खरगोन में पुलिस ने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा, VIDEO: गाड़ी के गेट पर पटककर डंडे से अंदर ठूंसा; प्रदर्शनकारी कर रहे थे चक्काजाम - Khargone News

खरगोन में पुलिस ने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा, घायलों को गाड़ी तक लेकर आई, 5 लोगों को हिरासत में लिया गया।

प्रदर्शनकारियों ने शराब ठेकेदार के खिलाफ इलाज खर्च और 15 लाख रुपये मुआवजे की मांग की। 15 दिन पुरानी घटना से हंगामा तो बढ़ गया।

पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर हल्का बल प्रयोग करना पड़ा और 4 से 5 लोगों को हिरासत में लिया गया, डिप्टी कलेक्टर भी मौजूद रहे।

इस खबर के बाद परिजन घायल को मुआवजा और जिम्मेदारों पर कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं।
 
बड़े दुख है यह खबर सुनकर, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को इतनी बुरी तरह पीटा और घायल लोगों को गाड़ी तक नहीं पहुँचाया, यह तो बहुत ही गलत है। शराब ठेकेदार के खिलाफ मांग करना स्वाभाविक है, लेकिन पुलिस ने क्या जरूरत थी, हल्का बलप्रयोग करना पड़ गया। अब परिजन घायल लोगों को मुआवजा और जिम्मेदारों पर कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं, उनकी बात सुननी चाहिए।
 
मुझे यकीन नहीं है कि पुलिस ने कितना साहसिक व्यवहार किया। पहले तो दौड़ा-दौड़ाकर पीटना ठीक है, लेकिन फिर घायलों को गाड़ी तक लाना? यह एक अच्छी बात नहीं लगती। 5 लोग हिरासत में लिए गए, लेकिन इसमें से कौन सा लोग सच्चे अपराधी था, इस पर निर्णय देना ज्यादा मुश्किल है।
 
😡 यह तो अचानक से पुलिस ने इतना हालात में लाया? पहले से 15 दिन से घायलों को इलाज करवाना चाहिए, ना तो बस अड्डे पर बैठकर रोकना चाहिए।

क्या पुलिस की कोई विशेष ट्रेनिंग नहीं है जिससे ये जानती हो कि कैसे स्थिति को समझाएं? और 4-5 लोगों को हिरासत में लाने से क्या बात है?

डिप्टी कलेक्टर भी तो वहीं दौड़ा-दौड़ाकर आ गए, यह तो कुछ नहीं, न ही प्रदर्शनकारियों की बात सुनना। घायलों के परिजन मुआवजा की मांग कर रहे हैं, लेकिन पुलिस क्या करेगी?
 
अरे, यह तो क्या हुआ? पुलिस ने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा और गाड़ी तक लेकर घायलों को आ गई। 15 लाख रुपये की मांग कर रहे थे और इलाज खर्च भी। अब परिजनों को मुआवजा मांगना है। यह तो बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है... 🤕
 
मैंने देखा तो यह घटना पूरी तरह से बेकार की लगी, दौड़ा-दौड़ाकर पीटना और गाड़ी तक लेकर आना... ये क्या हुआ? प्रदर्शनकारियों ने शराब ठेकेदार के खिलाफ जताया था, तो फिर से पुलिस ने उन्हें मुकदमा करने की बात कह दी, यह तो उनके दिमाग की बात है...

मैं समझता हूँ कि घटना 15 दिन पुरानी है, लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद भी परिजन घायल को मुआवजा और जिम्मेदारों पर कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं... यह तो उनके अधिकार की बात है... पुलिस ने हल्का बल प्रयोग करना पड़ा, यह तो दुर्भाग्य है, लेकिन प्रदर्शनकारियों को भी अपनी गलती मानकर सीखनी चाहिए...
 
मेरी सोचते समय तो यही सोच आयी कि अगर पुलिस भी नागरिक की तरह होती तो पहले तो ऐसी चीजें नहीं होती। लोगों की बात सुनना और समझना सबसे ज्यादा जरूरी है, लेकिन लगता है कि पुलिस को समझने में परेशानी होती है।

मैं तो ये कह सकता हूँ कि अगर शराब ठेकेदार ने लोगों से इलाज खर्च मांग रहे थे तो उसे समझना चाहिए था कि लोगों की परेशानियाँ सुनने वाला पुलिस है।

अब तक की घटनाओं से लगता है कि सरकार जानती है कि अगर मुआवजा नहीं दिया जाता तो लोग खफा रहेंगे। पर अगर सचमुच चीजें ठीक हो जाएंगी तो हमें हंसना चाहिए।
 
अरे, यह तो बहुत ही गंभीर मामला है... पुलिस की तरह से दौड़ा-दौड़ाकर पीटना क्या है, यह तो कानून के खिलाफ है। लोगों को अपने अधिकारों के बारे में जागरूक करना चाहिए, ना कि डराने-धमकाने से।

प्रदर्शनकारियों की मांग ठीक है, इलाज खर्च और 15 लाख रुपये मुआवजा तो जरूरी है। लेकिन पुलिस की तरह से हालात निपटाने की व्यवस्था करनी चाहिए, ना कि दौड़ा-दौड़ाकर।

परिजनों की बात समझ में आती है, मुआवजा और जिम्मेदारों पर कार्रवाई करना जरूरी है। लेकिन यह तो कानून के साथ-साथ न्याय के साथ भी चलना चाहिए।

किसी भी तरह की घटना होती है, तो सबको एक साथ आना चाहिए और समस्या का समाधान ढूंढना चाहिए...
 
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