न बजट में कुछ-न कंपनियों ने सुनी; क्या हम रोबोट: गिग वर्कर्स बोले- एक्सीडेंट हो तो भी 12-13 घंटे काम करो; सरकार अंधी-बहरी हुई

कंपनियां न तो काम के मुताबिक मेहनताना दे रही हैं और न ही काम करने का सुरक्षित और बेहतर माहौल दे रही हैं। गिग वर्कर्स कहते हैं, ‘हम इंसान हैं, रोबोट नहीं। हमारे लिए न कंपनी सोच रही न सरकार। किसी को हमारी तकलीफ न दिखाई देती है न सुनाई।’

दिल्ली में प्रदर्शन में शामिल गिग वर्कर नेहा कहती हैं, ‘कंपनी अपने हिसाब से काम का दबाव बनाती है। हम पर शनिवार-रविवार को भी लगातार काम करने का दबाव बनाया जाता है। ऑटो असाइंड (जिसमें वर्कर की सहमति नहीं हो) बुकिंग मिलती है।’

उन्होंने कहा, ‘हम जिस परिवार के लिए काम करते हैं, उन्हीं के लिए समय नहीं मिल पाता। अगर हमारा एक्सीडेंट हो गया तो हमें AI से चैट करनी पड़ेगी। इसके बावजूद जरूरी नहीं है कि समाधान हो जाए।’

कंपनी सिर्फ अपना मुनाफा कमा रही है। हमें एक लाख रुपए का इंश्योरेंस देने के लिए भी शर्तें रखती हैं कि हफ्ते के 70-80 घंटे शनिवार-रविवार को पूरे करने होंगे। कोई ऑर्डर कैंसिल नहीं होना चाहिए।
 
🤔 ये तो सचमुच बहुत दुखद बात है जो गिग वर्कर्स की स्थिति में लायी गई है। हमारे देश में इतना प्रगति और विकास हुआ है, फिर भी इन लोगों को इतना अन्याय किया जा रहा है। 🤕

कंपनी को एहसान करने के बजाय, हमारी सुरक्षा और कल्याण के बारे में नहीं सोचती है और इसलिए हम अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। 🚫

मुझे यकीन है कि अगर हम सब एकजुट होकर इस मुद्दे पर ध्यान देंगे, तो हम इस अन्याय को समाप्त कर सकते हैं। हमें अपने नागरिक अधिकारों के बारे में जागरूक रहना चाहिए और सरकार से भी बात करनी चाहिए। 🗣️
 
😐 यह तो बिल्कुल सही किया गया है गिग वर्कर्स की। हमें भी अपने परिवार और खुद के लिए समय मिलना चाहिए, नहीं तो फिक्र न करे। जिस कंपनी से हम काम करते हैं वह हमेशा सोचती है कि उनका मुनाफा कमाना है, परन्तु हमारा कल्याण कौन देख रहा है? 🤔

शायद सरकार को अपनी ताकत बढ़ाने के लिए यह सब कर रही है। अगर गिग वर्कर्स को नियमित नौकरी मिल जाए तो वे खुद कंपनियों से कहीं अधिक मेहनत करने का इरादा नहीं रखेंगे। यह एक बड़ा धोखा है और हमें इसके बारे में जागरूक रहना चाहिए। 🚨
 
कंपनियां तो रोबोट्स की तरह से इंसानों को देखने लगी हैं 🤖💼, ज्यादातर बार मेहनत को नहीं समझती हैं। गिग वर्कर्स जैसे लोगों को न कंपनी और न सरकार का ध्यान रहता है 🙄। इन्हें ऑटो असाइंड बुकिंग मिलती है और शनिवार-रविवार को भी लगातार काम करने का दबाव बनाया जाता है। यह तो बहुत भारी है 🤯। अगर एक्सीडेंट हुआ तो हमें AI से चैट करनी पड़ती है, लेकिन सरकार में समाधान नहीं है 🤔। कंपनियां अपना मुनाफा कमाती हैं और इंश्योरेंस देने की शर्तें भी रखती हैं 🤑, जैसे कि हमारे लिए एक लाख रुपये का इंश्योरेंस देना चाहिए। यह बहुत अजीब है! 💸
 
कंपनियों की दुनिया में लोग कितने असुरक्षित महसूस करते हैं, 🤕 यारो... शायद अगर हम उनके दृष्टिकोण से बात करें, तो समझ आ जाए कि क्यों वे ऐसा महसूस करते हैं। गिग वर्कर्स की बातें सुनते हुए, मुझे लगता है कि उनकी जरूरतें और चिंताएं जरूर देखी जानी चाहिए। अगर हम कंपनियों को भी समझने की कोशिश करें, तो फिर यह सवाल उठता है कि क्या वे अपने लाभ के लिए हमारी सुरक्षा और सहमति को समझ रहे हैं या नहीं। शायद एक मध्यस्थता की जरूरत है, जहां हम दोनों पक्षों की बातें सुनें और उनकी जरूरतों को समझें। 🤝
 
मेरी मां की बुढ़िया अब रिटायर हुई है और उसके दादाजी ने उसे साल में 30 लाख रुपये का खाना-पीना देने का वादा किया था। लेकिन उनकी बेटी जो युवावस्था में थी, अब वह अपने हाथों से पैसा कमाने की कला नहीं सीख सकी। ऐसा इसलिए है कि उसके दामाद ने उसे फोन पर लगा दिया और वह रात-रात कुछ करकर सो सकती थी।
 
