सुप्रीम कोर्ट बोला- कोई भी शक्ति अनियंत्रित नहीं हो सकती: SIR के गंभीर परिणाम हो सकते हैं, 7 दस्तावेज तय तो 11 क्यों मांग रहे

चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं।

संविधान के अनुसार, कोई भी शक्ति अनियंत्रित नहीं हो सकती।

दलीलों में कहा गया है कि फॉर्म-6 में 7 दस्तावेज तय हैं, लेकिन सिर (SIR) प्रक्रिया में 11 दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। इसकी पुष्टि जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने की है, जिन्होंने कहा, 'कोई भी शक्ति पूरी तरह खुली नहीं हो सकती। चुनाव आयोग भी बिना रोक-टोक के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकता।'

राकेश द्विवेदी, चुनाव आयोग के वकील, ने कहा, 'धारा 21(3) चुनाव आयोग को एक अलग और स्वतंत्र शक्ति देती है। यह सामान्य संशोधन से अलग है।'

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'अगर धारा 21(2) में नियमों का पालन जरूरी है, तो 21(3) में आयोग खुद को अपनी ही प्रक्रिया से कैसे बाहर कर सकता है?'

संविधान के अनुसार, मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण है।

चुनाव आयोग ने कहा, 'हम देश निकाला नहीं दे रहे।'

इसके अलावा, चुनाव आयोग ने कहा, 'SIR प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दल जानबूझकर डर का माहौल बना रही हैं।'

संविधान के अनुसार, चुनाव आयुक्तों को आजीवन सुरक्षा देने वाला प्रावधान संविधान की भावना के खिलाफ हो सकता है।
 
मैं तो बस इतना कहूंगा, चुनाव आयोग जैसी सरकारी एजेंसियों की कुछ ऐसी चीजें होनी चाहिए जिनसे पासपोर्ट बनाने में भी कम टाइम लेना सीखो। यह मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया तो जरूर महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके नियम 11 दस्तावेजों से ज्यादा बोर हो गईं।

क्या हमारे चुनाव आयोग वाले देश में अभी भी फॉर्म-6 से भरने की खुशियाँ नहीं मिल रही हैं? शायद राकेश द्विवेदी, चुनाव आयोग के वकील, जिसने कहा कि धारा 21(3) चुनाव आयोग को एक अलग शक्ति देती है... लेकिन क्या वास्तव में वह समझते हैं कि यह कैसे सीमित करना है?

और फिर, चुनाव आयोग ने कहा, 'हम देश निकाला नहीं दे रहे।' तो अगर हमारी सरकार ने पहले देश को इतना अच्छा बनाने में 5 साल लग जाते, तो ये कैसे 7-8 महीनों में हो सकता है?

अगर संविधान के अनुसार मतदाता सूची में संशोधन प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण है, तो हमें फिर से सोच-विचार करने की जरूरत है। और चुनाव आयोग वालों को अपनी प्रक्रियाओं पर सुधार करने में समय देना चाहिए, न कि राजनीतिक दल जानबूझकर डर का माहौल बनाना।

क्या यह सही है? शायद नहीं। लेकिन इसके बारे में तो कुछ सोच लेना जरूरी है। 🤔
 
मुझे ये मामला बहुत गंभीर लग रहा है 🤕। चुनाव आयोग की शक्तियों पर इतना विवाद, यह संविधान की लचीलेपन को कम कर रहा है।

जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बात में सहमति है, कोई भी शक्ति पूरी तरह खुली नहीं हो सकती। चुनाव आयोग को भी अपने अधिकारों का उपयोग सीमित करना चाहिए।

राजनीतिक दलों द्वारा डर का माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह उनकी गलती नहीं है। हमें संविधान की भावना को बनाए रखना चाहिए।

आज के समय में, हमें अपने मतदाताओं और उनकी सुरक्षा का ख्याल रखना चाहिए। यह एक बड़ी जिम्मेदारी है लेकिन इसे भी पूरा करना होगा।
 
मुझे लगता है कि चुनाव आयोग की शक्तियों पर चर्चा करने से पहले हमें सिर्फ एक सवाल करना चाहिए - क्या हम देश के भविष्य को खोने के लिए इतने छोटे बदलाव में फंस गए हैं?
 
