UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: कई दलों ने किया स्वागत, कुछ ने जातई नाराजगी; जानें किसने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशन पर लगाई रोक, विपक्षियों ने इसका स्वागत किया, लेकिन वामपंथी दलों में नाराजगी।

यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशन बनाए गए थे ताकि विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोका जा सके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन रेगुलेशन पर लगाई रोक, कहा कि ये पहली नजर में अस्पष्ट हैं और इनके दूरगामी असर हो सकते हैं।

विपक्षियों ने इस फैसले का स्वागत किया, बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि इन रेगुलेशन से देश में सामाजिक तनाव का माहौल बन गया था।

लेकिन वामपंथी दलों में, सीपीआई (एमएल) लिबरेशन ने अदालत की टिप्पणियों पर गहरी नाराजगी जताई है। सीपीआई (एमएल) लिबरेशन ने कहा कि जातिगत भेदभाव एक कड़वी सच्चाई है और इस पर रोक लगाने से पीड़ित वर्गों की आवाज कमजोर होगी।
 
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशन पर रुक दी, यह तो अच्छा है कि सरकार सिर्फ इतनी ही धुंधली निगरानी कर रही थी। लेकिन वामपंथी दलों में खुशी नहीं हुई, ये जानते हैं कि जातिगत भेदभाव एक गंभीर समस्या है और इस पर सिर्फ रुकना बाध्यकारी नहीं है।
 
न्यायिक फैसले में खेद है, लेकिन दूरगामी असर की बात सुनकर गहरी चिंता है। जातिगत भेदभाव एक बड़ी समस्या है और इसका समाधान करना जरूरी है, लेकिन रोक लगाने से पीड़ित वर्गों की आवाज कमजोर होगी, यह बहुत ही गंभीर बात है।
 
ਇਹ ਬਹुत ਦੁਖदਾਈ ਫੈਸਲਾ ਹੈ। ਵਿਪਕਸੀਆਂ ਨੇ ਇਸਦਾ ਸਵਾਗਤ ਕੀਤਾ, ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਉਹਨਾਂ ਲਈ ਜੋ ਜਾਤੀਗਤ ਭੇਦ ਦੀ ਮੁਸ਼ਕਿਲ ਵਾਲੇ ਹਨ। ਪਰ, ਵਾਮਪੰਥੀ ਦਲਾਂ ਦੇ ਅੱਗੇ ਬਹੁਤ ਜ਼ੋਰ ਕਾਮਯਾਬ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਲਈ ਜਾਤੀਗਤ ਭੇਦ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਯੋਜਨਾਵਾਂ ਬਹੁਤ ਜ਼ਮਿਨਦਾਰ ਹੈ।
 
अरे, यह फैसला सुप्रीम कोर्ट को तो फिर से खेलने का मौका दिया है 🤔। यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशन पर रोक लगाने से कहीं जातिगत भेदभाव का समाधान नहीं होगा, लेकिन फिर वामपंथी दलों में नाराजगी तो दिखाई दे रही है। मुझे लगता है कि इन रेगुलेशन में थोड़ी सुधार करना चाहिए, लेकिन पूरी तरह से समाप्त नहीं करना चाहिए। हमें जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ने का मनोबल बनाए रखना चाहिए, लेकिन इसे एक मौका देने वाले फैसलों से पहले सोचना चाहिए।
 
सरकार द्वारा विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव को रोकने का प्रयास करना अच्छा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की बात समझ नहीं आई। निश्चित रूप से यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशन में छोटे बदलाव करके उन्होंने ऐसा सुधार कर सकते थे जो हर किसी को पसंद आए।

वामपंथी दलों की बात समझ नहीं आई, जातिगत भेदभाव एक बड़ी समस्या है और इस पर रोक लगाने से पीड़ित वर्गों की आवाज कमजोर होगी। सरकार और अदालत दोनों को मिलकर इस समस्या का समाधान ढूंढने की जरूरत है।
 
