कुमाऊं-गढ़वाल की कालिंका के मेले में उमड़ी हजारों की भीड़: न्याजा यात्रा देख गदगद हुए भक्त; बड़ियारी वंशजों ने की थी मंदिर की स्थापना - Almora News

हजारों भक्त न्याजा यात्रा में शामिल हुए, जिसमें पौड़ी गढ़वाल और अल्मोड़ा के 14 गांवों के लोग मां भगवती के रूप में मां भगवती न्याजा की सामूहिक पूजा और यात्रा आयोजित करते हैं। इस साल कोठा तल्ला गांव में निकली, जहां बड़ियारी वंशज अपनी कुल देवी मां काली के रूप में मां भगवती न्याजा की सामूहिक पूजा और यात्रा आयोजित करते हैं।

न्याजा यात्रा की एक खास पहचान 'न्याजा' परंपरा है, जिसमें प्रमुख रूप से 14 गांवों के लोग देवी का ध्वज लेकर गांव-गांव भ्रमण करते हैं। मेले के अंतिम दिन, न्याजा दल ढोल-दमाऊ की थाप के साथ कालिंका धाम पहुंचते हैं और मंदिर परिसर में प्रवेश कर भक्तों को दर्शन प्रदान करते हैं।

यह यात्रा हर तीन साल में आयोजित होती है, जिसमें हजारों की संख्या में भक्त शामिल होते हैं। ठंडे मौसम के बावजूद सुबह से ही मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उगती है।

मंदिर प्रशासनिक रूप से पौड़ी गढ़वाल जिले के बीरोंखाल ब्लॉक में आता है, जबकि अल्मोड़ा जिले की सीमा इसके बिल्कुल पास है। यही स्थिति इसे गढ़वाल और कुमाऊं के दोनों क्षेत्रों के लिए समान रूप से पवित्र और महत्वपूर्ण बनाती है।

यात्रा में लगभग 150 लोग न्याजा के साथ रहते हैं, पुजारी और जगरिए यात्रा की देखरेख करते हैं और धर्मिक अनुष्ठानों को पूरा करते हैं।

बड़ियारी वंशज अल्मोड़ा के मवाण बाखली, तल्लीसैंण, बाखली रानी, मल्ला लखोरा, मठखानी और बंदरकोट मल्ला तथा पौड़ी गढ़वाल के बीरोंखाल क्षेत्र के कोठा, धोबीघाट, मरखोली और थबरिया तल्ला गांवों में रहते हैं।

यात्रा से पहले कोठा गांव में बड़ियारी वंशज बैठक करते हैं और सभी को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं। मंमगाईं पंडित शुभ मुहूर्त निकालते हैं और ढोल-दमाऊ बजाकर औजी वादकों को आमंत्रित करते हैं।

रात्रि में देव नृत्य और कौथिग का आयोजन होता है, जिसमें देवी-देवताओं का प्रादुर्भाव दर्शाया जाता है। अगले दिन सूर्योदय के साथ न्याजा का प्रादुर्भाव होता है और श्रद्धालु मां भगवती के दर्शन कर अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं।

मां भगवती न्याजा की यात्रा बिनसर, जोगिमणी, बीरोंखाल, घोड़ियाना, मैठाणा, बंवासा, सीली, जमरिया, मंगरोखाल और इकूखेत सहित कई गांवों से गुजरती है। यात्रा के मार्ग में भक्त रात्रि विश्राम करते हैं और उस समय देव नृत्य का आयोजन होता है।

मंदिर समुद्र तल से लगभग 2100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां चारों ओर हरे-भरे जंगल और हिमाच्छादित पर्वतों का दृश्य दिखाई देता है।
 
मानो तो यह यात्रा बहुत खूबसूरती लेकर आयी है ना...! पहले से मुझे भी ये बत गया था कि इस परंपरा में कितनी जाद और जोश की बात होती है। पर अब जब सब देख रहे हैं तो फिर भी कुछ ऐसा है जिससे मन में खुशी और संतुष्टि होती है। लेकिन, यह तो एक सवाल है कि इस तरह की यात्रा में शामिल होने वाले सभी लोगों को कितना सही तरीके से प्रशिक्षित किया जाता है? और क्या उनके मन में यह स्थानीय परंपराओं का सम्मान करने की भावना होती है या फिर यह सिर्फ एक प्रकार की नृत्य या शो बन जाता है।
 
मंदिर को साफ-सुथरा रखने में जरूरत है ताकि वही वातावरण बना रहे। शायद नियमित सफाई कराने पर यह बेहतर होगा। 🤔
 
यह यात्रा बहुत पवित्र है 🙏, मैं यहाँ से जुड़े व्यक्ति भी अपनी मनोकामनाएँ रखना चाहते हैं। लेकिन इसकी जटिलता को समझना थोड़ा मुश्किल है... मुझे लगता है कि यह यात्रा केवल पवित्रता से भरी नहीं है, बल्कि समुदाय और एकता के महत्व को भी दर्शाती है। इन गांवों में रहने वाले लोग अपनी परंपराओं को बहुत महत्व देते हैं और यह यात्रा उनकी संस्कृति को जीवंत रखती है... लेकिन इसकी प्रबंधन और संचालन में कुछ सुधार करने की जरूरत हो सकती है, ताकि सभी भक्तों को समान अवसर मिल सके।
 