कंपनियां तो बस खुद को बढ़ावा देने में मस्ती लेती हैं, बाकी सब हमारी जिंदगी की जान लेती हैं 🤕। गिग वर्कर्स की बात सुनकर लगता है कि सरकार और कंपनियों को एक-दूसरे पर निर्भर रहने वाले लोगों की समस्याओं को हल करने की जिम्मेदारी देनी चाहिए। हमारे लिए यह तो सिर्फ काम ही नहीं है, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता भी है 💸

कंपनियां अपने हिसाब से दबाव बनाती हैं और वर्कर्स पर शनिवार-रविवार काम करने के लिए मजबूर करती हैं। इससे हमारा व्यक्तिगत जीवन पूरी तरह से बर्बाद हो रहा है 🕰️। और अगर कुछ गलत होता है, तो हमें AI से बात करनी पड़ती है! यह तो कोई मजाक नहीं है।
 
कंपनियां तो बस अपनी छाती बढ़ाने में फंस गई हैं। गिग वर्कर्स जैसे लोग इंसान हैं, न कि रोबोट। हमें मिलने-जुलने का समय भी नहीं मिलता। शनिवार-रविवार भी काम करना पड़ता है, बस क्यों? और ऑटो असाइंड बुकिंग तो सिर्फ हमारी गरिमा पर नज़र रखती है। 🤯

कंपनियां ज्यादातर में अपने लाभ के लिए ही काम करती हैं। अगर हमारा एक्सीडेंट होता है, तो हमें AI से बात करनी पड़ती है और कोई समाधान नहीं होता। यह बहुत भयानक है। हमें एक लाख रुपए का इंश्योरेंस मिलने से भी शर्तें रखनी पड़ती हैं कि हम शनिवार-रविवार 70-80 घंटे काम करें। कोई ऑर्डर कैंसिल नहीं होना चाहिए। यह बहुत ही अस्वीकार्य है। 😡
 
Wow! 🤯 गिग वर्कर्स की बात सुनकर मुझे बहुत खेद होता है 🙏, हमें तो लगता है कि वे लोग मुफ्त में जीत-हार जीत रहे हैं! 💸 इन्कलाब दूर करेंगे और उन्हें पैसों की बात सुननी चाहिए 🤑
 
कंपनियां तो खिलौने की दुकान जैसी दिखाई दे रही हैं 🤣, मेहनत का सिर्फ फायदा उठा रही हैं। गिग वर्कर्स की बातें सुनने पर लगता है कि सरकार को तुरंत काम करना होगा 🚨। कंपनियों को हमेशा से लाभ कमाने की दिशा में कदम उठाना चाहिए, लेकिन इंसानों की जिंदगी भी महत्वपूर्ण है 🤗। अगर कोई ऑर्डर तोड़ सकता है, तो सुरक्षित और स्वस्थ माहौल बनाए रखने के लिए कुछ भी नहीं करना चाहिए। कंपनियों को हमेशा अपने मेहनतियों की मदद करनी चाहिए, न कि उनका फायदा उठाना।
 
अरे, यह तो बहुत ही शरारती काम से भरपूर दुनिया बन गई है 🤯... गिग वर्कर्स की मांगें वास्तविक, लेकिन कंपनियों को समझने की जरूरत भी है। हमारे देश में काम का माहौल बहुत ही पुराना है, और अब तक शायद कोई ऐसी कंपनी नहीं आई है जो गिग वर्कर्स की सहायता करे।

मैं समझता हूँ कि कंपनियां अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए ऐसी शर्तें लगा रही हैं। लेकिन अगर हमारी सुरक्षा और दैनिक जीवन की जरूरतों को भी ध्यान में रखें, तो शायद हमें एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए।
 
कंपनियां तो जो बातें करती हैं वो सब दीवाली से पहले मौसम है। गिग वर्कर्स की बात बिल्कुल सही है, हमारे लिए न कोई मेहनताना और न काम करने का सुरक्षित माहौल। यार, मुझे लगता है कि सरकार से बात करने की बजाय कंपनियों से सीधे बात करनी चाहिए। क्योंकि अगर हमें एक लाख रुपए का इंश्योरेंस देने के लिए शर्तें रखनी हैं तो शायद हमारी जिंदगी में बदलाव आने वाला है। 🤯

मुझे लगता है कि गिग वर्कर्स को अपने अधिकारों के लिए लड़ने की जरूरत है। अगर कोई ऑटो असाइंड बुकिंग मिलती है तो उसे तय करना चाहिए कि हम उसके साथ जाना चाहते हैं या नहीं। और अगर शनिवार-रविवार को भी लगातार काम करने का दबाव बनाया जाता है तो इसके लिए कोई जवाबदेही तय करनी चाहिए। 🚫
 
बेटा, ये कैसा बिजनेस है! कंपनियां अपने मुनाफे पर ही ध्यान देती हैं न कि हमारी सेहत और जिंदगी। गिग वर्कर्स को इतनी मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन फिर भी उन्हें बेहतर माहौल नहीं मिलता। यह सोचकर मुझे बहुत दुःख होता है कि हमारे श्रमिकों की जिंदगी इतनी कठिन हो गई है। 🤕

अगर मेरे पिताजी के समय था, तो ऐसी स्थिति नहीं होती। हमें काम करना थोड़ा आसान था और श्रमिकों को अच्छा माहौल मिलता था। आजकल की यह गिग इकोनमी तो केवल रोबोट्स के लिए ही बनाई गई है। 🤖
 
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