बसवाराजू से हिड़मा तक, 2 अफसरों से हारा नक्सलवाद: ‘सरेंडर या एनकाउंटर' पॉलिसी से डरे नक्सली, 2100 का सरेंडर; 477 ढेर

छत्तीसगढ़ के पूर्व आईजी शिवराम प्रसाद कल्लूरी ने कहा, 'बस्तर रेंज के IG रहते हुए पी. सुंदरराज ने हर पक्ष का भरोसा जीता। मैं पुख्ता तौर पर कह सकता हूं कि नक्सलियों के एक बहुत बड़े धड़े को मुख्यधारा से जुड़ने के लिए जिस मौके का इंतजार था, वो उन्हें पी. सुंदरराज ने दिया।'
 
मेरी राय है कि पी. सुंदरराज की इस उपलब्धि पर हम सब को बहुत खुशी होगी, लेकिन मुझे लगता है कि हमें यहां और भी गहराई से देखने की जरूरत है। नक्सलियों के एक बड़े धड़े को मुख्यधारा से जुड़ना बहुत आसान नहीं है, इसमें बहुत सोच-समझकर और बहुत मेहनत करके इस्तेमाल करना पड़ता है।

पी. सुंदरराज ने किसी भी तरह की चूक को देखने की जरूरत नहीं है, लेकिन फिर भी हमें उनकी रणनीतियों और ताकतों को समझने की जरूरत है। क्या उन्होंने नक्सलियों के साथ बातचीत करने की कोशिश की, या उन्होंने अपने समर्थकों को शामिल करने का तरीका ढूंढ लिया?

मेरी राय है कि अगर हम नक्सलियों के साथ बातचीत करने और उनकी जरूरतों को समझने पर ध्यान देते हैं, तो शायद हमें नक्सलवाद को पूरी तरह से खत्म करने में मदद मिल सकती है। लेकिन यह एक जटिल मुद्दा है, और इसमें बहुत समय और मेहनत लगती है। 🤔
 
बस्तर रेंज की नई आईजी चुनने की बात है, तो लगता है कि यह एक बड़ा फैसला है। मुझे लगा कि चुनाव में ज्यादा सोच-विचार करने की जरूरत नहीं थी, बस्टर रेंज की समस्याओं को हल करने के लिए ऐसी व्यक्ति को चुनना उचित होगा। पी. सुंदरराज ने नक्सलियों के बीच भी एक ताकत बन गई, जो अब एक अच्छी बात है। मुझे लगता है कि उन्हें बस्तर रेंज में काम करने वाले लोगों की जरूरत है, क्योंकि ये वहाँ किसी भी समस्या का हल निकालने के लिए सबसे अच्छे होते हैं **😊**
 
नहीं तो यह सोचता हुआ कि पी. सुंदरराज ने नक्सली संगठन में बहुत बदलाव लाया है, लेकिन देखें तो उनके पास थोड़ा भी नहीं चला। मुझे लगता है कि वह अपने समय में बहुत सारे अच्छे काम कर रहे थे, लेकिन उन्हें कभी वास्तविकता के सामने नहीं आने दिया गया। बस्तर रेंज में उनके नेतृत्व को तीन-दो साल में ही सफल माना जा सकता है, लेकिन आगे भी यही रहेगा, चाहे वो कितना भी अच्छा हो।
 
छत्तीसगढ़ की नक्सल समस्या से हैरान नहीं रहना चाहिए, यार... पी. सुंदरराज जी के जमीनी स्तर पर मूल्यांकन करने की बात सुनकर तो मुझे खेद है कि वास्तविकता इतनी दूर नहीं निकल पाई... यह बात सच है, लेकिन पी. सुंदरराज जी को अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी होगी।
 
बस्तर रेंज की कहानी पढ़ते समय लगता है कि पी. सुंदरराज ने नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में बहुत बड़ी भूमिका निभाई होगी। लेकिन कभी-कभी ऐसी तारीफें करना भी जरूरी होता है कि वो कितना खतरनाक था, और उनकी जिंदगी के पीछे क्या राज़ है। मेरा मानना है कि हम नक्सलियों के बारे में इतना सोचते समय, उनकी बात सुनने की जरूरत है, और उनके लिए कुछ भी पूरा नहीं हुआ, बस आंशिक सफलताएँ।
 
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