रिलेशनशिप एडवाइज- मूवी-रेस्त्रां का बिल मैं ही भरता हूं: गर्लफ्रेंड भी कमाती है पर पैसे नहीं खर्च करती, ये बोझ मुझ पर ही क्यों?

सवाल- मैं एक साल से रिलेशनशिप में हूं। हम दोनों जॉब करते हैं। लेकिन जब भी हम बाहर मूवी देखने, डिनर करने या कहीं घूमने जाते हैं तो हर बार बिल मैं ही पे करता हूं। शुरू में मैंने माइंड नहीं किया, लेकिन अब धीरे-धीरे थोड़ा अजीब लगता है। ऐसा लगता है, जैसे ये एक एक्सपेक्टेशन बन गई है कि पैसे मैं ही दूंगा। उसने कभी बिल शेयर करने या पे करने की बात नहीं की। क्या यह रिश्ते में अनइक्वल इन्वेस्टमेंट है? या फिर मैं बेवजह ओवरथिंक कर रहा हूं? क्या मुझे उससे इस बारे में बात करनी चाहिए?

एक्सपर्ट: डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा

ये बिल्कुल नॉर्मल है। ये ओवरथिंकिंग नहीं है। आपकी इनर वॉइस सही है कि रिश्ते में बराबरी होनी चाहिए। लेकिन, आपके सवाल में पूरी बात क्लियर नहीं है।

आपने ये तो बताया कि आप दोनों जॉब करते हैं, लेकिन ये नहीं बताया कि क्या आप दोनों बराबर पैसे भी कमाते हैं? यह सवाल इसलिए जरूरी है, क्योंकि अगर कोई 1 लाख रुपए कमा रहा है और दूसरे की सैलरी सिर्फ 20 हजार रुपए है तो खर्च में बराबरी की उम्मीद वाजिब नहीं है।

अगर दोनों बराबर पैसे कमा रहे हैं तो सबसे पहले इस स्थिति को बिना जज किए समझना जरूरी है। आप एक साल से रिश्ते में हैं। दोनों जॉब करते हैं। पार्टनर केयरिंग है। यानी रिश्ता असुरक्षित या एकतरफा नहीं दिखता है। परेशानी सिर्फ बिल की नहीं है, परेशानी उस एक्सपेक्टेशन की है, जो धीरे-धीरे बनती जा रही है कि बाहर जाएंगे तो पैसे आप ही देंगे। यही भावना अगर समय रहते समझी और बोली न जाए, तो आगे चलकर यह गुस्सा, चुप्पी या पावर इम्बैलेंस में बदल सकती है।

पैसे का सवाल आज का नहीं है। सदियों से पैसे की अथॉरिटी पुरुषों के हाथ में रही है। जमीन, व्यापार, कमाई, विरासत, इन सब पर ऐतिहासिक रूप से पुरुषों का कंट्रोल रहा है। आज भी ग्लोबल लेवल पर देखें तो दुनिया की 90 प्रतिशत से ज्यादा संपत्ति पुरुषों के पास है। इसका मतलब यह नहीं कि महिलाएं काबिल नहीं हैं, बल्कि यह बताता है कि सिस्टम ने उन्हें आर्थिक फैसलों से दूर रखा।

इसका मनोवैज्ञानिक असर आज भी रिश्तों में दिखता है। कई महिलाएं अनजाने में यह महसूस ही नहीं करतीं कि बाहर जाकर बिल देना भी एक तरह की अथॉरिटी है। उनके दिमाग में यह कोडेड रहता है कि बिल तो लड़का देगा, जैसे यह कोई नेचुरल ऑर्डर हो। कई बार वे इसलिए भी आगे नहीं बढ़तीं क्योंकि उन्हें सिखाया गया है कि पैसे पर अधिकार जताना अच्छी लड़की होने की निशानी नहीं।

कई बार कमाने के बावजूद पैसे को लेकर लड़कियों के मन में इनसिक्योरिटी भी ज्यादा होती है। यह भी सदियों की जेनेटिक कंडीशनिंग का ही हिस्सा है, क्योंकि वो आर्थिक रूप से हमेशा परनिर्भर और असुरक्षित रहीं।

