मायावती ने लखनऊ में रैली की तो भीड़ उमड़ पड़ी। यह वो भीड़ थी, जो अपने साथ रोटियां बांधकर लाई थी। सोचिए कितनी कमिटेड जनता होगी, जो सिर्फ मायावती के नाम पर इकट्ठी हुई। ये देखकर कोई भी आश्चर्य नहीं करेगा। क्योंकि मायावती ने हमेशा अपने लिए एक विशाल समर्थक बनाने की कोशिश की है। और इस बार तो उनकी रैली में ढाई से तीन लाख लोग मिलकर पागलपन का प्रदर्शन कर रहे थे।
इस तरह की भीड़ पहले कभी नहीं देखी गई। क्योंकि जब भी मायावती ने रैलियां लगाई हैं, तो उनके समर्थक अपने-आप से स्वयंसेवकों की पेशकश कर रहे थे। लेकिन इस बार तो वे ऐसे थे, जैसे सैनिक फोर्ट। सोचिए, दिल्ली में बसपा के रणनीतिकार ने कहा, 'जब तक भीड़ है, हम चुप रहते हैं।'
मायावती की योजना समझने को लेकर एक सीनियर जर्नलिस्ट अमिताभ अग्निहोत्री कहते हैं, 'यह देखकर आश्चर्य नहीं है कि मायावती 2007 के बाद से लगातार राजनीतिक सक्रियता ने अपना असर कम कर रही थी। इसका असर सीट के नंबर और वोटर शेयर पर भी दिखा।'
इस तरह की भीड़ पहले कभी नहीं देखी गई। क्योंकि जब भी मायावती ने रैलियां लगाई हैं, तो उनके समर्थक अपने-आप से स्वयंसेवकों की पेशकश कर रहे थे। लेकिन इस बार तो वे ऐसे थे, जैसे सैनिक फोर्ट। सोचिए, दिल्ली में बसपा के रणनीतिकार ने कहा, 'जब तक भीड़ है, हम चुप रहते हैं।'
मायावती की योजना समझने को लेकर एक सीनियर जर्नलिस्ट अमिताभ अग्निहोत्री कहते हैं, 'यह देखकर आश्चर्य नहीं है कि मायावती 2007 के बाद से लगातार राजनीतिक सक्रियता ने अपना असर कम कर रही थी। इसका असर सीट के नंबर और वोटर शेयर पर भी दिखा।'