलवे ट्रेनों की गति निर्धारित करने में इतनी जटिलताएं हैं कि यहां पर सुपरफास्ट ट्रेनों के नियमन को लेकर सवाल उठाना उचित है 🤔

मुझे लगता है कि रेलवे में अधिकारियों को अपनी गड़बड़ी और विनाशकारी निर्णयों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। इन ट्रेनों की गति निर्धारित करने में इतनी जटिलताएं हैं कि यहां पर कुछ सुधार की जरूरत है, नहीं तो रेलवे सिस्टम पूरी तरह से ढह जाएगा।
 
बड़े बड़े लोगो क्या कह रहे है... पूरी तरह से किराया वसूलने की नीति तो बस बुरी बात है। रेलवे पर ये नीति लागू होने के बाद से ट्रेनों की गति में कमी आ रही है, और यह ट्रेनों के अधिकारों का उल्लंघन है। 🚂😞

और जो सुपरफास्ट ट्रेनों के लिए निर्धारित गति 55 किमी प्रति घंटा तो ये मानो मजाक है। इन ट्रेनों पर कोई भी व्यस्तता की स्थिति में चौटे करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। यह सब लोगो को देखने को मिल रहा है कि हमारी रेलवे सेवाएं कहाँ तक बेहतर हैं। 🚫😡

और तेजस वायुसेना जैसी सेवाओं में पांच लोगो क्यों नहीं जाने चाहते? यह महंगाई भत्ते की मांग करने की जरूरत है तो हमारी रेलवे पर इसका पालन करें। सेना को ये तो सबसे पहले दिया जाना चाहिए। 🤦‍♂️
 
मुझे लगता है कि रेलवे में किराए से वसूलने की नीति तो अच्छी नहीं है, लेकिन एक दूसरा पक्ष भी है। अगर हमें अपने देश की आर्थिक स्थिति को देखना है तो यह एक अच्छा तरीका हो सकता है कि हमारे युवाओं को रोजगार मिले। लेकिन अगर हमारी युवाओं को रोजगार मिलने पर उन्हें चौता करना पड़ता है, तो यह हमारे देश के विकास के लिए नहीं है।

और सुपरफास्ट ट्रेनों के मानदंडों पर सवाल उठाने की बात, तो ये सच है कि इनमें कई पड़ाव हैं जो उनकी औसत गति को प्रभावित करते हैं। लेकिन अगर हमारी रेलवे सेवा में सुधार करना चाहते हैं, तो हमें अपने यात्रियों की जरूरतों को समझना होगा। 🤔
 
रेलवे में पूरी तरह से किराए वसूलने की नीति तो है या फिर? 🤔 पहले तो हमारे बच्चे अपनी पढ़ाई के लिए रेलवे पर भरोसा करते थे, अब वे पैसे देकर सीट बुक कर रहे हैं और माता-पिता को भी सीट बुक करनी पड़ती है 🤷‍♀️। यह तो हमारे बच्चों के भविष्य के लिए सही नहीं है।

और अगर हमारे सुपरफास्ट ट्रेनों में सवाल उठाए जा रहे हैं तो यह बिल्कुल सही है 🚂। उन्हें अधिक से अधिक लोगों को ले जाने के लिए तैयार नहीं होना चाहिए, बल्कि हमें उन्हें सुरक्षित और समय पर पहुंचाने वाले ट्रेनों की जरूरत है ⏰

मुझे लगता है कि सरकार को इस मुद्दे पर ध्यान देने की जरूरत है और रेलवे पर आर्थिक दबाव कम करने की जरूरत है। हमें अपने बच्चों के भविष्य के लिए सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण बनाए रखना चाहिए 🌿
 
अरे, इस रिपोर्ट को कैसे बनाया गया है? यह कहीं भारतीय रेलवे की प्रोफेशनलिटी नहीं दिख रही है। 478 ट्रेनों में से 123 की गति कम है? ये तो बिल्कुल गलत है, हमें यह जानने की जरूरत थी कि इन ट्रेनों का क्या काम है? और सुपरफास्ट ट्रेनों के मानदंड पर सवाल उठाना अच्छा नहीं है। लेकिन, यह एक बात है, समिति ने सोचा, हमें पता चल गया है कि रेलवे की प्रबंधन में कुछ गलत हो रहा है, लेकिन अब क्या करना? और 123 ट्रेनों को चौटे करना? यह तो एक बड़ी समस्या है।
 
रेलवे सिस्टम में बदलाव जरूरी है, लेकिन पूरी तरह से किराया वसूलने की नीति करना सही नहीं है। इससे गरीबों और मध्यम वर्ग के लोगों को बोझ बना सकती है।

और सुपरफास्ट ट्रेनों के मानदंडों पर सवाल उठाना भी जरूरी है, क्योंकि अगर इनकी निर्धारित गति कम होती है तो यह उनके अधिकारों के खिलाफ है।

रेलवे सिस्टम को देखते समय, हमें इसके लिए परिवर्तन की जरूरत है, लेकिन इस तरह की नीतियां नहीं बनाई जा सकतीं।
 
