लोकतंत्र दांव पर, संघवाद हो रहा है खत्म: जानें ममता बनर्जी ने ऐसा क्यों कहा

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने संविधान दिवस पर एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा, "बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी ने हमारे संविधान में एक नई राह खोली है, जिसमें हर भारतीय को बराबरी, न्याय और सम्मान का अधिकार मिला।"

उन्होंने कहा, "आज के इस दिन पर, हमें यह याद दिलाई जा रही है कि लोकतंत्र मजबूत होता है, जब सत्ता नहीं बल्कि संविधान सर्वोपरि होता।"

उन्होंने आग्रह किया, "हम मिलकर संविधान की आत्मा—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—की रक्षा करने के लिए संकल्प लेने के लिए आग्रह करते हैं।"

इस बयान को सुनकर एक सवाल उठता है कि क्या इस तरह के बयान में सरकार की भूमिका तो साफ रूप से दिखाई दे रही है?
 
कबीर, यह बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल है। जैसे ही हम अपने संविधान की खोज करते हैं और उसकी रक्षा करने के लिए एकजुटता बनाए रखते हैं, तो हमें यह भी याद रखना चाहिए कि सत्ता का सही उपयोग केवल सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन, अगर हम मिलकर संविधान की आत्मा की रक्षा करने के लिए संकल्प लेते हैं, तो यह एक दूसरे की जिम्मेदारी भी बन जाती है 🙏
 
अरे अरविंद जी की बात सुनकर अच्छी लगती है 🙏। हमेशा से कहा जाता है कि लोकतंत्र तो सत्ता नहीं बल्कि संविधान की मालिक होती है। लेकिन दिल्ली सरकार से लेकर, नई दिल्ली तक सभी जगह पर यह बात कही जाती रहती है 🤔। कुछ तो मुझे लगता है कि अगर हम सभी मिलकर संविधान की रक्षा करने के लिए संकल्प लेंगे, तो सरकार भी इसकी ओर दिशा देगी।

कृपया इस विषय पर और जानकारी चाहिए तो [यहाँ पढ़ें](https://www.ndtv.com/india-news/sanjay-pee-kelkar-on-babasaheb-ambedkar-s-birthday-what-can-we-do-to-prote…).
 
अरे अरे! संविधान दिवस पर इतनी भावना आ गई है! लेकिन, मैं तो यह सवाल करता हूँ कि क्या सरकार की भूमिका बातचीत में साफ रूप से चिपकी रहती है? ये बयान तो हमेशा के लिए प्रेरणा देता है, लेकिन जिंदगी में बदलाव लाने के लिए सरकार की कोई भूमिका कहीं नहीं दिखाई देती। हमें स्वयं अपने निर्णय लेने और बदलाव लाने की जरूरत है।
 
अरे वाह! यह बयान बहुत महत्वपूर्ण है। अरविंद केजरीवाल जी ने सचमुच हमें याद दिलाया है कि संविधान हमारे लिए कितना मूल्यवान है। उन्होंने बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका को पहचाना है, जिसने हमारे संविधान को बनाया था।

लेकिन, सच्चाई यह है कि सरकार की भूमिका साफ रूप से दिखाई देती है। उन्होंने कहा है कि लोकतंत्र मजबूत होता है, जब सत्ता नहीं बल्कि संविधान सर्वोपरि होता। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है, और हमें अपने देश की गहराई में जाकर इसे समझना चाहिए। 🤔
 
क्या ये फोरम पर चर्चा करने का तरीका नहीं है? यहाँ हर विचार को एक बयान में बदल दिया जाता है और सरकार की भूमिका बिना एहसास के लेकर लेकर ले जाया जाता है। फिर तो शायद ये फोरम केवल एक गैर-राजनीतिक चर्चा प्लेटफ़ॉर्म ही बन सकता है... 🤔
 
केजरीवाल जी ने बाबासाहेब आंबेडकर जी की बात सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगता है, उनकी बातें हमेशा लोकतंत्र के मूल्यों को दर्शाती हैं और हमें एक नई दिशा दिखाती हैं। अगर सरकार भी उनकी बात सुनती है तो फिर सब अच्छा होगा, लेकिन खुद तो लगता है कि सरकार तो पहले से ही आंबेडकर जी की आत्मा की रक्षा करने की कोशिश कर रही है।
 