यात्रा में शामिल लोगो की भक्ति और सामूहिकता देखकर मेरा मन खुशहाल हुआ। ये पवित्र स्थलों पर जाने वाले लोग हमेशा एक नई ऊंचाई तक पहुंचते हैं, न केवल शारीरिक रूप से बल्कि आध्यात्मिक भी 🙏💫
 
आजकल यात्रा की बात कर रहे हैं तो मुझे लगता है कि यह भी एक तरह से शादी की तरह है जिसमें लोग अपने रिश्तेदारों और परिवार के साथ निकल पड़ते हैं। लेकिन इस बारे में कोई सोचता है कि यात्रा क्यों कर रहे हैं? यह तो बस एक तरह की मनोरंजन है। और इतनी दूर तक भी जाने के लिए... नहीं तो यात्रा का मतलब ही व्यय करना। 🤑
 
मंदिर की सुंदरता तो कोई मायबान नहीं 🌳🏯, बस इतना कहूँ कि यहाँ की भक्ति और श्रद्धालुओं की प्रतिबद्धता देखने लायक है। परिवारों और समाज में एक साथ आमने-सामने आना ये एकदम अच्छी बात है 🤝। और जैसे ही यात्रा शुरू होती है, तो हर किसी की भावनाएं उभरने लगती हैं - यही हमें मिलकर खुशियों और सुख-शांति की यात्रा पर ले जाने वाली है 😊
 
कोठा तल्ला गांव में निकली यात्रा का वibe बहुत खूबसूरत है 🌳💫. मुझे लगता है कि हर तीन साल में आयोजित होने वाली यह यात्रा किसी भी दिल को छू लेती है। न्याजा परंपरा की खूबसूरती और बड़ियारी वंशजों की ईमानदारी का सम्मान करना चाहिए। मैंने सुना है कि रात्रि में देव नृत्य और कौथिग का आयोजन तो बहुत सुंदर लगता है।🤩
 
यह तो बहुत गर्मियाँ की बात है! मैंने पढ़ा है कि ये न्याजा यात्रा हर तीन साल में होती है, लेकिन यह तो एक बड़ी पूजा-पाठक भीड़ है। मुझे लगता है कि इन गांवों के लोग बहुत प्रतिबद्धता और समर्पण से यात्रा की तैयारी करते हैं।

मैंने सोचा कि यह तो एक अच्छा अवसर है जिस पर लोग अपनी पूजा-पाठकता और समुदाय के महत्व को दिखा सकते हैं। मंदिरों की सुंदरता और शांति को हमें भी याद दिलानी चाहिए।

बड़ियारी वंशज और उनकी पूजा-पाठकता की बात तो बहुत अच्छी है। मुझे लगता है कि हमें अपनी संस्कृतियों और परंपराओं को जीवंत रखना चाहिए।
 
यह यात्रा तो एक सच्चे भारतीय रूप में पूरे साहस और सामूहिकता से की जाती है 🌟 । हर तीन साल में हजारों भक्त इस यात्रा में शामिल होते हैं और यह एक सच्ची मानवतावादी प्रवृत्ति है।

यात्रा में शामिल लोगों के दिल की गहराई से भावनाओं को व्यक्त करने की इच्छा होती है, जो किसी भी भक्ति यात्रा में होती है।

इसका एक और महत्वपूर्ण पहलू है कि यह यात्रा हमें अपनी संस्कृति और परंपराओं के प्रति सम्मान और आदर की भावना को जगाती है, जो की हर मानवीय संस्कृति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

यात्रा में शामिल लोगों की सामूहिकता और एकता देखकर हमें यह महसूस होता है कि भारत में हर जगह देवी-देवताओं की पूजा और सम्मान की भावना है।

मंदिर की गहराई और सुंदरता इस यात्रा को एक अनोखे रूप में बनाती है, जो कि हर मानवीय दिल को आकर्षित करती है
 
न्याजा यात्रा में शामिल लोगों की भक्ति और समर्पण देखने से मुझे खुशी हुई। 😊 यह तो है की हमारे गांव में भी इस तरह के अनुष्ठान आयोजित होते हैं, लेकिन हर तीन साल में ऐसा यात्रा आयोजन होना देखने में अच्छा लगा।

क्या हमारे पास मंदिर समुद्र तल पर नहीं है? यह मंदिर कितनी ऊंचाई पर बनाया गया है, 2100 मीटर? और इसके आसपास इतने हरे-भरे जंगल और हिमाच्छादित पर्वतों का दृश्य देखने में ऐसा खूबसूरत लगा।
 