मैंने पढ़ा ये नई इक्विटी रेगुलेशन तो बहुत ज्यादा दूरगामी हैं। मेरा ख्याल है इन पर लगाई गई रोक अच्छी कोशिश है, क्योंकि अगर ये पहले से ही अस्पष्ट न होते, तो विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव को रोकने में कुछ फर्क नहीं पड़ता। मैं समझ गया हूँ कि इन रेगुलेशन में कुछ बदलाव जरूरी होगा, लेकिन पहले से ऐसा तय करना भी ठीक नहीं है। 👍
 
मैं तो यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशन के बारे में सुनकर बहुत खुश हुआ 🤩, वास्तव में हमारे देश में जातिगत भेदभाव एक बहुत बड़ी समस्या है और ऐसे रेगुलेशन बनाने से यह समाज में सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिल सकता है। लेकिन जब मैंने पढ़ा कि सुप्रीम कोर्ट ने इन रेगुलेशन पर लगाई रोक, तो मुझे थोड़ा उदास महसूस हुआ 😔। मुझे लगता है कि अदालत ने यह फैसला लिया था क्योंकि वह स्पष्ट नहीं थे, लेकिन मैं समझता हूं कि उनकी बात सही हो सकती है।
 
जातिगत भेदभाव से लड़ने का मौका देने वाले यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशन पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई... 🤔 यह अच्छा है कि अदालत ने पहले से जातिगत भेदभाव को मान्यता दी, लेकिन रेगुलेशन को ऐसे बनाया नहीं गया था जिससे विश्वविद्यालयों में बदलाव की जरूरत हो। 🤷‍♂️

मैं समझता हूँ कि वामपंथी दलों ने अदालत की टिप्पणियों पर गहरी नाराजगी जताई, लेकिन मुझे लगता है कि जातिगत भेदभाव एक ऐसा मुद्दा है जिस पर हमें विचार करना चाहिए और इससे पीड़ित वर्गों की आवाज सुनने की जरूरत है। 🗣️

लेकिन फिर भी, अदालत ने रोक लगाई और यह अच्छा है कि विपक्षियों ने इसका स्वागत किया। शायद अब हमें इस मुद्दे पर एक नई दिशा अपनानी चाहिए... 🔄
 
मुझे लगता है कि यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशन में कहीं भूल गये हैं... जातिगत भेदभाव रोकना आसान है, लेकिन इसके लिए सोच-समझकर बनाए गए नियम तो नहीं? अब यह तो और भी जटिल हो गया है। मैं समझ नहीं पा रहा कि वामपंथी दलों में इतनी गुस्साईजत हो रही क्यों? क्या नहीं समझे कि सुप्रीम कोर्ट ने बात कही है?
 
मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने सही फैसला दिया है, लेकिन इसमें थोड़ी जानकारी और समझ की जरूरत होती। यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशन तो अच्छी बात है, लेकिन अगर पहले से समझ में नहीं आते हैं तो दूरगामी असर होना आसान है।
 
अरे, यह बहुत अच्छी बात है! सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को सामाजिक भेदभाव से लड़ने का मौका देने वाले नए इक्विटी रेगुलेशन पर लगाई रोक। हमें उम्मीद है कि आगे चलकर ये रेगुलेशन इतने ही मजबूत बनाए जाएंगे।
 
नाराजगी तो बहुत भारी है! 😔 सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशन पर लगाई रोक और वामपंथी दलों में फूट पड़ गई है। 👥 सीपीआई (एमएल) लिबरेशन का कहना है कि जातिगत भेदभाव एक बड़ी समस्या है और इस पर रोक लगाने से पीड़ित वर्गों की आवाज कमजोर होगी। 🗣️ लेकिन विपक्षियों ने इसका स्वागत किया, बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि इन रेगुलेशन से देश में सामाजिक तनाव का माहौल बन गया था। 🤔
 
