प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिल पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ऐसी बात नहीं कही है कि वह इस बिल पर सीधे विरोध में हैं। उनका रुख यह है कि शिक्षा एक समवर्ती विषय होने के बावजूद, राज्यों की भूमिका को कमजोर किया जा रहा है, जो न तो संविधान की भावना के अनुरूप है और न ही व्यावहारिक रूप से उचित।
नीतीश कुमार ने कहा है कि बिहार जैसे राज्यों की शैक्षिक ज़रूरतें, सामाजिक संरचना और संसाधन केंद्र द्वारा बनाए गए एकरूप नियमों से पूरी तरह मेल नहीं खा सकतीं। वे मानते हैं कि यदि नीति निर्माण में राज्यों की सहमति और भागीदारी नहीं होगी, तो शिक्षा सुधार केवल कागज़ी साबित होंगे।
इस बिल पर असहमति जताकर, वे यह संदेश देते हैं कि विकास केवल ऊपर से थोपे गए फैसलों से नहीं बल्कि ज़मीनी हकीकत को समझकर और राज्यों को विश्वास में लेकर ही संभव है। इस मुद्दे पर उनका प्रधानमंत्री के साथ न खड़ा होना यह भी दिखाता है कि वे अपनी राजनीतिक सुविधा से अधिक बिहार और अन्य राज्यों के दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता देने की कोशिश कर रहे हैं।
यह भी स्पष्ट है कि नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक सिद्धांतों को भारतीय लोकतंत्र में बहस, असहमति और संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
नीतीश कुमार ने कहा है कि बिहार जैसे राज्यों की शैक्षिक ज़रूरतें, सामाजिक संरचना और संसाधन केंद्र द्वारा बनाए गए एकरूप नियमों से पूरी तरह मेल नहीं खा सकतीं। वे मानते हैं कि यदि नीति निर्माण में राज्यों की सहमति और भागीदारी नहीं होगी, तो शिक्षा सुधार केवल कागज़ी साबित होंगे।
इस बिल पर असहमति जताकर, वे यह संदेश देते हैं कि विकास केवल ऊपर से थोपे गए फैसलों से नहीं बल्कि ज़मीनी हकीकत को समझकर और राज्यों को विश्वास में लेकर ही संभव है। इस मुद्दे पर उनका प्रधानमंत्री के साथ न खड़ा होना यह भी दिखाता है कि वे अपनी राजनीतिक सुविधा से अधिक बिहार और अन्य राज्यों के दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता देने की कोशिश कर रहे हैं।
यह भी स्पष्ट है कि नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक सिद्धांतों को भारतीय लोकतंत्र में बहस, असहमति और संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।