यह तो बहुत ही रोमांचक है... न्याजा यात्रा में इतने सारे लोग एक साथ आते हैं और भगवती की पूजा करते हैं। यह तो एक अद्वितीय अनुभव होना चाहिए। मुझे लगता है कि इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य भक्तों को अपने मनोकामनाओं को पूरा करने का अवसर देना है, और यह तो जरूरी होगा। लेकिन मुझे लगता है कि इस यात्रा की ज़रूरत नहीं पड़ती, क्योंकि भगवती अपने भक्तों को हमेशा मिल जाती है। 🙏🌸
 
बिल्कुल सही कोठाल्ला गांव में बैठकर भक्त न्याजा यात्रा की तैयारी होती है 🙏। यह तीर्थयात्रा बहुत ही रोचक और आकर्षक है, जहां लोग अपने देवी-देवताओं को पूजने के लिए जाकर मिलें 💕

मुझे लगता है कि न्याजा यात्रा की एक खास पहचान 'न्याजा' परंपरा की बहुत महत्ता है, जिसमें लोग देवी का ध्वज लेकर गांव-गांव भ्रमण करते हैं और मंदिरों के दर्शन कर अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं। 🙏

यह यात्रा हर तीन साल में आयोजित होती है, जिसमें हजारों की संख्या में भक्त शामिल होते हैं और ठंडे मौसम के बावजूद सुबह से ही मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उगती है। 🌟

मुझे लगता है कि न्याजा यात्रा को हमें अपने देश की रीति-रिवाजों और संस्कृतियों को समझने का अवसर मिलता है, जो हमारे जीवन को समृद्ध बनाता है 🙏
 
मैंने इस न्याजा यात्रा को बहुत प्यारी लगी। यह तो ऐसी भक्ति है जिसमें लोग अपनी ईश्वर से बात करने के लिए एक साथ मिलते हैं और उनकी सराहना करते हैं। मुझे लगा कि ये तो हमारी प्राकृतिक सुंदरता को दिखाने वाली है। जब मैंने सोचा कि न्याजा दल कौन सा ढोल-दमाऊ बजाते हैं, तो मेरी सोचने लगी कि यह तो गढ़वाल और कुमाऊं की संस्कृति ही क्यों नहीं बताई जा रही।
 
न्याजा यात्रा तो एक ऐसी खूबसूरत बात है जो हमें सिखाती है कि धर्म और पवित्रता के माध्यम से एकता और शांति को बढ़ावा दिया जा सकता है। यह यात्रा हर तीन साल में आयोजित होती है और इसमें हजारों भक्त शामिल होते हैं जो अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं।

जैसे ही सुबह होती है, ठंड की चौथाई में भी मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उगती है और यह बहुत खूबसूरत दृश्य दिखाई देता है।

मैंने भी अपनी बेटियों को नियमित रूप से पवित्र मंदिरों में जाने की अनुमति दी है, ताकि वे अपने भविष्य को सुखी और समृद्ध बना सकें।

मंदिर के अंदर चारों ओर हरे-भरे जंगल और हिमाच्छादित पर्वतों का दृश्य दिखाई देता है, जो बहुत शांतिपूर्ण और पवित्र लगता है।
 
यह यात्रा कितनी शानदार लगती है 🤩। मैं भी शायद इस मेले में भाग लूंगा, लेकिन मुझे लगता है कि यात्रा से पहले तैयारी बहुत महत्वपूर्ण है। मेरे अनुसार, यात्रा को सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से आयोजित करना चाहिए। इसके अलावा, मुझे लगता है कि हमें इस परंपरा की स्थापना के पीछे के कारणों को जानने की कोशिश करنی चाहिए और इसे भविष्य में भी मजबूत बनाना चाहिए।
 
बड़ियारी वंशजों को अपनी कुल देवी मां काली के रूप में मां भगवती न्याजा की सामूहिक पूजा और यात्रा आयोजित करना बहुत सम्मानजनक है। 😊

मंदिर के बाहर भीड़बाजी होने पर मैं हैरान हो गया था, यह तो सुबह से श्रद्धालुओं की घड़ी बन गई है! 🙏 और रात्रि में देव नृत्य का आयोजन करने वाले लोगों को बधाई! 💃

कुछ दिनों पहले भी मैंने पढ़ा था कि न्याजा यात्रा हर तीन साल में होती है, और इस वर्ष यह कोठा गांव से शुरू हुई। 🗓️ यह यात्रा बहुत लंबी नहीं है लेकिन इतनी भीड़बाजी वाली जगह पर पहुंचना मुश्किल है। 😅

मंदिर की स्थिति को देखकर लगता है कि यह गढ़वाल और कुमाऊं के दोनों क्षेत्रों के लिए समान रूप से पवित्र और महत्वपूर्ण है। 🙏

मैंने पढ़ा था कि यात्रा में लगभग 150 लोग न्याजा के साथ रहते हैं, और धर्मिक अनुष्ठानों को पूरा करते हैं। 🔥 यह तो बहुत अच्छी बात है!
 
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