जैसे-जैसे पूजा और उमेश अपनी-अपनी कहानियाँ सुनाते हैं, हमें दिलचस्प तो नहीं लगती, बल्कि बहुत उदास भी कर देती।
पूजा की कहानी बिल्कुल ही एक ऐसी है। जिसको पढ़ने पर आंसू निकलने लायक माहौल बन जाता। पति की मौत के बाद से पूजा घर चलाने, बच्चों की देखभाल करने के साथ-साथ अपने खेल को जारी रखने के इच्छुक है, पर उसकी नौकरी की अपेक्षाओं को तोड़ने लगे अधिकारी।
उमेश की कहानी भी बहुत ही दुखद है। 36 साल का उमेश डिवी यांग है, पैर-पैर फंसा हुआ। वह पहले पैरा पावर लिफ्टर था, फिर खेल छोड़ दिया। अब उसकी सास कैंसर के इलाज में मरी है। अब वह अपने बेटे को पढ़ाने की इच्छा रखता है, लेकिन उसके पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं।
दोनों की कहानियाँ भारतीय सामाजिक नीति की मादक आलोचना की तरह है। नौकरी देने, नौकरी छोड़ने के विचार से हमें इस बात पर सवाल उठना चाहिए। क्या यह एक ऐसा समाज है जहां अपनी असामानताओं को छिपाने और खुले तौर पर देखने के बजाय, हम अपने लोगों को छोड़ देते हैं?
पूजा की कहानी बिल्कुल ही एक ऐसी है। जिसको पढ़ने पर आंसू निकलने लायक माहौल बन जाता। पति की मौत के बाद से पूजा घर चलाने, बच्चों की देखभाल करने के साथ-साथ अपने खेल को जारी रखने के इच्छुक है, पर उसकी नौकरी की अपेक्षाओं को तोड़ने लगे अधिकारी।
उमेश की कहानी भी बहुत ही दुखद है। 36 साल का उमेश डिवी यांग है, पैर-पैर फंसा हुआ। वह पहले पैरा पावर लिफ्टर था, फिर खेल छोड़ दिया। अब उसकी सास कैंसर के इलाज में मरी है। अब वह अपने बेटे को पढ़ाने की इच्छा रखता है, लेकिन उसके पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं।
दोनों की कहानियाँ भारतीय सामाजिक नीति की मादक आलोचना की तरह है। नौकरी देने, नौकरी छोड़ने के विचार से हमें इस बात पर सवाल उठना चाहिए। क्या यह एक ऐसा समाज है जहां अपनी असामानताओं को छिपाने और खुले तौर पर देखने के बजाय, हम अपने लोगों को छोड़ देते हैं?