केजरीवाल जी के बयान सुनकर लगता है कि वे अपने आप को एक दूसरे के प्रति बहुत अधिक निर्भर कर रहे हैं। अगर सत्ता और सरकार सर्वोपरि है, तो यह कैसे हमारे लोकतंत्र की मूल्यों को बनाए रखने में मदद करेगा? क्या यह वास्तव में संविधान की आत्मा की रक्षा करने के बारे में है या केवल सरकार के प्रति समर्थन दिखाने के लिए?

केजरीवाल जी ने कहा, "हम मिलकर संविधान की आत्मा—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—की रक्षा करने के लिए संकल्प लेने के लिए आग्रह करते हैं।" लेकिन अगर सरकार तो सर्वोपरि है, तो इससे निकलने वाला संकल्प क्या होगा, जब सरकार ही हमें अपनी राह में चलने के लिए मजबूर कर देती है? 🤔
 
केजरीवाल जी के बयान सुनकर अच्छा लगता है 🤝, लेकिन क्या हमारी सरकार पूरी तरह से उन्हें समर्थन दे रही है? मुझे लगता है कि सरकार को भी अपने शब्दों को सच्चाई में बदलना चाहिए 🤔, न कि बस बयान करना।
 
बोलते हुए अरविंद जी को समझाना मुश्किल होगा, लेकिन संविधान दिवस पर अपने बयान में सरकार की भूमिका तो बहुत साफ तौर पर दिखाई देती है। कहीं खोए नहीं गए कि यह बयान किस दिशा में सरकार की ओर इशारा कर रहा है! 😐

क्या इस तरह के बयान से हमें अपने संविधान की समझ बढ़ने का मौका मिलेगा या फिर यह तो एक राजनीतिक अभियान बनकर आगे बढ़ जाएगा? 🤔
 
अरे, यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है। संविधान दिवस पर एक बयान देने से पहले हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारी सरकार भी इस मुद्दे पर आगे बढ़ रही है। अगर कुछ नहीं बदल रही है, तो बस व्याख्या कर देना और बयान देना फायदेमंद नहीं होगा। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सरकार भी अपनी जगह पर खड़ी है और लोकतंत्र के मूल्यों को बनाए रखने के लिए काम कर रही है।
 
अरे अरे, यह बयान सुनकर तो लगता है कि अरविंद जी ने अच्छी तरह से समझ लिया है कि संविधान का मुख्य उद्देश्य कैसे है। लोकतंत्र मजबूत होता है तब जब सत्ता नहीं बल्कि संविधान सर्वोपरि होता।

मुझे लगता है कि बाबासाहेब जी ने हमारे संविधान में एक नई राह खोली है, और अब तो हमें उनके विचारों को आगे बढ़ाने का समय आ गया है। सरकार की भूमिका तो बिल्कुल दिखाई दे रही है कि वे संविधान की रक्षा करने के लिए तैयार हैं।

लेकिन मुझे लगता है कि हमें अपने स्वयं के कर्तव्यों को भी नहीं भूलना चाहिए। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम संविधान की आत्मा—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—की रक्षा करते रहें।
 
केजरीवाल जी ने बाबासाहेब आंबेडकर जी की याद में इतनी महत्वपूर्ण बात कही है... लगता है कि उन्होंने हमारे संविधान को और भी मजबूत बनाने की कोशिश की है। लेकिन मुझे लगता है कि सरकार की भूमिका तो यहाँ दिखाई नहीं देती, होती। हमें यह जरूरी है कि संविधान की रक्षा करने के लिए एकजुट होकर और साथ में काम करें। 🙏💪
 
मुझे लगता है कि अरविंद केजरीवाल जी का यह बयान बहुत अच्छा है, लेकिन मैं थोड़ा चिंतित हूं कि सरकार की भूमिका तो कहीं नहीं दिखाई देती। मुझे लगता है कि अगर हम अपने संविधान और न्याय की रक्षा करने के लिए एकजुट हों, तो सरकार की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण होगी।
 
