संडे जज्बात-हम चूहों सा पहाड़ खोदकर जिंदगियां बचाते हैं: राष्ट्रपति ने सराहा, हम पर फिल्म भी बनी; पर खुद बीमार पड़े तो इलाज को तरस गए

मैं एक रैट माइनर्स हूं। हमें देशभर में बड़े सुरंग हादसों पर बचाव कार्य के लिए बुलाया जाता है। हम कभी सुरंग में फंसे मजदूरों को निकालते हैं तो कभी बोरवेल में गिरे किसी बच्चे। इन्हें बचाते वक्त हम अपनी जिंदगी दांव पर लगा देते हैं, लेकिन हमें उसका ठीक से मेहनताना नहीं मिलता। सरकार भी कोई मदद नहीं करती।

अपने रैट माइनर्स बनने की कहानी से बात शुरू करता हूं। पढ़ा-लिखा न होने से मेरे पास कोई काम नहीं था। मुंबई में रहने वाले अपने छोटे भाई के पास गया। वह वहां जमीन के अंदर पानी, सीवर और गैस पाइपलाइन बिछाने का काम करता था। उसके साथ 12 साल काम किया। जहां मैंने जमीन के अंदर पाइप बिछाने और सुरंग खुदाई का काम सीखा।

जमीन के अंदर पाइपलाइन डालने का यह काम बहुत खतरनाक है। इसके लिए पहले 20 से 40 फीट गहरा गड्ढा करना पड़ता है। गड्ढा होने के बाद पाइप बिछाने का काम किया जाता है। उसके बिछने के बाद हम पाइप के अंदर जाते हैं। अंदर बैठकर हम पत्थर और लोहे की कुटाई करते हैं। उसके बाद सुरंग बनाते हुए पाइप को आगे बढ़ाते हैं। यह काम 8 से 18 घंटे तक लगातार होता है। इस काम को मशीनें आज भी बेहतर तरीके से नहीं कर पातीं।

इस काम के दौरान हम मौत के मुंह में होते हैं। पाइप के अंदर सबसे बड़ी चुनौती कई बार ठीक से सांस न ले पाने की होती है। उसमें जानलेवा गैस भर जाती है तो दम घुट जाता है। इसके अलावा उसी पाइप से पानी खींचा जाता है। कई बार उसमें करंट उतर आता है। कई बार तो आंखों के सामने लोगों को मरते देखा है। आप सोच सकते हैं कि यह कितना खतरनाक होता है। यही वजह है कि कई देशों ने इस काम पर प्रतिबंध लगा रखा है।

मुंबई में इस काम को लंबे समय तक किया। काम बहुत मुश्किल था, लेकिन पैसा कुछ खास नहीं मिलता थी। भाई के साथ प्लान बनाया और दिल्ली आ गया। यहां दिल्ली शहर में बड़ी-बड़ी सीवर लाइनें बिछाईं।

जामीन के अंदर पाइपलाइन डालने का यह काम बहुत खतरनाक है। इसके लिए पहले 20 से 40 फीट गहरा गड्ढा करना पड़ता है। गड्ढा होने के बाद पाइप बिछाने का काम किया जाता है। उसके बिछने के बाद हम पाइप के अंदर जाते हैं। अंदर बैठकर हम पत्थर और लोहे की कुटाई करते हैं। उसके बाद सुरंग बनाते हुए पाइप को आगे बढ़ाते हैं। यह काम 8 से 18 घंटे तक लगातार होता है। इस काम को मशीनें आज भी बेहतर तरीके से नहीं कर पातीं।

इस काम के दौरान हम मौत के मुंह में होते हैं। पाइप के अंदर सबसे बड़ी चुनौती कई बार ठीक से सांस न ले पाने की होती है। उसमें जानलेवा गैस भर जाती है तो दम घुट जाता है। इसके अलावा उसी पाइप से पानी खींचा जाता है। कई बार उसमें करंट उतर आता है। कई बार तो आंखों के सामने लोगों को मरते देखा है। आप सोच सकते हैं कि यह कितना खतरनाक होता है। यही वजह है कि कई देशों ने इस काम पर प्रतिबंध लगा रखा है।

