रामटेक की गंगाबाई साखरे की इस कहानी सुनकर मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ । 103 साल की उम्र में भी जिंदा होने की बात तो बहुत दिलचस्प है, लेकिन शव यात्रा तय करने से पहले उनको जिंदा होने की खबर मिलना? यह एक अजीब सा अंधेरा और प्रकाश दोनों में मिलता है ।
मुझे लगता है कि इस घटना ने उन्हार परिजनों को एक दिलचस्प रास्ता दिखाया है। उनके जन्मदिन मनाने की भावना और अपने जीवन का नया पहलू खोजने की इच्छा की बात तो बहुत प्रेरणादायक है । लेकिन फिर भी शव यात्रा की तैयारियां कर लेना एक अजीब सा मोड़ था...
गंगाबाई साखरे जी की यह कहानी बहुत प्यारी है , उनके जिंदा होने की खबर सुनकर मैंने हैरानी में बैठ गया था । लेकिन जब मुझे पता चला कि उनके परिजनों ने जन्मदिन मनाकर लौटे तो मैं बहुत खुश हुआ । यह एक अलग दुनिया से जुड़ी कहानी है जिसमें प्यार और परिवार की बात होती है। मुझे लगता है कि हमें ऐसे लोगों को ढूंढना चाहिए जिन्हें हमारी मदद कर सकें और उनकी खुशियों में भाग लेना चाहिए ।
ज़ीरो यह तो बहुत ही अजीब मामला है। पहले तो लोग रामटेक शहर के रहने वाली गंगाबाई सावजी की मौत के बारे में नहीं पता था, फिर सोचते हैं कि वह जिंदा थी, तो यह तो बहुत ही अजीब है!
मेरी राय में परिजनों ने गलती से उसकी मृत्यु की सूचना दी थी, लेकिन जब उसे पता चला कि वह जिंदा है, तो वे सोच रहे थे कि उनका जन्मदिन मनाने का मौका निकल गया।
अब घर के सामने लगाया गया मंडप हटा दिया गया और कुर्सियां वापस कर दी गईं, लेकिन मेरे मानने पर यह तो सही नहीं है। शव यात्रा से पहले अंतिम संस्कार की तैयारियां करनी चाहिए थी, न कि घर के सामने मंडप लगाना।
कोई भी ऐसी बातों पर चर्चा करेंगे जो रिश्तेदारों की गलतफहमी को सुधारने में मदद करें, तो मैं उनके लिए खुला हूँ।
यह तो सचमुच एक अजीब सी कहानी है! 103 साल की गंगाबाई जिंदा होने की बात तो सुनकर ही मान लेना चाहिए। शायद उनकी जिंदगी में ऐसी भी कई अनोखी घटनाएं होंगी।
मुझे लगता है कि शव यात्रा से पहले अंतिम संस्कार करने की बात तो एकदम बिल्कुल सही थी, लेकिन जिंदा होने की खबर मिलने पर यह सब तय कर देना और जन्मदिन मनाना? यह तो कुछ अनोखा है!
किसी भी तरह से गंगाबाई की कहानी सुनकर मुझे खुशी हुई, उनकी जिंदगी में कोई बड़ी बुराई नहीं है, बस एक अजीब सी घटना। शुभकामनाएं उन्हें!