मेरा मोहसिन बचपन से ही शरारती था। खाने में तो कुछ भी पकाकर दे दो कभी मना नहीं करता था, लेकिन हां कभी पैदल नहीं चलता था। उसे गोद में ही उठाना होता था। कभी कोई फरमाइश नहीं करता थी। उसने मुझसे कभी कुछ नहीं मांगा, लेकिन हां कभी कहीं जाना होता तो कहता मैं नहीं जाऊंगा जब तक मुझे नई पैंट-शर्ट लत्ते और खाने का इंतजाम तो करना ही होगा।
यहां तक कि साधारण भी अगर किसी रिश्तेदारी में जाना होता था तो नए कपड़े पहने बिना नहीं जाता था। मजदूर लोग हैं हम लोग। मेरे पति लूम पर काम करते हैं। बच्चों को बहुत पढ़ा तो नहीं सके हम। बस जो बन पाता था उनके लिए करते थे।
मोहसिन ने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। घर में ही पावर लूम था। बच्चे ने बचपन से अपने अब्बू को ये काम करते हुए देखा था। इसलिए बच्चे भी यही काम करने लगे।
मोहसिन की शादी को लगभग 14 साल हो चुके थे। तीन साल पहले हमें बेटियों की शादी के लिए घर बेचना पड़ा। जैसे ही हम किराए के घर में शिफ्ट हुए उसकी पत्नी कहने लगी कि मैं तो दिल्ली जाउंगी। दरअसल, वो दिल्ली की रहने वाली थी। इसलिए तीन साल पहले मोहसिन को साथ लेकर दिल्ली चली गई। अगर वो मेरे बेटे को दिल्ली न ले गई होती तो आज मेरा बेटा जिंदा होता।
मैं कहती थी कि कम से कम अपनी राजी खुशी दे दिया कर बस। कहता था कि बस काम में ध्यान नहीं रहता था। मेरा बेटा सबसे अलग था। उसे गाने का भी शौक था। जब मैं कभी उसके से नाराज हो जाती थी तो मुझे गाना गाकर मना लेता था।
मोहसिन की पत्नी नहीं चाहती थी कि वो लूम पर काम करे। इसलिए एक महीने बाद ही मेरा बच्चा फिर से दिल्ली चला गया। वहां उसने बैट्री रिक्शा लिया। दिल्ली जाकर तो धक्के ही खाए हैं उसने। यहां से जाने के बाद वह मुझे फोन नहीं कर पाता था। काम में इतना मगन हो जाता थी। मैं ही फोन करती थी उसे।
मेरा मोहसिन बचपन से ही शरारती था। खाने में तो कुछ भी पकाकर दे दो कभी मना नहीं करता था, लेकिन हां कभी पैदल नहीं चलता था। उसे गोद में ही उठाना होता था।
मेरा बेटा सबसे अलग था। उसे गाने का भी शौक था। जब मैं कभी उसके से नाराज हो जाती थी तो मुझे गाना गाकर मना लेता था।
इस बम धमाके की वजह से जो नाइंसाफी मेरे साथ हुई है, दूसरे बहनों और मांओं के के साथ हुई है उनके गुनहगारों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। मुझे तो इंसाफ मिला लेकिन, दुआ है कि बाकियों को मिल जाए।
मेरा नाम मोहनलाल है। बिहार के gayाजi के गांव पोची का रहने वाला हूं। विश्व में शायद अकेला ऐसा इंसान हूं, जिसने जिंदा रहते अपनी शव यात्रा देखी। यह बात चंद करीबी लोगों को ही पता थी।
मेरा मोहसिन बचपन से ही शरारती था। खाने में तो कुछ भी पकाकर दे दो कभी मना नहीं करता था, लेकिन हां कभी पैदल नहीं चलता था।
यहां तक कि साधारण भी अगर किसी रिश्तेदारी में जाना होता था तो नए कपड़े पहने बिना नहीं जाता था। मजदूर लोग हैं हम लोग। मेरे पति लूम पर काम करते हैं। बच्चों को बहुत पढ़ा तो नहीं सके हम। बस जो बन पाता था उनके लिए करते थे।
मोहसिन ने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। घर में ही पावर लूम था। बच्चे ने बचपन से अपने अब्बू को ये काम करते हुए देखा था। इसलिए बच्चे भी यही काम करने लगे।