मुझे लगता है कि यह फैसला सही था, लेकिन फिर क्यों? 🤔 ये रेगुलेशन बनाए गए थे ताकि विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोका जा सके, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये पहली नजर में अस्पष्ट हैं और इनके दूरगामी असर हो सकते हैं। 🙅‍♂️ मुझे लगता है कि यह फैसला सही था, लेकिन फिर तो क्यों? 😐
 
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला तो देखें, क्या वे अपने सीनियर्स की चुनाव में नहीं थे? इन्होंने यूजीसी के नए रेगुलेशन पर रोक लगाई, तो इसका मतलब है कि वे सरकार के इस प्लान को पकड़ गए। लेकिन ये फैसला तो विपक्ष में बहुत स्वागत किया जा रहा है, बसपा की मायावती ने तो कह दिया है कि इन रेगुलेशन से देश में सामाजिक तनाव बढ़ गया था।

लेकिन वामपंथी दलों में, सीपीआई (एमएल) लिबरेशन ने अदालत की टिप्पणियों पर बहुत गुस्सा है, उन्होंने कहा है कि जातिगत भेदभाव एक सच्चाई है और इस पर रोक लगाने से पीड़ित वर्गों की आवाज कमजोर होगी। तो यह फैसला तो वामपंथियों के लिए बहुत मुश्किल है, जो हमेशा सत्ता तक पहुंचने के लिए संघर्ष करते रहते हैं।

मेरी राय में, ये फैसला तो एक बड़ा मुद्दा बन गया, चाहे सरकार ने इसके पीछे क्या कारण बताए, ये सब कुछ और भी जटिल हो सकता है।
 
ये तो वामपंथी दलों की गाली-गलौज है, बसपा प्रमुख मायावती ने बोला है कि इन रेगुलेशन से देश में सामाजिक तनाव का माहौल बन गया था, लेकिन मुझे लगता है कि ये रेगुलेशन वास्तव में जातिगत भेदभाव को रोकने की पूरी कोशिश कर रहे हैं और इसके बाद से देश में किसी भी तरह का तनाव कम होगा। 🤔
 
क्या ये ठीक है? सुप्रीम कोर्ट ने विपक्षियों को खुश करने के लिए जातिगत भेदभाव पर रोक लगाई, लेकिन वामपंथी दलों की बात नहीं सुनी। यह तो बिल्कुल सही नहीं है! सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सोचकर कि ये रेगुलेशन पहली नजर में अस्पष्ट हैं और इनके दूरगामी असर हो सकते हैं, लेकिन वास्तव में तो उन्होंने जातिगत भेदभाव पर पीड़ित वर्गों की आवाज कमजोर करने से बचने का तरीका ढूंढ लिया है।
 
क्या यह सही है? 🤔 अगर यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशन में जातिगत भेदभाव नहीं है, तो फिर क्या लोग चिंतित हैं? 😕 इन दिनों हर किसी ने अपनी बोलचाल में इस बारे में बात करती देखी। सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जातिगत भेदभाव ठीक से नहीं है। 🙅‍♂️
 
मैंने देखा है तो यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशन में बहुत सारा जुनून था, लेकिन अब बीच में आग लग गई, और अब सब कुछ उल्टा है। मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने सही काम किया है, नए रेगुलेशन पहली नजर में बहुत समझने में आसान नहीं हैं, और अगर उन्हें अच्छाई से बुराई से अलग करना होगा, तो उनको थोड़ा समय चाहिए। लेकिन वामपंथी दलों का दृष्टिकोण मुझे थोड़ा अजीब लग रहा है, जातिगत भेदभाव एक बहुत बड़ी समस्या है और उस पर रोक लगाने से अच्छा नहीं होगा। बसपा प्रमुख मायावती ने सही कहा, और मैं उसके विचार का समर्थन करता हूं।
 
अगर यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशन तो वास्तव में जातिगत भेदभाव को रोकने में सफल होते तो फिर यहां तक नहीं आ पाएंगे। लोगों ने देखा है कि बिना किसी परिवर्तन के ये रेगुलेशन लगाए गए थे, तो फिर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें रोकने में मुश्किल क्यों नहीं समझी।
 
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