पुरुषों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि कमाना और खर्च करना उनकी जिम्मेदारी है। फिल्में, कहानियां, समाज, हर जगह यही मैसेज मिलता है कि लड़की को इम्प्रेस करने के लिए पैसे खर्च करना जरूरी है। डिनर, गिफ्ट्स, ट्रिप, ये सब मर्दानगी का सबूत बना दिए जाते हैं।

समस्या तब होती है, जब यह रोल बिना सवाल किए रिश्ते में चला आता है।

पैसे को लेकर पुरुष और महिला का मनोविज्ञान अलग क्यों?

पैसे का सवाल आज का नहीं है। सदियों से पैसे की अथॉरिटी पुरुषों के हाथ में रही है। जमीन, व्यापार, कमाई, विरासत, इन सब पर ऐतिहासिक रूप से पुरुषों का कंट्रोल रहा है। आज भी ग्लोबल लेवल पर देखें तो दुनिया की 90 प्रतिशत से ज्यादा संपत्ति पुरुषों के पास है। इसका मतलब यह नहीं कि महिलाएं काबिल नहीं हैं, बल्कि यह बताता है कि सिस्टम ने उन्हें आर्थिक फैसलों से दूर रखा।

इसका मनोवैज्ञानिक असर आज भी रिश्तों में दिखता है। कई महिलाएं अनजाने में यह महसूस ही नहीं करतीं कि बाहर जाकर बिल देना भी एक तरह की अथॉरिटी है। उनके दिमाग में यह कोडेड रहता है कि बिल तो लड़का देगा, जैसे यह कोई नेचुरल ऑर्डर हो। कई बार वे इसलिए भी आगे नहीं बढ़तीं क्योंकि उन्हें सिखाया गया है कि पैसे पर अधिकार जताना अच्छी लड़की होने की निशानी नहीं।

कई बार कमाने के बावजूद पैसे को लेकर लड़कियों के मन में इनसिक्योरिटी भी ज्यादा होती है। यह भी सदियों की जेनेटिक कंडीशनिंग का ही हिस्सा है, क्योंकि वो आर्थिक रूप से हमेशा परनिर्भर और असुरक्षित रहीं।

पुरुषों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि कमाना और खर्च करना उनकी जिम्मेदारी है। फिल्में, कहानियां, समाज, हर जगह यही मैसेज मिलता है कि लड़की को इम्प्रेस करने के लिए पैसे खर्च करना जरूरी है। डिनर, गिफ्ट्स, ट्रिप, ये सब मर्दानगी का सबूत बना दिए जाते हैं।

समस्या तब होती है, जब यह रोल बिना सवाल किए रिश्ते में चला आता है।

पैसे को लेकर पुरुष और महिला का मनोविज्ञान अलग क्यों?

पैसे का सवाल आज का नहीं है। सदियों से पैसे की अथॉरिटी पुरुषों के हाथ में रही है। जमीन, व्यापार, कमाई, विरासत, इन सब पर ऐतिहासिक रूप से पुरुषों का कंट्रोल रहा है। आज भी ग्लोबल लेवल पर देखें तो दुनिया की 90 प्रतिशत से ज्यादा संपत्ति पुरुषों के पास है। इसका मतलब यह नहीं कि महिलाएं काबिल नहीं हैं, बल्कि यह बताता है कि सिस्टम ने उन्हें आर्थिक फैसलों से दूर रखा।

इसका मनोवैज्ञानिक असर आज भी रिश्तों में दिखता है। कई महिलाएं अनजाने में यह महसूस ही नहीं करतीं कि बाहर जाकर बिल देना भी एक तरह की अथॉरिटी है। उनके दिमाग में यह कोडेड रहता है कि बिल तो लड़का देगा, जैसे यह कोई नेचुरल ऑर्डर हो। कई बार वे इसलिए भी आगे नहीं बढ़तीं क्योंकि उन्हें सिखाया गया है कि पैसे पर अधिकार जताना अच्छी लड़की होने की निशानी नहीं।