रेलवे सिस्टम साफ नहीं है 🚂, यह कह सकते हैं कि पूरी तरह से किराया वसूलने की नीति हमारे लिए सही नहीं है। जैसे ही हमें ट्रेनों में अधिक समय लगने वाला रास्ता दिया जाता है, तो फिर किसी को भी यह पता चलेगा कि कितनी पैसे मिल रहे हैं और कितने निकल रहे हैं। यह सिस्टम खोखला है 🤑, और हमें इसके बारे में जागरूक रहना चाहिए।
 
मेरे दोस्त, रेलवे में पूरी तरह से किराया वसूलने की नीति बिल्कुल सही नहीं है। इससे आम आदमी को बहुत परेशानी होगी। चूंकि इन ट्रेनों की निर्धारित गति कम है, इसलिए उन्हें व्यस्तता में चौटे करना पड़ता है जिससे उनके अधिकारों का उल्लंघन होता है।
 
किराए पर रेलवे बिलों से लोगों की जेब खाली करना और पैसे ट्रेनों में निवेश करना सही नहीं है 🙅‍♂️। यह तो बस आम आदमी को दीवाना बनाता है। और सुपरफास्ट ट्रेनों के लिए भी यह रणनीति ठीक नहीं है, क्योंकि ये ट्रेनें पुरानी हो गईं और उनकी गति कम हो गई, अब तो इन्हें दीवार में बंधकर चलना पड़ता है 🚫
 
किराए पर ट्रेनों से नहीं जुड़ना, यह समझ में आता है, लेकिन बाकी सब ठीक है? इन सुपरफास्ट ट्रेनों में भी ऐसे कुछ हैं जो रेलवे के नियमों का पालन नहीं करते, तो यह जरूरी नहीं कि हम उन्हें खत्म करें।

और तेजस वायुसेना में शामिल होने से पहले उनके अधिकारों और मांगों पर ध्यान देना चाहिए। सरकार को उनकी समस्याओं का समाधान ढूंढना चाहिए, न कि उन्हें सरकार के पक्ष में बोलकर खड़ा होना।

कुछ लोग सोचते हैं कि भारतीय रेलवे किसी तरह की चोरी कर रही है, लेकिन यह सच नहीं है। जरूरत है कि हम इस पर चर्चा करें और समाधान ढूंढें, न कि आलोचना करना।
 
Wow 🤯 तो ये सच है कि रेलवे में किराए वसूलने की नीति अच्छी नहीं है। और सुपरफास्ट ट्रेनों के लिए जो मानदंड बनाए गए हैं वे कुछ भी नहीं हैं। यार, 55 किमी प्रति घंटा कितनी धीमी गति है? और इन ट्रेनों को चौटे करना पड़ता है तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। रेलवे पर दबाव डालने की आवश्यकता है ताकि ये अधिकारियों से बात कर सकें और इन्हें बदलने की कोशिश करें।
 
रेलवे में बिल किराए से लेना सही नहीं है 🙅‍♂️, यह लोगों को परेशान करता है और बहुत भारी आत्मसात होता है। सुपरफास्ट ट्रेनों के लिए मानदंडें नहीं तय की जा सकती हैं अगर उनकी गति कम हो जाए 😬, यह लोगों को फिर परेशान कर देगा। और 478 ट्रेनों में से 123 की निर्धारित गति 55 किमी प्रति घंटा से कम है 🚫, यह बहुत भारी है।
 
मैंने पढ़ा है कि भारतीय रेलवे में सुपरफास्ट ट्रेनों की गति कई बार कम होती है। लेकिन, ये तो समझ नहीं आता कि क्यों? अगर वे इतनी तेज़ होनी चाहिए तो उन्हें पहले अच्छी मोटर देनी चाहिए। और, सुपरफास्ट ट्रेनों के बाद ये क्या भेदभाव कर रहे हैं कि उन्हें नियमित रूप से नहीं माना जाता। यह तो समझदारी का विरोध है 🤔

और, पांच तेजस वायुसेना में शामिल होने की बात तो अलग है, लेकिन, मैंने सुना था कि उनके साथ फ्रीलांस परियोजनाओं पर काम करने की भी संभावना है। तो ये क्या है? मुझे यह नहीं समझ आ रहा है कि वे वायुसेना कैसे जुड़े हुए हैं और फिर सुपरफास्ट ट्रेनों को लेकर इतनी चिंतित हैं। 🤷‍♂️

क्या मुझे बताएं, क्या ये सचमुच सही है? 😕
 
अरे, भारतीय रेलवे में पूरी तरह से किराया वसूलने की नीति तो थोड़ी चोटदार लग रही है... 🤔 ये लोग सुपरफास्ट ट्रेनों में जितना पैसा खर्च कर रहे हैं, वो किराए पर देने से भी अच्छा नहीं लगता। और समिति ने सच कहा, अतिरिक्त पड़ावों के प्रभाव से ट्रेनों की औसत गति प्रभावित हुई है, तो फिर उन्हें व्यस्तता की स्थिति में चौटे करना अच्छा नहीं लगता। हमें रेलवे पर दबाव डालने की जरूरत है ताकि ये नीतियां बदल जाएं और लोगों को अच्छा लगे। 🚂💪
 
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