मुंबई में इस काम को लंबे समय तक किया। काम बहुत मुश्किल था, लेकिन पैसा कुछ खास नहीं मिलता थी। भाई के साथ प्लान बनाया और दिल्ली आ गया। यहां दिल्ली शहर में बड़ी-बड़ी सीवर लाइनें बिछाईं।

जामीन के अंदर पाइपलाइन डालने का यह काम बहुत खतरनाक है। इसके लिए पहले 20 से 40 फीट गहरा गड्ढा करना पड़ता है। गड्ढा होने के बाद पाइप बिछाने का काम किया जाता है। उसके बिछने के बाद हम पाइप के अंदर जाते हैं। अंदर बैठकर हम पत्थर और लोहे की कुटाई करते हैं। उसके बाद सुरंग बनाते हुए पाइप को आगे बढ़ाते हैं। यह काम 8 से 18 घंटे तक लगातार होता है। इस काम को मशीनें आज भी बेहतर तरीके से नहीं कर पातीं।

इस काम के दौरान हम मौत के मुंह में होते हैं। पाइप के अंदर सबसे बड़ी चुनौती कई बार ठीक से सांस न ले पाने की होती है। उसमें जानलेवा गैस भर जाती है तो दम घुट जाता है। इसके अलावा उसी पाइप से पानी खींचा जाता है। कई बार उसमें करंट उतर आता है। कई बार तो आंखों के सामने लोगों को मरते देखा है। आप सोच सकते हैं कि यह कितना खतरनाक होता है। यही वजह है कि कई देशों ने इस काम पर प्रतिबंध लगा रखा है।

मुंबई में इस काम को लंबे समय तक किया। काम बहुत मुश्किल था, लेकिन पैसा कुछ खास नहीं मिलता थी। भाई के साथ प्लान बनाया और दिल्ली आ गया। यहां दिल्ली शहर में बड़ी-बड़ी सीवर लाइनें बिछाईं।

जामीन के अंदर पाइपलाइन डालने का यह काम बहुत खतरनाक है। इसके लिए पहले 20 से 40 फीट गहरा गड्ढा करना पड़ता है। गड्ढा होने के बाद पाइप बिछाने का काम किया जाता है। उसके बिछने के बाद हम पाइप के अंदर जाते हैं। अंदर बैठकर हम पत्थर और लोहे की कुटाई करते हैं। उसके बाद सुरंग बनाते हुए पाइप को आगे बढ़ाते हैं। यह काम 8 से 18 घंटे तक लगातार होता है। इस काम को मशीनें आज भी बेहतर तरीके से नहीं कर पातीं।

इस काम के दौरान हम मौत के मुंह में होते हैं। पाइप के अंदर सबसे बड़ी चुनौती कई बार ठीक से सांस न ले पाने की होती है। उसमें जानलेवा गैस भर जाती है तो दम घुट जाता है। इसके अलावा उसी पाइप से पानी खींचा जाता है। कई बार उसमें करंट उतर आता है। कई बार तो आंखों के सामने लोगों को मरते देखा है। आप सोच सकते हैं कि यह कितना खतरनाक होता है। यही वजह है कि कई देशों ने इस काम पर प्रतिबंध लगा रखा है।

मुंबई में इस काम को लंबे समय तक किया। काम बहुत मुश्किल था, लेकिन पैसा कुछ खास नहीं मिलता थी। भाई के साथ प्लान बनाया और दिल्ली आ गया। यहां दिल्ली शहर में बड़ी-बड़ी सीवर लाइनें बिछाईं।

जामीन के अंदर पाइपलाइन डालने का यह काम बहुत खतरनाक है। इसके लिए पहले 20 से 40 फीट गहरा गड्ढा करना पड़ता है। गड्ढा होने के बाद पाइप बिछाने का काम किया जाता है। उसके बिछने के बाद हम पाइप के अंदर जाते हैं। अंदर बैठकर हम पत्थर और लोहे की कुटाई करते हैं। उसके बाद सुरंग बनाते हुए पाइप को आगे बढ़ाते हैं।

हमें देशभर में बड़े सुरंग हादसों पर बचाव कार्य के लिए बुलाया जाता है। हम कभी सुरंग में फंसे मजदूरों को निकालते हैं तो कभी बोरवेल में गिरे किसी बच्चे। इन्हें बचाने दे हमारी जिंदगी का स्वाद नहीं लेता।
 