यदि SIR प्रक्रिया में फॉर्म-6 में 7 दस्तावेज मांगना सही है तो चुनाव आयोग को नियमों से बाहर जाने देना भी सही नहीं है। यह बहुत ही गंभीर मुद्दा है। शायद इसके लिए कोई नया अधिनियम बनाने की जरूरत है ताकि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया स्पष्ट हो। 🤔

चुनाव आयोग को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि SIR प्रक्रिया में किसी भी तरह के राजनीतिक दबाव या धमकी न लगे। इससे मतदाताओं की सुरक्षा और संविधान की धारणा पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। 🚫

आजकल चुनाव आयोग को अपनी शक्तियों का सही तरीके से उपयोग करना चाहिए ताकि मतदाताओं को सुरक्षित और निश्चित रूप से अपना मत डालने में मदद मिले।
 
आज कल तो ऐसे मामले बन जाते हैं कि सोच लेने का भी समय नहीं रहता। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं। इसके पीछे क्या जिम्मेदारी है?

आज कल संविधान का मतलब तो केवल एक दस्तावेज के रूप में ही देखा जाता है। लेकिन उसके पीछे की अर्थ पूरी नहीं समझी जाती।

सिर्फ इसलिए कहकर कि चुनाव आयोग भी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकता है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह शून्य सीमाएं रखे सकता।

कुछ लोग कहते हैं कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन क्या हम इस बारे में सही तरीके से सोच रहे हैं?

आज कल नेटिज़न्स तो चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हैं, लेकिन कभी-कभी उन्हें पता नहीं चलता कि वे ऐसे कहां जा रहे हैं।

मुझे लगता है कि हमारा संविधान बहुत अच्छा है, लेकिन उसको समझने में हमें कुछ सुधार करना होगा।
 
अरे, यह तो बहुत बड़ा मुद्दा है! चुनाव आयोग की शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट ने बात की है, लेकिन अभी भी कुछ नहीं बदला गया। संविधान के अनुसार, कोई भी शक्ति अनियंत्रित नहीं हो सकती, लेकिन यहाँ आयोग खुद को अपनी ही प्रक्रिया से बाहर कर रहा है।

यह तो चुनाव की अखंडता के लिए खतरा है! अगर हमारी नागरिक सूची में संशोधन की प्रक्रिया ठीक नहीं है, तो हमारे देश की जान-माल बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है।

कोई भी शक्ति पूरी तरह खुली नहीं हो सकती, लेकिन चुनाव आयोग को अपनी प्रक्रिया में थोड़ा धैर्य रखना चाहिए। अगर वे SIR प्रक्रिया से ज्यादा मांगने लगें, तो यह राजनीतिक दलों के लिए एक बहुत बड़ा मौका होगा।

हमें अपने देश की सच्चाई की तलाश करनी चाहिए। हमें पता लगाना चाहिए कि चुनाव आयोग की शक्तियाँ संविधान के अनुसार कहाँ सीमित हैं और कहाँ नहीं।

हमारे देश को सच्चाई और न्याय की ओर बढ़ने की जरूरत है, यह तो हमें पता है!
 
मतदाता सूची में संशोधन की बात कर रहे हैं...

राजनीतिक दलों को लगता है कि चुनाव आयोग मतदाताओं के लिए पैसे दे सकता है, लेकिन इसके विरुद्ध संविधान का सिद्धांत है। अगर हमारी नींव पर गड़बड़ी आ जाए तो फिर देश क्या होता है?

