तल्खी बढ़ने का मतलब यह कि चुनावों में कौन जीतेगा, यह जानने की जरूरत नहीं । लेकिन एक बात तो साफ़ है कि देश की स्थिरता पर इस तरह की तल्खी ना आनी चाहिए। हमारे सैनिकों और सरकार को भी उनकी जिम्मेदारियों का ध्यान रखना चाहिए, न कि अपने राजनीतिक हितों में खेलने का। छात्र नेताओं और अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं को भी अपने लोगों के हित में काम करना चाहिए, न कि राजनीतिक दलों की विरोधी दलों से सहयोग करने का। इससे हमारे देश को और कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा ।
भारत के बाहर देखकर बहुत उदास हूँ । बांग्लादेश में सेना, सरकार और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच जो तनाव बढ़ रहा है, वो चुनावों से पहले तेज होती दिखाई दे रही है। यह तो हमें अपने देश में भी डराने लग रही है । अगर ऐसा जारी रहता है तो चुनावों के बाद बहुत बड़ी परेशानी होने का डर है।
जैसे स्वागत करते हैं दोस्त...बांग्लादेश में सेना, सरकार और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच जो तल्खी बढ़ रही है, वाह...चुनावों से पहले तेज होती दिखाई दे रही है यह ठीक नहीं है। आर्मी में विद्रोही अफसर, छात्र नेता और अल्पसंख्यक समुदाय के नेता एक-दूसरे को आर्मी और सरकार के खिलाफ बदलाव लाने की तैयारी कर रहे हैं...मुझे लगता है कि यह सब पूरे देश के लिए खतरा है। हमें सभी पक्षों के बीच शांति संवाद करना चाहिए और एक-दूसरे को समझना चाहिए। इससे हमारे देश को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी।
बड़े दिनों में सेना, सरकार और अल्पसंख्यक समुदाय के बीच इस तरह से तनाव बढ़ जाता है, तो यह हमारे लिए बहुत चिंताजनक है ****। चुनावों से पहले ऐसी स्थिति पैदा होने से लोगों में डर का भाव बढ़ता है। आर्मी, सरकार और अल्पसंख्यक समुदाय के बीच तालमेल बनाए रखना बहुत जरूरी है ताकि हमारे देश में शांति और स्थिरता बनी रहे।
हमें उम्मीद है कि चुनावों के पहले इन सभी पक्षों को अपने विचारों को पेश करने और एक-दूसरे के साथ बातचीत करने का मौका मिले, ताकि हमारे देश में शांति और समझ की भावना बढ़ सके। ****