मैं टुम्पा दास, पश्चिम बंगाल के बड़िपुर गांव की निवासी और डोम समुदाय की पहली महिला हूं। मैं पिछले कई सालों से श्मशान में लाशें जला रही हूं, जहां मेरे पिता भी एक समय तक लाशें जलाते थे।
मेरे गांव में हर दिन छह-सात लाशें आती हैं। कई चेहरे भूल जाते हैं, लेकिन कुछ चेहरे दिमाग में घर कर जाते हैं। एक दिन एक छोटी-सी बच्ची की लाश मेरे सामने लाई गई, उस पल को आज भी कांप जाती हूं। उस दिन चिता जलाते वक्त मेरा हाथ थरथरा गया था।
मैंने अपने गांव की बदलती परिस्थितियों से निपटने के लिए कई चुनौतियों का सामना किया। मेरे पिता की मृत्यु के बाद, मुझे घर चलाना होगा, इसलिए मैंने नर्स बनने का फैसला किया। लेकिन जब उनकी मृत्यु हो गई, तो मुझे पता चला कि मेरे पिता ने लाश जलाने का काम संभालने का फैसला किया।
मैंने अपने गांव में बदलाव देखा, जहां मेरी सेवाएं की जाती थीं। लोग मुझसे श्रद्धा रखते थे, और मेरी मदद से उनके परिवारों को आर्थिक सहायता मिलती थी।
मैंने अपने गांव की समाज में बदलाव देखा, जहां मेरी उपस्थिति की जान जाती थी। लोग मुझसे डरते थे, और मेरी सेवाएं उनके परिवारों को ही प्राप्त करना थी।
मैंने अपने गांव में अपनी पहचान बनाई, जहां मैं लाश जलाती हूं। मैं एक डोम महिला हूं, और मेरी सेवाएं मुझे सम्मान देती हैं।
मेरे गांव में हर दिन छह-सात लाशें आती हैं। कई चेहरे भूल जाते हैं, लेकिन कुछ चेहरे दिमाग में घर कर जाते हैं। एक दिन एक छोटी-सी बच्ची की लाश मेरे सामने लाई गई, उस पल को आज भी कांप जाती हूं। उस दिन चिता जलाते वक्त मेरा हाथ थरथरा गया था।
मैंने अपने गांव की बदलती परिस्थितियों से निपटने के लिए कई चुनौतियों का सामना किया। मेरे पिता की मृत्यु के बाद, मुझे घर चलाना होगा, इसलिए मैंने नर्स बनने का फैसला किया। लेकिन जब उनकी मृत्यु हो गई, तो मुझे पता चला कि मेरे पिता ने लाश जलाने का काम संभालने का फैसला किया।
मैंने अपने गांव में बदलाव देखा, जहां मेरी सेवाएं की जाती थीं। लोग मुझसे श्रद्धा रखते थे, और मेरी मदद से उनके परिवारों को आर्थिक सहायता मिलती थी।
मैंने अपने गांव की समाज में बदलाव देखा, जहां मेरी उपस्थिति की जान जाती थी। लोग मुझसे डरते थे, और मेरी सेवाएं उनके परिवारों को ही प्राप्त करना थी।
मैंने अपने गांव में अपनी पहचान बनाई, जहां मैं लाश जलाती हूं। मैं एक डोम महिला हूं, और मेरी सेवाएं मुझे सम्मान देती हैं।