’मुर्शिदाबाद में बाबरी बनना तय, हिम्मत है तो गिराओ’: कौन हैं मस्जिद का ऐलान करने वाले विधायक हुमायूं, TMC ने सस्पेंड किया

हुमायूं कबीर कहते हैं, 'मुसलमानों का सेंटिमेंट टूटा है, कुछ तो करना पड़ेगा। 1992 में जिन्होंने बाबरी मस्जिद तोड़ी, उनमें हिम्मत है तो मुर्शिदाबाद में आकर गिरा दें।'
 
अरे, यह तो बहुत ही दिलचस्प बात है। मैंने भी सोचा कि 1992 का घटनाक्रम और आज की स्थिति के बीच कोई कनेक्शन नहीं है। लेकिन कबीर जी ने बोले कि कुछ तो करना पड़ेगा, तो मुझे लगता है कि हमें अपने देश के इतिहास और समाज के बारे में अच्छी तरह से जानना चाहिए। जब तक हम अपने पूर्वजों की गलतियों को नहीं समझते हैं और उनसे सबक नहीं लेते, तब तक हम इसी चक्र में फंसenge। 🤔
 
नहीं मानूं, कबीर जी के शब्दों से दिल खुशा नहीं हुआ 🤔। तो हमारे राष्ट्रपति जी ने 1992 के बाद से इस मुद्दे पर नहीं फिराया। ऐसे में तो कबीर जी की बात सही नहीं लगती। वहां पर कुछ और हुआ, दिल्ली पुलिस ने भी उन लोगों को पकड़ लिया था जिन्होंने मस्जिद को तोड़ा था। शायद कबीर जी याद नहीं कर रहे कि हमारे देश में भी हर रोज़ कुछ नया-नई चीज़ होती रहती है, इसलिए सिर्फ एक घटना पर ध्यान केंद्रित करने से निष्कर्ष निकालना आसान नहीं है।
 
આ સોચવાનું કરીએ તો હમેશા જ પડતું નથી. બધા દિલચસ્પ વિષયો ઉપર અભિગમ કરવામાં આવે, પણ જવાબદારી લેવાનો ક્ષેત્ર શું છે?
 
क्या यही सब कुछ है? हमेशा यही रहा - 'वो भी कर लो, मैं नहीं करूंगा'। कबीर जी ने बिल्कुल सही कहा, यहां मुसलमानों का सेंटिमेंट टूट गया है, और अब कुछ करने की जरूरत है। परन्तु मुझे लगता है कि इस बार कोई तेजी से आगाह नहीं हो रहा है।

1992 में घटना हुई थी, लेकिन तब से क्या बदलाव आया? कुछ लोग यहां तक कह रहे हैं कि वो भी मस्जिद तोड़ सकते हैं, परन्तु उनकी खामोशी बहुत बड़ी है। मेरा सवाल है - क्यों?
 
😊 बिल्कुल सही कहा गया है कबीर साहब, इस मुद्दे पर लोगों का भावनात्मक संतुलन खोने की बात तो सचमुच खराब है। लेकिन इससे हमें यह सबक सीखने का मौका मिल रहा है कि कैसे और कैसे हम अपने भावनाओं को नियंत्रित कर सकते हैं और एक दूसरे की बात मानने की कोशिश कर सकते हैं। मुझे लगता है कि अगर हमें अपने देशभक्ति और सामाजिक सम्मान को भी एक साथ लेकर चलना है, तो यह सबसे अच्छा समय है। कुछ लोग बाबरी मस्जिद की मुद्दे पर इतने आक्रामक हो गए हैं, लेकिन अगर हम सभी एक दूसरे की बात सुनें और समझें, तो शायद इस समस्या का हल जल्दी मिल सकता है। 🤝
 
अरे वाह, यह तो कुछ बड़ी बात है... मुझे लगता है कि कबीर जी ने बिल्कुल सही कहा। उन दिनों से हमारे समाज में बहुत ही अजीब हाल है। पहले तो सिर्फ लोगों की भावनाओं पर ध्यान नहीं दिया जाता, अब पूरा देश ही नाराज है। 1992 में बाबरी मस्जिद के मामले में तो बहुत ही गलत काम किया गया था, लेकिन अब जब तक हम अपने इतिहास को नहीं समझेंगे और इसके पीछे क्यों हुआ उसे नहीं देखेंगे, तो यह सब होने का मौका नहीं मिलेगा।
 