कई बार कमाने के बावजूद पैसे को लेकर लड़कियों के मन में इनसिक्योरिटी भी ज्यादा होती है। यह भी सदियों की जेनेटिक कंडीशनिंग का ही हिस्सा है, क्योंकि वो आर्थिक रूप से हमेशा परनिर्भर और असुरक्षित रहीं।

पुरुषों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि कमाना और खर्च करना उनकी जिम्मेदारी है। फिल्में, कहानियां, समाज, हर जगह यही मैसेज मिलता है कि लड़की को इम्प्रेस करने के लिए पैसे खर्च करना जरूरी है। डिनर, गिफ्ट्स, ट्रिप, ये सब मर्दानगी का सबूत बना दिए जाते हैं।

समस्या तब होती है, जब यह रोल बिना सवाल किए रिश्ते में चला आता है।

पैसे को लेकर पुरुष और महिला का मनोविज्ञान अलग क्यों?

पैसे का सवाल आज का नहीं है। सदियों से पैसे की अथॉरिटी पुरुषों के हाथ में रही है। जमीन, व्यापार, कमाई, विरासत, इन सब पर ऐतिहासिक रूप से पुरुषों का कंट्रोल रहा है। आज भी ग्लोबल लेवल पर देखें तो दुनिया की 90 प्रतिशत से ज्यादा संपत्ति पुरुषों के पास है। इसका मतलब यह नहीं कि महिलाएं काबिल नहीं हैं, बल्कि यह बताता है कि सिस्टम ने उन्हें आर्थिक फैसलों से दूर रखा।

इसका मनोवैज्ञानिक असर आज भी रिश्तों में दिखता है। कई महिलाएं अनजाने में यह महसूस ही नहीं करतीं कि बाहर जाकर बिल देना भी एक तरह की अथॉरिटी है। उनके दिमाग में यह कोडेड रहता है कि बिल तो लड़का देगा, जैसे यह कोई नेचुरल ऑर्डर हो। कई बार वे इसलिए भी आगे नहीं बढ़तीं क्योंकि उन्हें सिखाया गया है कि पैसे पर अधिकार जताना अच्छी लड़की होने की निशानी नहीं।

कई बार कमाने के बावजूद पैसे को लेकर लड़कियों के मन में इनसिक्योरिटी भी ज्यादा होती है। यह भी सदियों की जेनेटिक
 
मेरी राय में, यह सवाल बहुत गहरा है। जब हम बाहर जाते हैं और मिलकर खर्च करते हैं, तो यह अच्छा लगता है कि दोनों साथ में बराबर पैसे देते हैं। लेकिन आजकल की सामाजिक परिस्थितियों में, यह बात थोड़ी जटिल हो गई है। जब हमारी सैलरी अलग-अलग होती है, तो खर्च करने का सवाल और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

मेरी समझ में, जब लड़कियां अपने साथी के पैसों का बिल देती हैं, तो यह एक तरह की अनिश्चितता की भावना उत्पन्न करता है। यह महसूस कर सकती है कि वो अपने साथी से कम मात्रा में खर्च करने वाला है, और इस बारे में अजीब महसूस कर सकती है।

लेकिन, जब हम दोनों जॉब करते हैं और बराबर पैसे कमाते हैं, तो खर्च करने का सवाल थोड़ा आसान हो जाता है। यह भावना नहीं आती कि मैं अपने साथी से कम पैसे देने वाला हूँ।

इसलिए, जब हमारी सैलरी अलग-अलग होती है, तो खर्च करने का सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। मेरी राय में, यह समय है कि हम दोनों एक-दूसरे के साथ शेयर करें और अपने खर्च को साझा करें। इससे हमारी रिश्तों में बराबरी और समानता की भावना उत्पन्न हो सकती है।
 
