भारत में शिक्षा की नीति पर लगी नई चेतावनी, यूजीसी नियमों का विरोध।
कैसरगंज से भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने मंगलवार को सरकार की इस नीति पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा, "यूजीसी के नए नियम उच्च शिक्षा के विकेंद्रीकरण की मूल भावना के खिलाफ हैं और इससे राज्यों तथा स्थानीय विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता प्रभावित होगी।"
उनके अनुसार, एकरूप नियम थोपना शिक्षा जैसे संवेदनशील और विविधताओं से भरे क्षेत्र में व्यवहारिक नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं।
बृजभूषण शरण सिंह ने कहा, "नए नियमों से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के विश्वविद्यालयों को सबसे अधिक नुकसान होगा।"
उन्होंने कहा, "केंद्र सरकार को नीति बनाते समय ज़मीनी हकीकत और शिक्षकों-छात्रों की राय को प्राथमिकता देनी चाहिए थी, लेकिन यूजीसी के नए नियमों में यह संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती।"
उनका कहना है कि अत्यधिक केंद्रीकरण से न केवल अकादमिक स्वतंत्रता सीमित होगी, बल्कि नवाचार और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम विकसित करने की क्षमता भी कमजोर पड़ेगी।
भाजपा के पूर्व सांसद द्वारा इस तरह सार्वजनिक रूप से विरोध दर्ज कराना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह दर्शाता है कि शिक्षा नीति जैसे मुद्दों पर पार्टी लाइन से हटकर भी विचार रखने की गुंजाइश है।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया है कि यूजीसी के नए नियमों पर पुनर्विचार किया जाए और राज्यों, विश्वविद्यालयों, शिक्षकों तथा विशेषज्ञों से व्यापक संवाद के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाए।
कैसरगंज से भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने मंगलवार को सरकार की इस नीति पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा, "यूजीसी के नए नियम उच्च शिक्षा के विकेंद्रीकरण की मूल भावना के खिलाफ हैं और इससे राज्यों तथा स्थानीय विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता प्रभावित होगी।"
उनके अनुसार, एकरूप नियम थोपना शिक्षा जैसे संवेदनशील और विविधताओं से भरे क्षेत्र में व्यवहारिक नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं।
बृजभूषण शरण सिंह ने कहा, "नए नियमों से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के विश्वविद्यालयों को सबसे अधिक नुकसान होगा।"
उन्होंने कहा, "केंद्र सरकार को नीति बनाते समय ज़मीनी हकीकत और शिक्षकों-छात्रों की राय को प्राथमिकता देनी चाहिए थी, लेकिन यूजीसी के नए नियमों में यह संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती।"
उनका कहना है कि अत्यधिक केंद्रीकरण से न केवल अकादमिक स्वतंत्रता सीमित होगी, बल्कि नवाचार और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम विकसित करने की क्षमता भी कमजोर पड़ेगी।
भाजपा के पूर्व सांसद द्वारा इस तरह सार्वजनिक रूप से विरोध दर्ज कराना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह दर्शाता है कि शिक्षा नीति जैसे मुद्दों पर पार्टी लाइन से हटकर भी विचार रखने की गुंजाइश है।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया है कि यूजीसी के नए नियमों पर पुनर्विचार किया जाए और राज्यों, विश्वविद्यालयों, शिक्षकों तथा विशेषज्ञों से व्यापक संवाद के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाए।