क्या RSS की तरह रणनीति बना रहीं मायावती: MY फॉर्मूला का काट लाने की तैयारी, 2027 में BJP नहीं, अखिलेश पर निशाना

मायावती ने लखनऊ में रैली की तो भीड़ उमड़ पड़ी। यह वो भीड़ थी, जो अपने साथ रोटियां बांधकर लाई थी। सोचिए कितनी कमिटेड जनता होगी, जो सिर्फ मायावती के नाम पर इकट्ठी हुई। ये देखकर कोई भी आश्चर्य नहीं करेगा। क्योंकि मायावती ने हमेशा अपने लिए एक विशाल समर्थक बनाने की कोशिश की है। और इस बार तो उनकी रैली में ढाई से तीन लाख लोग मिलकर पागलपन का प्रदर्शन कर रहे थे।

इस तरह की भीड़ पहले कभी नहीं देखी गई। क्योंकि जब भी मायावती ने रैलियां लगाई हैं, तो उनके समर्थक अपने-आप से स्वयंसेवकों की पेशकश कर रहे थे। लेकिन इस बार तो वे ऐसे थे, जैसे सैनिक फोर्ट। सोचिए, दिल्ली में बसपा के रणनीतिकार ने कहा, 'जब तक भीड़ है, हम चुप रहते हैं।'

मायावती की योजना समझने को लेकर एक सीनियर जर्नलिस्ट अमिताभ अग्निहोत्री कहते हैं, 'यह देखकर आश्चर्य नहीं है कि मायावती 2007 के बाद से लगातार राजनीतिक सक्रियता ने अपना असर कम कर रही थी। इसका असर सीट के नंबर और वोटर शेयर पर भी दिखा।'
 
मायावती की रैली में इतनी भीड़ देखने को मिली, तो लगता है कि उनका समर्थन कितना मजबूत है। लेकिन सोचिए, ये भीड़ किस तरह की थी। उनके पास खाने के लिए भी रोटियां लाई जा रही थीं। यह देखकर मुझे लगता है कि लोगों को बहुत परेशानी से वोट देने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा, बसपा के रणनीतिकार की बात सुनकर मुझे लगता है कि अगर भीड़ है, तो सब चुप रहते हैं। लेकिन मैं उन्हें बताना चाहता हूं, यह तरीका कैसे काम करेगा। क्योंकि जब भी मायावती ने रैलियां लगाई हैं, तो उनके समर्थक हमेशा अपने-आप से स्वयंसेवकों की पेशकश कर रहे थे। लेकिन इस बार वे और भी गंभीर दिख रहे थे।
 
मायावती की रैली में ढाई से तीन लाख लोगों की भीड़ देखकर तो मुझे लगना चाहिए कि मैं फिल्म 'गोलमाल' में हूँ, जahan वो लोग जो रोटियां बांधके इकट्ठे होते हैं वो सभी अपने पिताजी की तरह आते हैं! 🤣

लेकिन सोचिए, जब तक भीड़ है, तो बसपा के रणनीतिकार चुप रहते हैं, और मायावती की राजनीति पर अमिताभ अग्निहोत्री कहते हैं कि 2007 के बाद से लगातार सक्रियता ने असर कम कर रही थी, तो लगता है कि हमें अपने देश में पागलपन का खेल जारी रखना चाहिए! 😂

कोई भी राजनेता अगर उनके समर्थन वालों से इतना प्यार और समर्थन लेते हैं तो फिर वो कुछ नहीं कह सकते, बस यही समझना चाहिए कि मायावती ने अपने लिए एक विशाल समर्थक बनाने की कोशिश की है, और अब हमें उनकी पागलपन की रैलियों में शामिल होना चाहिए! 🤪
 
मायावती की रैली में इतनी भीड़ उमड़ पड़ी! 🤯 तो हमारे देश में यही समस्या है - लोगों को सिर्फ नाम पर इकट्ठा करने की प्रवृत्ति। उनके समर्थक अपने-आप से स्वयंसेवकों की तरह खड़े होते हैं, लेकिन तो यह तो एक भ्रष्टाचार की बात है! 🤑 और अमिताभ अग्निहोत्री जी का कहना सही है, मायावती की राजनीतिक सक्रियता कम होने से लोगों को लगता है कि वे अभी भी शक्तिशाली हैं। तो हमें सिर्फ नाम पर इकट्ठा करने वाले लोगों के बारे में नहीं सोचते, बल्कि उनकी वास्तविक योजनाओं और प्रयासों के बारे में सोचते हैं। 😒
 
मैंने याद किया है जब मेरे पिताजी ने मायावती जी को पहली बार राजनीति में आयोजित किया था, वो तो ऐसी एक छोटी सी लड़की थी, लेकिन उनके लिए समर्थन बहुत मजबूत था। आज देख रहा हूँ कि वो इतनी प्रभावशाली बन गई है, यह बिल्कुल आश्चर्यजनक नहीं है। लेकिन मुझे लगता है कि इस तरह की भीड़ वाली रैलियों से हमारी राजनीतिक संस्कृति में कुछ गलत हो रहा है, और यह देखकर बहुत चिंतित हूँ।
 
मैंने देखा है लखनऊ में मायावती की रैली, वहाँ भीड़ उमड़ पड़ी 🤯। और यह तो बहुत ही कमिटेड जनता निकली। लेकिन मुझे लगता है कि ये सभी सिर्फ पागलपन कर रहे थे। क्योंकि जब तक भीड़ है, तो बसपा चुप रहता है। 😂