मैंने कहा था कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी ने हमारे संविधान में एक नई राह खोली है, लेकिन जब उनके बयान पर सरकार की भूमिका पूछने वालों को जवाब देने की जरूरत है तो मुझे लगता है कि कुछ नहीं समझा। अगर हम संविधान दिवस पर इतने प्रतिबद्ध हैं तो फिर सरकार का रोल क्या है? सरकार तो संविधान का हिस्सा नहीं है, लेकिन उसकी भूमिका संविधान में कौन सिखाता है? 🤔

मेरे मानने वालों को लगता है कि अगर हम चाहें तो संविधान की आत्मा—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—की रक्षा करने के लिए एक दूसरे पर भरोसा कर सकते हैं। सरकार भी इसके लिए जरूरी नहीं है। 😊
 
केजरीवाल जी का बयान अच्छा लगा, लेकिन कहीं जरूरी नहीं कि हम सब परिवारों के लिए और भी बोलें। 🤔
 
अरे भाइयो, यह बयान सुनकर हमें एक बात सोचने पर मजबूर करता है कि सत्ता और संविधान की अलग पहचान क्यों नहीं समझी जा रही है। हमारे नेताओं को हमेशा से कहा गया है कि सत्ता सर्वोपरि है, लेकिन क्या हम वास्तव में संविधान की आत्मा की रक्षा कर रहे हैं?

मेरा यह सवाल है कि अगर हमारे नेताओं को अपने बयान से यह समझने की जरूरत नहीं है, तो फिर सरकार की भूमिका कैसे चिह्नित होगी। लेकिन अगर हम सच्चाई से सोचने लगें, तो हमें यह समझने की जरूरत है कि संविधान और सत्ता दोनों एक-दूसरे के माध्यम से चलते हैं।

इसलिए, हमें यह सवाल करना चाहिए कि हमारे नेताओं को अपने बयान से सत्ता या संविधान की पहचान पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है?
 
अरे बेटा, यह बयान निकलना अच्छा है, लेकिन यह सवाल है कि सरकार की भूमिका कौन बताएगा। हमें पता चलना चाहिए कि क्या वास्तव में कोई काम कर रहा है या फिर बस बयान निकालने में मजाक कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह देखنا चाहिए कि कैसे सरकार अपनी तरफ से क्या काम कर रही है।
 
अरे ये बात तो सचमुच सही है 🤔, हमारा संविधान दिवाली पर इतना महत्व दिया जा रहा है, लेकिन क्या हमारी सरकार ने भी अपनी भूमिका बताई है? मुझे लगता है कि यह तो एक सवाल है, क्योंकि अगर हमारी सरकार सचमुच संविधान की रक्षा करने के लिए आग्रह कर रही है, तो वह अपने कदमों और निर्णयों में भी इसका प्रदर्शन कर सकती थी।

लेकिन फिर भी, मुझे यह अच्छी बात लगी कि अरविंद केजरीवाल जी ने इस संविधान दिवाली पर इतने सकारात्मक शब्दों का उपयोग किया है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारा संविधान वास्तव में हर भारतीय के लिए बराबरी, न्याय और सम्मान की दिशा में मोड़ लाने के लिए बनाया गया था।

इसलिए, मुझे लगता है कि हमें अपने संविधान को और अधिक समझने, अपने नागरिक अधिकारों को जानने की प्रेरणा मिलती है। यही हमारी सरकार की भूमिका भी हो सकती है, न कि बस बयान देना। 💡
 
बात करते समय बोलते समय भी थोड़ा सावधानी बरतना चाहिए, ना कहीं जीभ से आग लग जाए 😊। अरविंद केजरीवाल जी के बयान से मुझे यह एहसास हुआ कि वे सच्चे राष्ट्रवादी हैं। लेकिन जब सरकार की भूमिका तो दिखाई देती है तो यह सवाल उठता है कि सरकार क्या कर रही है? दिल्ली में सब्जी दुकानों के मामले में सिर्फ बयान नहीं जुटाया, बल्कि एक नीति पर भी हस्ताक्षर किए गए। 😊
 
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