अरे, मुझे यह सवाल करना चाहिए कि खुफिया एजेंसियों को बाहर निकालने से आतंकवाद की समस्या कैसे हल होगी? मेरे दोस्तों को लगातार कहा जाता है कि खुफिया एजेंसियों को चालू रखें, लेकिन अब भी आतंकवादी हमले होते रहते हैं... क्या सामाजिक जागरूकता की बात में सच्चाई नहीं है?
मुझे लगता है कि खुफिया एजेंसियों को अपनी सीमाओं में रहना चाहिए और नागरिकों की मदद करनी चाहिए, न कि उन्हें बाहर निकालने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन फिर भी खुफिया एजेंसियों को अपनी गलतियों पर सबक सीखने देना चाहिए...
लाल किले के आतंकी धमाके ने मुझे बहुत सोच-समझकर करने को मजबूर किया है। मैं समझता हूं कि खुफिया एजेंसियों और सामाजिक जागरूकता दोनों ही एक-दूसरे के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की जरूरत है, लेकिन यह सवाल भी उठना चाहिए कि सरकार ने आतंकवाद विरोधी कानूनों को तैयार करने में कब तक समय लिया?
मुझे लगता है कि यह एक जटिल समस्या है, और इसका समाधान नहीं होगा जब तक हम सोच-समझकर न बैठें और एक-दूसरे की बातों में शामिल न हों।