कुछ दिनों पहले एक 54 साल का आदमी अपने पिता की मौत का शोक कर रहा था। उसके पिता से उनका रिश्ता कभी अच्छा नहीं था, वो शराबी और अब्यूसिव थे।
उसके पिता की मृत्यु के बाद उसने कई दिनों तक इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। लेकिन जल्द ही उसके मन में एक अजीब सी पीड़ा छa गई। वह अपने बचपन और उसके पिता के साथ खेलने की यादें देख रहा था।
उन्होंने डॉ. द्रोण शर्मा, आयरलैंड के कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट से बात की।
"आप जो महसूस कर रहे हैं, वह सिर्फ पिता का नहीं, बल्कि बेहतरी की एक आखिरी उम्मीद या यूं कहें कि फैंटेसी का भी चले जाना है।"
उन्होंने कहा, "पिता की मृत्यु के साथ-साथ अब यह उस तकलीफदेह कहानी का आखिरी क्लोजर है। बचपन का ट्रॉमा है, जो आखिरी समय तक भी रिजॉल्व नहीं हो पाया है।"
उन्होंने बताया, "कुछ बुरी और अच्छी यादें मिलकर एक कनफ्यूजन की स्थिति पैदा करती हैं। दुख महसूस करने का मतलब यह नहीं है कि आप उनके बुरे पहलुओं को स्वीकार कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि आप उस व्यक्ति के जटिल व्यक्तित्व और उसके द्वारा आपके भीतर छोड़ी गई जटिल भावनात्मक दुनिया के लिए शोक मना रहे हैं।"
उन्होंने सुझाव दिया, "आप जो भी महसूस कर रहे हैं, वो स्थाई नहीं है। वक्त के साथ यह स्थिति बेहतर हो जाएगी। लेकिन अगर दुख और अवसाद की स्थिति छह महीने से ज्यादा बनी रहे और रोजमर्रा की फंक्शनिंग में दिक्कतें आएं तो आपको प्रोफेशनल हेल्प लेनी चाहिए।"
उन्होंने कहा, "आप उस व्यक्ति के लिए शोक नहीं मना रहे हैं, जिसने नुकसान पहुंचाया है। आप उस पिता के लिए शोक मना रहे हैं, जिसकी आपको बहुत कामना थी। यह दुख, यह शोक स्वाभाविक है। शोक मनाना जरूरी है। दुख में डूबकर ही दुख से उबरा जा सकता है। इसलिए अपने दुख को लेकर किसी तरह का कनफ्यूजन या गिल्ट मत महसूस करिए।"
आपकी मदद के लिए शुक्रिया।
खराब पिता के साथ जीने के बाद क्या होता है?
उसके पिता की मृत्यु के बाद उसने कई दिनों तक इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। लेकिन जल्द ही उसके मन में एक अजीब सी पीड़ा छa गई। वह अपने बचपन और उसके पिता के साथ खेलने की यादें देख रहा था।
उन्होंने डॉ. द्रोण शर्मा, आयरलैंड के कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट से बात की।
"आप जो महसूस कर रहे हैं, वह सिर्फ पिता का नहीं, बल्कि बेहतरी की एक आखिरी उम्मीद या यूं कहें कि फैंटेसी का भी चले जाना है।"
उन्होंने कहा, "पिता की मृत्यु के साथ-साथ अब यह उस तकलीफदेह कहानी का आखिरी क्लोजर है। बचपन का ट्रॉमा है, जो आखिरी समय तक भी रिजॉल्व नहीं हो पाया है।"
उन्होंने बताया, "कुछ बुरी और अच्छी यादें मिलकर एक कनफ्यूजन की स्थिति पैदा करती हैं। दुख महसूस करने का मतलब यह नहीं है कि आप उनके बुरे पहलुओं को स्वीकार कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि आप उस व्यक्ति के जटिल व्यक्तित्व और उसके द्वारा आपके भीतर छोड़ी गई जटिल भावनात्मक दुनिया के लिए शोक मना रहे हैं।"
उन्होंने सुझाव दिया, "आप जो भी महसूस कर रहे हैं, वो स्थाई नहीं है। वक्त के साथ यह स्थिति बेहतर हो जाएगी। लेकिन अगर दुख और अवसाद की स्थिति छह महीने से ज्यादा बनी रहे और रोजमर्रा की फंक्शनिंग में दिक्कतें आएं तो आपको प्रोफेशनल हेल्प लेनी चाहिए।"
उन्होंने कहा, "आप उस व्यक्ति के लिए शोक नहीं मना रहे हैं, जिसने नुकसान पहुंचाया है। आप उस पिता के लिए शोक मना रहे हैं, जिसकी आपको बहुत कामना थी। यह दुख, यह शोक स्वाभाविक है। शोक मनाना जरूरी है। दुख में डूबकर ही दुख से उबरा जा सकता है। इसलिए अपने दुख को लेकर किसी तरह का कनफ्यूजन या गिल्ट मत महसूस करिए।"
आपकी मदद के लिए शुक्रिया।
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