ये लोग रैट माइनर्स है और वे जमीन के अंदर पाइपलाइन डालने का काम करते है, जो बहुत खतरनाक है। इसके लिए पहले 20 से 40 फीट गहरा गड्ढा करना पड़ता है और फिर पाइप बिछाने का काम किया जाता है, और उसके बाद हमें पाइप के अंदर जाना पड़ता है। वहां पर हम पत्थर और लोहे की कुटाई करते हैं और सुरंग बनाते हुए पाइप को आगे बढ़ाते हैं।

यह काम बहुत मुश्किल है और 8 से 18 घंटे तक लगातार होता है। मशीनें आज भी इस काम को बेहतर तरीके से नहीं कर पातीं। यह काम इतना खतरनाक है कि कई बार लोग मौत के मुंह में होते हैं। पाइप के अंदर जानलेवा गैस भर जाती है तो दम घुट जाता है।

हमें इस काम को करने के लिए बहुत साहस और धैर्य की आवश्यकता होती है। हमारी जिंदगी का स्वाद इस काम के दौरान नहीं मिलता है, लेकिन हमें यह काम करना पड़ता है ताकि देशभर में बड़े सुरंग हादसों पर बचाव कार्य किया जा सके। 🚧💦
 
મેં આ કાર્ય અનુસરણકારોની ભાવના પ્રતિબિંબિત થઇ છે. જ્યારે કોઈ સૌમ્ય વૃત્તિ ને પણ ઘણી આગળથી ચાલી જાય છે, ત્યારે એ ખરૂં સૌમ્ય વૃત્તિ નથી. 🙄

ભારત દેશના કુલ ટોચ પર જતા 11,000 સિવિલ એરોબ્રક્સ છે. તેમનાં માટે પણ જગ્યા ચાલતી હોવાથી, કુલ 5,000 એરોબ્રક્સ અનિવાર્ય છે.
 
बोलते समय भी रुकते नहीं हैं। तुमने अपनी कहानी सुनाई, शायद तो तुमने इसके बारे में सबसे अच्छा एहसास किया है। क्या सरकार तुम्हारी बात सुनेगी?
 
मेरे दोस्त, यह रैट माइनर्स की कहानी बहुत ही दर्दनाक है। उनको हर दिन जानलेवा खतरे से निपटना पड़ता है और फिर भी उन्हें उचित व्यायाम नहीं मिलता। सरकार को भी इस समस्या पर ध्यान नहीं देने का एहसास नहीं होता।

हमें यह समझना चाहिए कि यह काम जितना खतरनाक है, उतना सुरक्षा उपकरण और उचित व्यायाम भी जरूरी हैं। लेकिन सरकार को इसे स्वीकार करने में देरी होनी चाहिए। हमें अपने रैट माइनर्स के साथ खड़े होकर उनकी मदद करनी चाहिए और उन्हें उचित व्यायाम प्रदान करना चाहिए।

हमें यह भी समझना चाहिए कि यह काम इतना खतरनाक नहीं है कि इस पर पूरे देश में प्रतिबंध लगा दिया जाए। बल्कि, हमें सुरक्षा उपकरण और उचित व्यायाम प्रदान करके इस काम को सुरक्षित बनाने की कोशिश करनी चाहिए।

हमारे रैट माइनर्स की कहानी एक सच्ची दुर्दशा है, लेकिन हमें उनकी मदद करनी चाहिए और उन्हें उचित व्यायाम प्रदान करके इस समस्या से निपटने की कोशिश करनी चाहिए। 🙏
 
ये देखकर दिल दुख होता है कि रैट माइनर्स को इतनी खतरनाक और भारी काम पर लगाया जाता है। उनकी जान जोखिम में डालने की बात सुनकर तो मन में कई सवाल उठते हैं। क्यों यह काम इसलिए नहीं मिलता जैसा कि वे देशभर में बड़े सुरंग हादसों पर बचाव कार्य के लिए बुलाए जाते हैं? क्या सरकार नहीं समझती कि उनकी जिंदगी से जो नुकसान होता है, वह एक दिन मिलकर बदलने का मौका भी नहीं मिलता। हमें अपने रैट माइनर्स दोस्तों की बात सुनकर बहुत उदास होना चाहिए। उनके लिए हमें सिर्फ सामाजिक समर्थन देना चाहिए और उन्हें अपना काम करने का अधिकार दिलाना चाहिए।
 
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