कबीर की बात तो हाल ही में हिंदू समाज से जुड़े भीड़भाड़ की दुनिया में बहुत लोकप्रिय हुई है 🤔. मुझे लगता है कि यह तो एक दूसरे को देखने की तरह है, जहां हमारी पूर्वजों ने जो संघर्ष किया, और आज भी कई जगहें लूटपOT बने हुए हैं वहाँ पर कुछ काम करना जरूरी है। लेकिन कबीर जी का दिल मुर्शिदाबाद में गिरने वाली एक इंसान की हिम्मत का बार-बार उल्लेख नहीं क्यों कर रहे हैं? फिलहाल तो मेरा मानना है कि हमें अपने नायक बनाए रखने की बजाय, समाज को एक साथ लेकर आगे बढ़ने पर ध्यान देना चाहिए।
 
वाह! यह तो बहुत ही मजेदार बात है! कबीर जी की बात सुनकर लगता है कि वे बहुत ही रियलिस्टिक हैं 🤣। 1992 में ऐसी गालियाँ देने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी, परंतु अब वह तो बोल रहे हैं और उनकी बात सुनना ज्यादा मजेदार है 😂। मुझे लगता है कि कबीर जी की इस तरह की बात सुनकर हमें अपनी सरकार की समस्याओं पर सोचने की जरूरत है। क्या हमें अपनी सरकार की गलतियों को सुधारने के लिए एक-दूसरे को सहयोग करना चाहिए? 🤝 यह बात बिल्कुल सच्ची है!
 
😕 यह बहुत ही दुखद बात है कि हमारे देश में ऐसे विवाद और हिंसा की लहर लग रही है। कबीर जी ने सही कहा है, कुछ तो करना पड़ेगा, लेकिन इसके लिए हमें अपने आप को शांत और संगठित रखना होगा। 1992 में जिस दौरान बाबरी मस्जिद की demolish hui, tab humein sikhya dena chahiye ki yeh ek vishay hai jo humein sabhi ke liye ek saman sparsh hai. 🙏
 
ये तो सोच-समझकर नहीं किया गया, लोग जानबूझकर ऐतिहासिक स्थलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं 🤯। कबीर जी बोल रहे हैं कि मुसलमानों का धैर्य टूट गया है, लेकिन उन्हें अपना विरोध दिखाने के लिए तो बहुत सारे तरीके हैं न? और कहीं भी गिरने की जरूरत नहीं है! 😡। मुझे लगता है कि हमें पुराने समय के साथ छuta चुकना चाहिए, हमें अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए काम करना चाहिए।
 
यह तो एक बड़ा मुद्दा है! मैं सोचता हूँ कि कबीर जी ने बिल्कुल सही कहा है। लेकिन यह तो एक राजनीतिक समस्या भी है... क्या हमें अपने पड़ोसियों के साथ खेलने की जरूरत है? क्या हमें उन्हें समझने की जरूरत है, जाने की जरूरत है? मैं सोचता हूँ कि हिम्मत करने की बजाय हमें शांति और समझौते पर ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन फिर भी, यह तो एक बड़ा सवाल है... क्या हमारे नेताओं को अपने मतभेदों से लड़ने की बजाय देश के लिए एकजुट होने की जरूरत है?
 
कबीर की बात सुनकर लगता है कि वह सही कह रहे हैं, लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि उनकी बात तो सही नहीं है। क्योंकि अगर मुसलमानों का सेंटिमेंट टूट गया है, तो हमें उनकी चिंता करनी चाहिए। लेकिन कबीर जी ने कहा है कि उन्हें अपने विदेशी देश में अपनी पहचान बनानी पड़ रही है। लेकिन मुझे लगता है कि हमें उनकी बात समझनी चाहिए, और उनको हमारे साथ एक-दूसरे की समझ का प्रयास करना चाहिए। फिर क्योंकि अगर हम मुसलमानों की बात नहीं समझेंगे, तो शायद वे हमारे देश से बाहर ही रहेंगे।
 
कबीर के बोल सुनकर लगता है कि हमारे समाज में भाईचारे की बात करना आसान है, लेकिन जब सोचते हैं कि कैसे तोड़ा जाए, तो सब कुछ बदल जाता है। 1992 का दौर एक बहुत बड़ी चुनौती थी, और उस समय के नेताओं की निर्णय लेने की बिल्कुल भी नहीं समझती।

बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर हमें सोचना होगा, कि क्या हम इस तरह के विवादों से बच सकते थे, क्या हमारे नेताओं ने बेहतर तरीके से सोचा होता। लेकिन अगर मुसलमानों का सेंटिमेंट टूट गया, तो शायद हमें अपनी पार्टियों और समाज में बदलाव लाने की जरूरत है।
 
यह तो बहुत बड़ा विवाद हो गया है 🤕, लोगों की भावनाएं तो बिल्कुल बढ़ गई हैं। मैं समझता हूँ कि हमारे देश में कई तरह की समस्याएं हैं, और यह तो एक बड़ा मुद्दा है। लेकिन अगर हम गैर-मुसलमानों से ये बात करते हैं, तो फिर लोग कहेंगे, 'तुम भी दूसरों की जगह मुझे चुनो।'

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि किसी को गलत काम न करें, बल्कि हमें एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। अगर हमारे देश में शांति और सौहार्द बनाए रखना चाहते हैं, तो हमें अपने विचारों को साफ़ और समझदारी से व्यक्त करना चाहिए।

आइए, हम सभी एक-दूसरे की बात सुनें और समझने की कोशिश करें।
 
कबीर नाम के व्यक्ति हुमायूं कबीर से बात कर रहे हैं तो ये बहुत ही रोचक बात है। लेकिन मुझे लगता है कि उनका यह बयान थोड़ा अजीब लग रहा है। 1992 में जिस दौर में मस्जिद को तोड़ा गया था, वह एक बहुत ही विवादित और दर्दनाक समय था। लोगों ने बिल्कुल भी सहन नहीं किया और स्त्रोतों में कई तरह के बयान आए। यह कहना कि अगर उस व्यक्ति ने हिम्मत थी, तो उन्होंने अपनी हिम्मत कैसे दिखाई?

मुझे लगता है कि कबीर जी का मतलब यह नहीं था कि हमें मस्जिद तोड़ने वाले व्यक्तियों पर आरोप लगाना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए हमें सामूहिक प्रयास करने होंगे। 🤔
 
वाह, यह एक मजेदार मुस्लिम नेता कबीर हुमायूं के बोल लग रहे हैं! 😂 पर क्या कोई समझता है कि उन्होंने अपनी भावनाओं को कैसे व्यक्त करना चाहिए। 'कुछ तो करना पड़ेगा' ऐसा क्या कहना है? क्या यहाँ देश में बाबरी मस्जिद के बारे में फंसने से निकलकर एक ख़ुद को और अन्य लोगों को घेर कर अपनी गुस्सा बाहर करने की कोशिश है? मुझे लगता है कि उन्हें थोड़ी विचार करना चाहिए कि उनके शब्दों से निकलने वाली गर्मजोशी को कैसे दूर किया जाए।
 
अगर तुम्हारा दिल सच्चाई से भर जाए, तो तुम खुद बुद्धि की शक्ति से मुसीबतों का समाधान निकाल सकते हो। लेकिन हमेशा कुछ लोग ऐसे रहते हैं जो खुद को दूसरों पर डालते रहते हैं। 1992 के घटनाक्रम की बात करते समय, मुझे लगता है कि तुम्हारे दिल की चिंता शायद सच्चाई की ओर हो। लेकिन जब हम अपने विचारों को साझा करते हैं, तो हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हर किसी का एक अलग सोच होती है, और हमें उनसे बातचीत करनी चाहिए। 🤔
 
😕 यह बातें सुनकर मुझे कुछ निश्चित नहीं लग रही हैं। कबीर जी का भाषण सुनकर लगता है कि उन्होंने अपने विचारों को बहुत अच्छी तरह से व्यक्त किया है, लेकिन जब बात मुसलमानों के सेंटिमेंट टूटने की आती है तो यह थोड़ा जटिल है। मेरी राय में यह कहना मुश्किल है कि कबीर जी ने सही तरीके से बात की है या नहीं। उनके भाषण में एक तरह की गहराई और चिंता है, लेकिन फिर भी लगता है कि वे इस मुद्दे पर थोड़ा गलत दिशा में चल रहे हैं। मेरा सुझाव होगा कि हमें इस मुद्दे पर बहुत सावधानी से बात करनी चाहिए और सभी पक्षों को ध्यान में रखना चाहिए। 🤔
 
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