आजकल चुनाव आयोग की शक्ति पर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन इसका सबूत नहीं है। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि चुनाव आयुक्त अपने निर्णयों में न्याय और निष्पक्षता लाएं।

संविधान की संरचना बहुत स्मार्ट है, अगर हम इसका पालन करें तो फिर देश अच्छा चलेगा। यही बात चुनाव आयोग से भी मिल रही है।
 
तो यह तो बिल्कुल सही है कि संविधान में कोई शक्ति अनियंत्रित नहीं हो सकती। लेकिन हमें समझना चाहिए कि चुनाव आयोग के पास भी कुछ सीमाएं हैं। अगर वे SIR प्रक्रिया में 11 दस्तावेज़ मांग रहे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे बिना रोक-टोक के अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं।

मुझे लगता है कि चुनाव आयोग की ओर से कहा गया है कि हमें SIR प्रक्रिया में थोड़े बदलाव लाने की जरूरत है, लेकिन इसके लिए एक विशेष अधिकार की आवश्यकता नहीं है। और यह तो राजनीतिक दल जानबूझकर डर का माहौल बना रहे हैं, ना कि चुनाव आयोग।
 
बिल्कुल सही कहा जा रहा है 🤔, चुनाव आयोग की शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है, और हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया संविधान के अनुसार हो। चुनाव आयोग को अपनी शक्तियों का सही तरीके से इस्तेमाल करने की आवश्यकता है, और हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि राजनीतिक दलों द्वारा मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया को लेकर डर का माहौल नहीं बनाया जाए। इसके अलावा, चुनाव आयुक्तों को आजीवन सुरक्षा देने वाला प्रावधान संविधान की भावना के खिलाफ हो सकता है, इसलिए हमें यह ध्यान रखना होगा।
 
मेरी बात यह है कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया बहुत जटिल हो गई है, लेकिन फिर भी हमें इसके नियमों का पालन करना चाहिए।

क्या कभी सोचते थे कि मतदाता सूची में संशोधन कैसे किया जाता है? और इसमें 7 दस्तावेज तय होने चाहिए, लेकिन फिर भी SIR प्रक्रिया में 11 दस्तावेज मांगे जा रहे हैं? यह बहुत अजीब है,

चुनाव आयोग को अपनी शक्ति का इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन फिर भी हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि वे नियमों का पालन कर रहे हैं।

मुझे लगता है कि चुनाव आयोग ने कहा, 'हम देश निकाला नहीं दे रहे।' यह सच है, लेकिन फिर भी हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि वे मतदाताओं को डराने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।

चुनाव आयुक्तों को आजीवन सुरक्षा देने वाला प्रावधान संविधान की भावना के खिलाफ हो सकता है, लेकिन फिर भी हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे चुनावों में न्याय हो।

मैं मतदाताओं के अधिकारों पर बहुत जोर देता हूँ। हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारी आवाज सुनी जाए और हमारे वोट को महत्व दिया जाए।
 
ज्यादा संशोधन तो चुनाव आयोग के लिए जरूरी नहीं है 🙅‍♂️, मतदाताओं की जानकारी बदलने के लिए जरूरी है ❤️, यह देखकर मुझे बहुत गुस्सा हो गया है। चुनाव आयोग कह रहा है कि वे डर का माहौल बना रहे हैं 🤬, लेकिन उनकी बात सुनकर तो लगता है कि वे खुद अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर रहे हैं। संविधान के लिए कुछ भी बदलने से पहले इस पर चर्चा करनी चाहिए, न कि जस्टिस जॉयमाल्य बागची को जिम्मेदार ठहराकर 🤦‍♂️
 
मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट की बात समझ में आती है, लेकिन चुनाव आयोग को विशेष रूप से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रक्रिया सार्थक और निष्पक्ष हो। अगर मतदाता सूची में बदलाव होना जरूरी है, तो इसकी जांच करने वाली अधिकृत टीम बनाई जानी चाहिए। लेकिन यह भी सच है कि चुनाव आयोग को अपनी शक्तियों का सही इस्तेमाल करना चाहिए, न कि राजनीतिक दल द्वारा दबाव में आने पर।

