आपको कभी-न-कभी गले में दर्द या खराश का अनुभव जरूर होगा। कई बार इसकी वजह से निगलने में परेशानी होती है और बोलना तक मुश्किल हो जाता है। अक्सर हम इसे मामूली खराश समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन कई बार इसके पीछे टॉन्सिलाइटिस की समस्या हो सकती है।
टॉन्सिल हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम का एक अहम हिस्सा होते हैं। ये हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम का हिस्सा होते हैं। इनका मुख्य काम मुंह और नाक के रास्ते शरीर में प्रवेश करने वाले बैक्टीरिया-वायरस को रोकना होता है। टॉन्सिल संक्रमण से लड़ने में शरीर की मदद करते हैं और हमें बीमार होने से बचाते हैं।
टॉन्सिलाइटिस वह स्थिति है, जब टॉन्सिल में संक्रमण हो जाता है। इसके कारण टॉन्सिल्स में इंफ्लेमेशन और रेडनेस हो जाती हैं। साथ ही दर्द भी होता है। टॉन्सिलाइटिस में गले में तेज खराश, निगलने में परेशानी और बुखार हो सकता है। कभी-कभी टॉन्सिल पर सफेद दाग भी दिखाई देते हैं। यह समस्या वायरस या बैक्टीरिया दोनों की वजह से हो सकती है।
टॉन्सिलाइटिस तब होता है, जब टॉन्सिल पर वायरस या बैक्टीरिया का संक्रमण हो जाता है। ज्यादातर मामलों में इसकी वजह सर्दी-जुकाम या फ्लू जैसे वायरल इन्फेक्शन होते हैं। कुछ मामलों में यह ग्रुप-A स्ट्रेप्टोकोकस बैक्टीरिया (आमतौर पर गले और त्वचा में पाए जाने वाले बैक्टीरिया) के कारण होता है। ये बैक्टीरिया अक्सर संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से फैलता है।
टॉन्सिलाइटिस में गले और टॉन्सिल से जुड़ी कुछ समस्याएं होती हैं, जो हमारी रोजमर्रा की लाइफ को प्रभावित करती हैं। इसके लक्षण नीचे दिए गए हैं:
- तेज खराश
- गले में दर्द और सूजन
- बुखार
- निगलने में परेशानी
- खांसने में दर्द
टॉन्सिलाइटिस पैदा करने वाले वायरस और बैक्टीरिया बहुत ज्यादा संक्रामक होते हैं। ये कई तरीकों से फैल सकते हैं। इसे नीचे दिए गए हैं:
- टॉन्सिलाइटिस पैदा करने वाले वायरस और बैक्टीरिया अक्सर संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से फैलता है।
- यह वायरस और बैक्टीरिया हमारे आसपास के लोगों को भी फैल सकता है।
- यह वायरस और बैक्टीरिया हमारे पर्यावरण में भी फैल सकता है।
टॉन्सिलाइटिस ज्यादातर बच्चों और किशोरों में होता है। इसके अलावा वे लोग भी इससे प्रभावित होते हैं, जो स्कूल-ऑफिस जाते हैं या भीड़भाड़ वाली जगहों पर रहते हैं। यहां संक्रमण जल्दी फैलता है। पहले से बीमार या कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों में इसका रिस्क ज्यादा होता है।
टॉन्सिलाइटिस के इलाज के लिए डॉक्टर सबसे पहले गले की जांच करते हैं और लक्षणों के बारे में पूछते हैं। संक्रमण वायरल है या बैक्टीरियल, इसका पता लगाने के लिए गले से कॉटन स्वैब लेकर टेस्ट किया जाता है। इसी आधार पर आगे का इलाज तय किया जाता है।
टॉन्सिलाइटिस को अक्सर लोग सिर्फ खर्राटों की समस्या मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि हकीकत ये है कि यह बीमारी धीरे-धीरे हार्ट, ब्रेन और मेटाबॉलिज्म समेत ओवरऑल हेल्थ को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
टॉन्सिल हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम का एक अहम हिस्सा होते हैं। ये हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम का हिस्सा होते हैं। इनका मुख्य काम मुंह और नाक के रास्ते शरीर में प्रवेश करने वाले बैक्टीरिया-वायरस को रोकना होता है। टॉन्सिल संक्रमण से लड़ने में शरीर की मदद करते हैं और हमें बीमार होने से बचाते हैं।
टॉन्सिलाइटिस वह स्थिति है, जब टॉन्सिल में संक्रमण हो जाता है। इसके कारण टॉन्सिल्स में इंफ्लेमेशन और रेडनेस हो जाती हैं। साथ ही दर्द भी होता है। टॉन्सिलाइटिस में गले में तेज खराश, निगलने में परेशानी और बुखार हो सकता है। कभी-कभी टॉन्सिल पर सफेद दाग भी दिखाई देते हैं। यह समस्या वायरस या बैक्टीरिया दोनों की वजह से हो सकती है।
टॉन्सिलाइटिस तब होता है, जब टॉन्सिल पर वायरस या बैक्टीरिया का संक्रमण हो जाता है। ज्यादातर मामलों में इसकी वजह सर्दी-जुकाम या फ्लू जैसे वायरल इन्फेक्शन होते हैं। कुछ मामलों में यह ग्रुप-A स्ट्रेप्टोकोकस बैक्टीरिया (आमतौर पर गले और त्वचा में पाए जाने वाले बैक्टीरिया) के कारण होता है। ये बैक्टीरिया अक्सर संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से फैलता है।
टॉन्सिलाइटिस में गले और टॉन्सिल से जुड़ी कुछ समस्याएं होती हैं, जो हमारी रोजमर्रा की लाइफ को प्रभावित करती हैं। इसके लक्षण नीचे दिए गए हैं:
- तेज खराश
- गले में दर्द और सूजन
- बुखार
- निगलने में परेशानी
- खांसने में दर्द
टॉन्सिलाइटिस पैदा करने वाले वायरस और बैक्टीरिया बहुत ज्यादा संक्रामक होते हैं। ये कई तरीकों से फैल सकते हैं। इसे नीचे दिए गए हैं:
- टॉन्सिलाइटिस पैदा करने वाले वायरस और बैक्टीरिया अक्सर संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से फैलता है।
- यह वायरस और बैक्टीरिया हमारे आसपास के लोगों को भी फैल सकता है।
- यह वायरस और बैक्टीरिया हमारे पर्यावरण में भी फैल सकता है।
टॉन्सिलाइटिस ज्यादातर बच्चों और किशोरों में होता है। इसके अलावा वे लोग भी इससे प्रभावित होते हैं, जो स्कूल-ऑफिस जाते हैं या भीड़भाड़ वाली जगहों पर रहते हैं। यहां संक्रमण जल्दी फैलता है। पहले से बीमार या कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों में इसका रिस्क ज्यादा होता है।
टॉन्सिलाइटिस के इलाज के लिए डॉक्टर सबसे पहले गले की जांच करते हैं और लक्षणों के बारे में पूछते हैं। संक्रमण वायरल है या बैक्टीरियल, इसका पता लगाने के लिए गले से कॉटन स्वैब लेकर टेस्ट किया जाता है। इसी आधार पर आगे का इलाज तय किया जाता है।
टॉन्सिलाइटिस को अक्सर लोग सिर्फ खर्राटों की समस्या मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि हकीकत ये है कि यह बीमारी धीरे-धीरे हार्ट, ब्रेन और मेटाबॉलिज्म समेत ओवरऑल हेल्थ को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।