अरे, मुझे लगता है कि यह सवाल बिल्कुल स्वीकार करने योग्य है, लेकिन हमें समझने की जरूरत है कि यह एक विशिष्ट परिस्थिति को देखने की बात है। अगर आप और आपका साथी समान रूप से नौकरी करते हैं तो बिल में बराबरी करने की उम्मीद कोई गलत नहीं है 🤑। लेकिन, हमें यह भी समझना चाहिए कि पैसे की अनुपालन एक बड़ी जिम्मेदारी है, और इसमें सामंजस्य होना जरूरी है।
 
मुझे लगता है कि रिश्ते में आर्थिक संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी है, लेकिन जब तक हम अपनी अनूठी और बदलने वाली परिस्थितियों को समझते नहीं हैं, तब तक यह समस्या बनी रहती है। अगर दोनों पार्टनर बराबर में पैसे कमाते हैं तो हमें उन्हें साझा करने के बारे में बातचीत करनी चाहिए। जैसे बाहर जाने के लिए बिल शेयर करना।
 
तुमने बहुत सही कहा डॉ. जया सुकुल जी की! पैसे का सवाल आज का नहीं है, सदियों से पैसे की अथॉरिटी पुरुषों के हाथ में रही है। यह बहुत जरूरी है कि हम महिलाओं को आर्थिक फैसलों पर अधिकार देने की कोशिश करें।

मुझे लगता है, अगर दोनों बराबर पैसे कमाते हैं तो सबसे पहले इस स्थिति को बिना जज किए समझना जरूरी है। और अगर महिलाएं अपने मन में इनसिक्योरिटी भी ज्यादा होती है तो यह सदियों की जेनेटिक कंडीशनिंग का ही हिस्सा है।

तुम्हारी बात से मुझे खुशी हुई! 🎉💖
 
मुझे लगता है कि यह सवाल बहुत ही सामान्य और वास्तविकता को समझने में हमारे लिए बड़ा चुनौतीपूर्ण है। जब दोनों साथी एक साल से रिलेशनशिप में हैं और आप बाहर जाते समय बिल का भुगतान करने में लगातार आप ही पेश करते हैं, तो यह एक समस्या है लेकिन इसका समाधान सरल नहीं है।

मेरी राय में, जब हम बाहर जाते हैं और खुद को इम्प्रेस करने की कोशिश करते हैं, तो पैसे खर्च करना हमारी मर्दानगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा लगता है। लेकिन जब यह रिश्ते में लगातार आप ही पैसे देते हैं, तो यह एक असमानता बन जाती है और आपके साथी की भावनाएं आ सकती हैं।

अब, सवाल यह उठता है कि क्या यह असमानता रिश्ते में अनइक्वल इन्वेस्टमेंट की समस्या है? मेरी opinion में, यह एक बड़ी समस्या नहीं हो सकती है, लेकिन इसका समाधान साथी के साथ बातचीत करना और समझना जरूरी है। आपको अपने साथी से सवाल पूछने चाहिए, "क्या आप भी इस तरह महसूस करते हैं?" या "क्या हमारे रिश्ते में बराबरी की उम्मीद करना सही है?"

आपको यह समझना भी जरूरी है कि पैसे की समस्या सिर्फ एक वित्तीय समस्या नहीं है, बल्कि यह रिश्ते में एक मनोवैज्ञानिक समस्या भी है। पुरुषों और महिलाओं के बीच पैसे को लेकर दृष्टिकोण अलग होता है और इसे समझने के लिए समय और संवाद जरूरी है।

अंत में, यह सवाल आपको अपने रिश्ते की गहराई तक जाने का अवसर देता है और आप दोनों को एक साथ बैठकर इस समस्या का समाधान निकालने का मौका देता है।
 
🤔 अगर तुम्हारी साथी तुम्हें बिल देने को मजबूर कर रही है तो शायद उसकी अपनी चिंताएं भी होंगी। यह सवाल ना तो तुम्हारे लिए नहीं है। तुम्हें पूछना चाहिए कि क्या दोनों बराबर पैसे कमाते हैं? अगर नहीं, तो फिर इस स्थिति को समझने और बिना जज किए बात करनी चाहिए।
 
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