तो, आइए सुप्रीम कोर्ट की बात समझें और यह भी सुनिश्चित करें कि प्रक्रिया सार्थक हो। अगर नहीं, तो इससे लोकतंत्र को नुकसान पहुंच सकता है।

🙏
 
मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सही बात कही है। चुनाव आयोग को मतदाता सूची में संशोधन करने की प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन सिर (SIR) प्रक्रिया में इतने दस्तावेज लेने से लगता है कि यह कुछ और है।

मुझे लगता है कि चुनाव आयोग को अपनी प्रक्रिया को खुलकर समझाना चाहिए, ताकि सभी जानते हों कि वे क्या कर रहे हैं। लेकिन अब यह दिखने लगा है कि चुनाव आयोग ने कुछ ऐसा सोचा है, जो राजनीतिक दलों को डराने का मौका देता है।

मुझे लगता है कि चुनाव आयुक्तों को आजीवन सुरक्षा देने वाला प्रावधान संविधान की भावना के खिलाफ है, जैसा कि जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा है।
 
मुझे लगता है कि चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की चिंताएं उचित हैं। चुनाव आयोग को संविधान के अनुसार अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने की आजादी होनी चाहिए, लेकिन इसके साथ ही कुछ भी व्यक्तिगत राजनीति पर नहीं चलना चाहिए।

मतदाता सूची में संशोधन एक बहुत बड़ी बात है, और इसकी प्रक्रिया को लेकर बहुत सारे सवाल उठ रहे हैं। अगर मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया विशेष रूप से सुरक्षित होती है तो यह अच्छा होगा।

लेकिन इस बात पर चिंता होनी चाहिए कि अगर मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया बहुत अधिक खुली होती है तो इससे राजनीतिक दलों के लिए फायदा भी हो सकता है।
 
मुझे लगता है कि बीती ज़िंदगी में मतदाता सूची में संशोधन करना आसान था, तो अब ऐसा नहीं होना चाहिए। तो दिनों में, हमारे पिताजी और माताजी, वोट डालने के लिए कहीं न कहीं की गई दूरी तय करते थे। वहाँ तक पहुँचने के लिए ट्रेन या बस होती थी। अब इतनी आसानी से मतदाता सूची में बदलाव करने की बात, मुझे नहीं लगती कि यह सही है।

आजकल वोट डालने के लिए हर तरह के तरीके अपनाए जा रहे हैं। फिर भी, हमने हालिया चुनावों में बहुत सारी समस्याओं को देखा। मतदाताओं की गिनती में गलती, और फिर वोट डालने के लिए ऐसी कई तरकीबें। यह सब, पिछले नेताओं की तुलना में बहुत ही नई चीजें हैं।

मुझे लगता है, जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, वोट डालने की तकनीकों में भी बदलाव आएगा। लेकिन इससे मतदाताओं को यह महसूस करना चाहिए कि उनकी बात सुनी गई और उनका देश समझा। वोट डालने की तकनीकें बदलें, लेकिन हमारा राष्ट्रीय जीवन बदल न सके।
 
मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया तो बहुत जटिल है, लेकिन ये सवाल उठता है कि हम अपने मतदान अधिकार को कितना महत्व देते हैं? क्या हम यह नहीं समझते कि हमारी आवाज़ एक शक्तिशाली हथियार है? चुनाव आयोग के पास भी इसकी जिम्मेदारी है, लेकिन इससे पहले कि वे कोई बदलाव करें, उन्हें यह सोचना चाहिए कि उनके काम में किसी भी तरह की गलती न हो।

मुझे लगता है कि हमें अपने देश की सच्चाई को पहचानने की जरूरत है, और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारा संविधान एक शक्तिशाली माध्यम है जो हमें अपने अधिकारों की रक्षा करने में मदद करता है। लेकिन इसके साथ ही, हमें यह समझना भी चाहिए कि हमारे देश की सच्चाई को देखने के लिए हमें खुद को जानने की जरूरत है, और अपने आप को प्रश्न करने की जरूरत है कि हम अपने संविधान को कैसे समझते हैं?
 
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