राजस्थान- हजारों नेताओं के चुनाव लड़ने पर बैन का खतरा: पंचायत इलेक्शन नहीं लड़ सकेंगे, 3 साल तक के लिए लगेगी रोक, जानें- क्या है कारण - Rajasthan News

चुनाव आयोग ने प्रदेश में 4-5 हजार से ज्यादा चुनावी खर्च का ब्योरा नहीं देने वालों को रोकने की संभावना बढ़ गई है। इन लोगों को अगर चुनाव लड़ने पर मौका मिलता है तो 3 साल तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाई जा सकती है।

राज्य चुनाव आयोग ने हाल ही में खर्च सीमा बढ़ाने की अधिसूचना जारी की थी। नए नियमों के मुताबिक, पंचायती राज के चुनाव में सरपंच 1 लाख, पंचायत समिति सदस्य 1.5 लाख और जिला परिषद सदस्य 3 लाख ही खर्च कर पाएंगे।

चुनावी खर्च का ब्योरा देने से पहले नियमानुसार रिजल्ट घोषित होने के 15 दिनों के भीतर अपना खर्च विवरण आयोग को देना होता है। लेकिन पिछले पंचायत चुनाव में खर्च का ब्योरा नहीं देने वाले पंच-सरपंचों के दोबारा चुनाव लड़ने पर रोक लग सकती है।

राज्य सरकार ने ‘वन स्टेट वन इलेक्शन’ की तैयारी शुरू कर दी है। इसके लिए जयपुर-जोधपुर सहित प्रदेश के 12 जिलों में जिला परिषद और पंचायत समितियों के बोर्ड समय से पहले भंग भी कर सकती है।
 
अरे दोस्त, यह बहुत बड़ा मुद्दा है चुनावी खर्च का। क्या हमारे नेताओं को अपने खर्च का ब्योरा नहीं देने का मौका दिया जाता है, तो कैसे वह हमारे लिए अच्छे निर्णय ले सकेंगे। राज्य चुनाव आयोग ने खर्च सीमा बढ़ाने की तैयारी की है, लेकिन अगर कोई खर्च का ब्योरा नहीं देता है तो उसे 3 साल तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाई जा सकती है। यह बहुत बड़ा मुद्दा है और हमें इस पर बहुत सोच-समझकर काम करना चाहिए।
 
क्या वास्तव में चुनावी खर्च बढ़ाने से हर किसी को समानता नहीं मिल रही है? पिछले पंचायत चुनाव में कई पंच-सरपंचों ने खर्च का ब्योरा देने में विफल रहे थे, लेकिन अब उन्हें 3 साल तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाई जा सकती है। यह एक अच्छा संकेत है कि चुनाव आयोग ने खर्च को नियंत्रित करने की राह ठीक कर दी है।

राज्य सरकार की 'वन स्टेट वन इलेक्शन' योजना एक अच्छी बात है। इससे हमें सोचते समय और पार्टियों को अपने खर्चों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता होगी।
 
बड़े बड़े चुनाव हो रहे हैं और लोग खर्चों में फंसने लगे हैं। तो अब आयोग ने सोचा है कि अगर लोग खर्च बेचारे नहीं कर पाएंगे तो उन्हें 3 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक दी जाएगी। यह तो अच्छी बात है यार, लेकिन मुझे लगता है कि इससे आगे क्या होगा, जैसे ही राज्य सरकार ने ‘वन स्टेट वन इलेक्शन’ की तैयारी शुरू कर दी है, यह सब एक बड़ा खेल हो सकता है।
 
बात तो ये है कि चुनावी खर्च का ब्योरा देना एक मुश्किल है, लेकिन अगर लोग इसे तोड़ नहीं पाते तो रोकने की जरूरत है। पिछले पंचायत चुनाव में खर्च का ब्योरा नहीं देने वाले पंच-सरपंचों ने कैसे चुनाव लड़े? यह जानना भी दिलचस्प है।

लेकिन फिर भी, राज्य सरकार को ‘वन स्टेट वन इलेक्शन’ की तैयारी शुरू करने में धैर्य रखना चाहिए। इससे पहले, खुले चुनावों को बढ़ावा देने पर जोर देना चाहिए। और चुनावी खर्च का ब्योरा देने से पहले रिजल्ट घोषित होने के 15 दिनों के भीतर अपना खर्च विवरण आयोग को देना होता है, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि जो लोग इस बार चुनाव लड़ते हैं उन्हें पहले से ही पाबंदी लगाई जाए।

कुछ ऐसा भी होना चाहिए, जैसे कि चुनावी खर्च का ब्योरा देने के लिए एक विशेष खाता बनाने की जरूरत हो, और अगर कोई लोग इसे तोड़ते हैं तो उन्हें रोकने के लिए कुछ भी संभव है।
 
मेरे दोस्त, चुनावी खर्च की बात में तो हमेशा एक समस्या होती है 🤔। पिछले कई चुनावों में ऐसे लोग जो चुनाव लड़ते हैं उन्हें बहुत खर्च करना पड़ता है। अगर ये लोग खर्च का ब्योरा नहीं देते तो यह अच्छा नहीं है 🚫। अब आयोग ने ऐसी सख्त नियम बनाए हैं जिससे ऐसे लोगों पर रोक लग सकती है।