मैंने सोचा है कि यह रैली मायावती को अपने समर्थन को बढ़ाने का तरीका है। लेकिन मुझे लगता है कि ये सब तरीका सही नहीं है। क्योंकि जैसे ही, वह अपने समर्थन को बढ़ा रही है, उसका वोटर शेयर भी कम हो रहा है। 🤔

मैंने अमिताभ अग्निहोत्री से पूछा, और माने तो उनकी बात कुछ सच्ची है। लेकिन मुझे लगता है कि मायावती अभी भी अपने समर्थन को बढ़ाने की कोशिश कर रही है। और यह तरीका कभी नहीं कामेगा। 😅
 
मैंने ऐसी भीड़ पहले कभी नहीं देखी है जितनी उत्साहित हो रही है। लेकिन जब मुझे लगता है कि सब कुछ ठीक से चल रहा है, तो मेरे मन में एक सवाल उठता है कि यह भीड़ केवल मायावती के समर्थक ही नहीं हैं, बल्कि दिल्ली में बसपा के लोग भी इसमें शामिल हैं। और अगर वहां कोई समस्या है, तो वह कैसे हल होने वाली है? मुझे लगता है कि हमें यह सोचकर चलना चाहिए कि हमारी भीड़ कितनी कमिटेड और शांतिपूर्ण हो सकती है।
 
मायावती की रैली में इतनी भीड़ हुई, तो लगता है कि लोग उनकी पार्टी में जाने के लिए उत्सुक नहीं हैं। यह एक अजीब बात है। और दिल्ली में बसपा के रणनीतिकार की बात सुनकर लगता है कि वह अपनी पार्टी को फिर से जीवंत बनाने के लिए कह रहे हैं। लेकिन जब तक भीड़ है, तो चुप रहते रहना अच्छा है? क्या वास्तव में लोगों को ऐसी बात नहीं लगती कि बसपा वापस आ गया है? 🤔
 
मैंने ऐसी भीड़ कभी नहीं देखी, जो तो रैली में आ जाएं। लेकिन मायावती जी की इस तरह से जनता को इकट्ठा करने का तरीका मुझे अच्छा लगता है। उनकी वफादारी की बात करें, तो यही सच्चाई है, लेकिन जब तक उनके समर्थक खुद स्वयंसेवकों जैसे बनते हैं, तो मैं समझ नहीं पाऊँगा कि उन्हें और कहाँ जाना है।

मेरे दादाजी की याद आती है, वे भी अपने क्षेत्र में रैलियां लगाते थे, लेकिन उनकी भीड़ कभी ऐसी बड़ी नहीं थी। उन्होंने हमेशा अपने समर्थकों से बातचीत करने की दुनिया में आ हुआ था, न कि बस अपने समर्थन प्राप्त करने की ताकत।

और फिर भी, मैं समझ नहीं पाऊँगा कि क्या ऐसी बड़ी भीड़ की अनुमति मिलेगी? मुझे लगता है कि नेताओं को अपने समर्थन को वास्तविक बनाने की जरूरत है, न कि खुद को एक देशव्यापी घटना बनाकर।

कुछ लोग मायावती जी को बहुत प्रभावशाली ठहराते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि उनका समर्थन एक अस्थिर और अस्थिर संस्कृति पर आधारित है।
 
मुझे लगा कि यह तो बहुत ही रोचक स्थिति है जो मायावती के पास है। लेकिन, यह सवाल उठता है कि उनके समर्थन में इतनी भीड़ इकट्ठी होने का अर्थ क्या है? मैंने अपनी बैच में एक ऐसी छात्रा थी, जो हमेशा पढ़ाई से खुश रहती थी। जब हमारी बैच के सभी शिक्षकों को एकजुट करके हमने एक बड़ा आयोजन आयोजित किया, तो वाह! रोटियां फोड़कर मौज-मस्ती करना सबके लिए एक नया खेल बन गया। लेकिन, मुझे लगता है कि यह भीड़ इकट्ठा करने की बात एक बड़ी समस्या हो सकती है। क्योंकि जब भी कोई एक व्यक्ति इतना प्रभावशाली बन जाता है, तो उसके समर्थक अपने-आप से नाम-निरस्त हो जाते हैं और कुछ गलत होने पर भी उन्हें जवाबदेह ठहराया जाता है। यह सोचकर मुझे थोड़ा चिंतित होता हूँ।
 
मायावती की रैली में ऐसी भीड़ उमड़ने को तो लोग जानते हैं कि क्या... 🤯 वह अपने समर्थकों को स्वयंसेवकों की तरह पेश करती रहती है, लेकिन यह तो एक अलग बात है जब वे सच्ची राजनीतिक शक्ति बन जाती हैं। मुझे लगता है कि भीड़ उमड़ने की इस चालाकी से निश्चित रूप से उन्हें अपने समर्थन को बढ़ाने में मदद मिलेगी। लेकिन हमें यह सोचकर नहीं रहना चाहिए कि यह उनकी राजनीतिक विजय का अंतिम निशान है। 🤔
 
मायावती की रैली में जितनी भीड़ हुई, उतनी भीड़ हमेशा नहीं देखी गई। लेकिन यह जरूरी नहीं कि हम उनके समर्थन को गलत समझें। हमें पता है कि मायावती ने अपने लिए एक विशाल समर्थक बनाने की कोशिश की है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके समर्थक पूरी तरह से भ्रमित और अज्ञात हैं।
 
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