भोपाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा, "लव जिहाद पर रोकथाम की शुरुआत परिवार से होनी चाहिए और यह सोचने की जरूरत है कि बेटी बहकावे में कैसे आ जाती है।" उन्होंने कहा है कि "बेटियों को सावधानी और आत्मरक्षा के संस्कार देना, परिवार में खुला संवाद रखना और अपराधियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करना बेहद जरूरी है।"
उन्होंने कहा है कि "स्त्री शक्ति संवाद" पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने यह भी बताया कि पुरुष और महिला एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों को मिलते-जुलते रहना चाहिए। प्रकृति और पुरुष के संयोग से ही सृष्टि संभव है, अलग-अलग रहकर कोई भी पूर्ण नहीं हो सकता है।
उन्होंने कहा, "महिला ही समाज की शिल्पकार हैं। बच्चों के संस्कारों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मां की होती है। गृहिणी के बिना घर की कल्पना भी संभव नहीं है। महिलाएं जोड़ती हैं, संभालती हैं और परिवार में संतुलन बनाए रखती हैं।"
उन्होंने कहा, "आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी जीवनशैली की अंधी नकल खतरनाक है। भारतीय परंपरा में नारी का स्थान मातृत्व से और अधिक ऊंचा होता है। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय नारी ने हर काल में शक्ति और साहस का परिचय दिया है।
उन्होंने कहा, "घर में कोई भी व्यक्ति अकेला महसूस न करे, यह बेहद जरूरी है। संवाद की कमी और असंभव अपेक्षाएं मानसिक तनाव को जन्म देती हैं। बच्चों पर लक्ष्य थोपने के बजाय उनकी रुचियों को समझना जरूरी है। जीवन में केवल सफलता नहीं, जीवन की सार्थकता अधिक महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा, "देश की लगभग आधी आबादी महिलाएं हैं, लेकिन बड़ी संख्या अब भी सामाजिक और राष्ट्रीय भूमिका से पूरी तरह नहीं जुड़ी है। ऐसी महिलाओं के प्रबोधन के लिए विशेष प्रयास जरूरी हैं। जहां नारी का सम्मान सुरक्षित होता है, वहीं समाज स्वतः स्वस्थ रहता है."
उन्होंने कहा है कि "स्त्री शक्ति संवाद" पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने यह भी बताया कि पुरुष और महिला एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों को मिलते-जुलते रहना चाहिए। प्रकृति और पुरुष के संयोग से ही सृष्टि संभव है, अलग-अलग रहकर कोई भी पूर्ण नहीं हो सकता है।
उन्होंने कहा, "महिला ही समाज की शिल्पकार हैं। बच्चों के संस्कारों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मां की होती है। गृहिणी के बिना घर की कल्पना भी संभव नहीं है। महिलाएं जोड़ती हैं, संभालती हैं और परिवार में संतुलन बनाए रखती हैं।"
उन्होंने कहा, "आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी जीवनशैली की अंधी नकल खतरनाक है। भारतीय परंपरा में नारी का स्थान मातृत्व से और अधिक ऊंचा होता है। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय नारी ने हर काल में शक्ति और साहस का परिचय दिया है।
उन्होंने कहा, "घर में कोई भी व्यक्ति अकेला महसूस न करे, यह बेहद जरूरी है। संवाद की कमी और असंभव अपेक्षाएं मानसिक तनाव को जन्म देती हैं। बच्चों पर लक्ष्य थोपने के बजाय उनकी रुचियों को समझना जरूरी है। जीवन में केवल सफलता नहीं, जीवन की सार्थकता अधिक महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा, "देश की लगभग आधी आबादी महिलाएं हैं, लेकिन बड़ी संख्या अब भी सामाजिक और राष्ट्रीय भूमिका से पूरी तरह नहीं जुड़ी है। ऐसी महिलाओं के प्रबोधन के लिए विशेष प्रयास जरूरी हैं। जहां नारी का सम्मान सुरक्षित होता है, वहीं समाज स्वतः स्वस्थ रहता है."