मेरी राय में अगर कोई व्यक्ति चुनाव लड़ने के लिए तैयार है तो उसे अपना खर्च बताने में कोई दिक्कत नहीं होनी जैसी चाहिए। हमारे देश में सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी बहुत जरूरी है, और ये नियम इसी लिए बनाए गए हैं 🙏
 
क्या यह सचमुच अच्छा है कि चुनाव आयोग ने खर्च की जांच में इतनी खुलपूरी हुई? पहले तो खर्च बढ़ाने से लोकतंत्र की कमजोरियों का फायदा होता है, लेकिन अब यह व्यवस्था इतनी भूलबूली हो गई है कि इसका और भी बुरा फायदा होने की संभावना है।

क्यों तो अगर चुनाव लड़ने वाले माफियाओं को 3 साल तक इस तरह से जिंदगी जीने दिए जाएंगे तो चुनावी खर्च की खुलपूरी और भी बढ़ जाएगी। फिर यह देश कैसा होगा?
 
मुझे लगता है कि चुनाव आयोग को वैसे खर्च का रिपोर्ट देने वाले लोगों को पाबंद करने में कुछ सुधार होना चाहिए। तभी ये नियमानुसार बहुत से छोटे खिलाफतें कम हो सकती हैं 🚫। राज्य सरकार का यह 'वन स्टेट वन इलेक्शन' प्रयास अच्छा लगता है, लेकिन समय पर इन सभी चीजों को एकसाथ चलाने में थोड़ी चुनौती बन सकती है 🤔
 
चुनावी खर्च का धांधला तो सबको पता है, लेकिन अगर सरकार सचमुच मौका देना चाहती है तो जरूरी है कि व्यक्तियों की नैतिकता पर ध्यान दिया जाए। अगर कोई व्यक्ति 3 साल तक चुनाव लड़ता है और अपने खर्च का ब्योरा नहीं देता, तो यही एक बड़ा सबक है - सच्चाई और जवाबदेही कितनी महत्वपूर्ण हैं!

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि सरकार हमेशा हमारे हित में नहीं होती, इसलिए हमें अपने नागरिक अधिकारों का सही ढंग से उपयोग करना होगा। चुनावी खर्च को लेकर होने वाली ऐसी रोक-टोक की ज़रूरत है ताकि सच्चाई और ईमानदारी को बढ़ावा मिले।

और अगर 'वन स्टेट वन इलेक्शन' वास्तव में स्वीकृति प्राप्त करता है, तो यह सिर्फ इसलिए नहीं होगा क्योंकि सरकार ने इसे अपनाया, बल्कि यह हमारी सामाजिक संरचना और राजनीतिक परिस्थितियों की ज़रूरत को भी पूरा करेगा।

हमें अपने देश को एक बेहतर दिशा में ले जाने के लिए हमेशा सोच-समझकर काम करना चाहिए।
 
मुझे लगता है कि ये अच्छा निर्णय है 🤔 चुनाव खर्च को नियंत्रित करना हमारे देश के लिए बहुत जरूरी है। याद आया कि मैंने जब भी चुनाव लड़ा था तब हमें अपना खर्च विवरण बताना था, और अगर हम गलती करें तो उनका जुर्माना नहीं दिया जाता था। लेकिन अब यह बदल गया है और खर्च के बारे में सख्त नियम बनाए गए हैं। इससे चुनाव में झूठे दावों को रोकने में मदद मिलेगी।
 
कोई भी नीति है तो उसके पीछे कुछ जरूरी कारण होते हैं... क्या यहां किसी और की गलती का मामला नहीं है? चुनावी खर्च की जांच से पहले उन लोगों को रोकने की संभावना बढ़ गई है जिन्हें 3 साल तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाई जा सकती है, मुझे लगता है कि यह अच्छा निर्णय है।

पिछले पंचायत चुनाव में खर्च का ब्योरा नहीं देने वालों को फिर से चुनाव लड़ने पर रोक लगाना उचित होगा। इससे आगे चलकर चुनावी खर्च की समस्या समाप्त हो सकती है।

कौन कहता है कि इन लोगों ने गलती की थी। सब कुछ साफ-सफाई के साथ होता है, यही सही है।
 
अरे, ये तो बहुत बड़ा मुद्दा है! चुनावी खर्च का खुला हाथ लेने वालों को रोकने के लिए आयोग ने संभावना बढ़ा दी है। अगर वे चुनाव लड़ने का मौका मिल जाता है, तो 3 साल तक बैन किया जा सकता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि पार्टियाँ और उम्मीदवार सच्चाई के साथ खेलें।

जयपुर-जोधपुर सहित 12 जिलों में बोर्ड भंग करने से यह दिखाने की कोशिश हो सकती है कि सरकार चुनावी खर्च पर नज़र रखती है। लेकिन, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पंचायती राज में स्थितियाँ अलग-अलग होती हैं, इसलिए सभी जिलों के लिए एक ही समाधान नहीं हो सकता।
 
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