मोहसिन की शादी को लगभग 14 साल हो चुके थे। तीन साल पहले हमें बेटियों की शादी के लिए घर बेचना पड़ा। जैसे ही हम किराए के घर में शिफ्ट हुए उसकी पत्नी कहने लगी कि मैं तो दिल्ली जाउंगी। दरअसल, वो दिल्ली की रहने वाली थी। इसलिए तीन साल पहले मोहसिन को साथ लेकर दिल्ली चली गई। अगर वो मेरे बेटे को दिल्ली न ले गई होती तो आज मेरा बेटा जिंदा होता।
मैं कहती थी कि कम से कम अपनी राजी खुशी दे दिया कर बस। कहता था कि बस काम में ध्यान नहीं रहता था। मेरा बेटा सबसे अलग था। उसे गाने का भी शौक था। जब मैं कभी उसके से नाराज हो जाती थी तो मुझे गाना गाकर मना लेता था।
मोहसिन की पत्नी नहीं चाहती थी कि वो लूम पर काम करे। इसलिए एक महीने बाद ही मेरा बच्चा फिर से दिल्ली चला गया। वहां उसने बैट्री रिक्शा लिया। दिल्ली जाकर तो धक्के ही खाए हैं उसने। यहां से जाने के बाद वह मुझे फोन नहीं कर पाता था। काम में इतना मगन हो जाता थी। मैं ही फोन करती थी उसे।
मेरा मोहसिन बचपन से ही शरारती था। खाने में तो कुछ भी पकाकर दे दो कभी मना नहीं करता था, लेकिन हां कभी पैदल नहीं चलता था।
यहां तक कि साधारण भी अगर किसी रिश्तेदारी में जाना होता था तो नए कपड़े पहने बिना नहीं जाता था। मजदूर लोग हैं हम लोग। मेरे पति लूम पर काम करते हैं। बच्चों को बहुत पढ़ा तो नहीं सके हम। बस जो बन पाता था उनके लिए करते थे।
मोहसिन ने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। घर में ही पावर लूम था। बच्चे ने बचपन से अपने अब्बू को ये काम करते हुए देखा था। इसलिए बच्चे भी यही काम करने लगे।
मोहसिन की शादी को लगभग 14 साल हो चुके थे। तीन साल पहले हमें बेटियों की शादी के लिए घर बेचना पड़ा। जैसे ही हम किराए के घर में शिफ्ट हुए उसकी पत्नी कहने लगी कि मैं तो दिल्ली जाउंगी। दरअसल, वो दिल्ली की रहने वाली थी। इसलिए तीन साल पहले मोहसिन को साथ लेकर दिल्ली चली गई। अगर वो मेरे बेटे को दिल्ली न ले गई होती तो आज मेरा बेटा जिंदा होता।
मैं कहती थी कि कम से कम अपनी राजी खुशी दे दिया कर बस। कहता था कि बस काम में ध्यान नहीं रहता था। मेरा बेटा सबसे अलग था। उसे गाने का भी शौक था। जब मैं कभी उसके से नाराज हो जाती थी तो मुझे गाना गाकर मना लेता था।
मोहसिन की पत्नी नहीं चाहती थी कि वो लूम पर काम करे। इसलिए एक महीने बाद ही मेरा बच्चा फिर से दिल्ली चला गया। वहां उसने बैट्री रिक्शा लिया। दिल्ली जाकर तो धक्के ही खाए हैं उसने। यहां से जाने के बाद वह मुझे फोन नहीं कर पाता था। काम में इतना मगन हो जाता थी। मैं ही फोन करती थी उसे।
मेरा मोहसिन बचपन से ही शरारती था। खाने में तो कुछ भी पकाकर दे दो कभी मना नहीं करता था, लेकिन हां कभी पैदल नहीं चलता था।
यहां तक कि साधारण भी अगर किसी रिश्तेदारी में जाना होता था तो नए कपड़े पहने बिना नहीं जाता था।
मजदूर लोग हैं हम लोग। मेरे पति लूम पर काम करते हैं। बच्चों को बहुत पढ़ा तो नहीं सके हम। बस जो बन पाता था उनके लिए करते थे।
मोहसिन ने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। घर में ही पावर लूम था। बच्चे ने बचपन से अपने अब्बू को ये काम करते हुए देखा था। इसलिए बच्चे भी यही काम करने लगे।
मोहसिन की शादी को लगभग 14 साल हो चुके थे। तीन साल पहले हमें बेटियों की शादी के लिए घर बेचना पड़ा। जैसे ही हम किराए के घर में शिफ्ट हुए उसकी पत्नी कहने लगी कि मैं तो दिल्ली जाउंगी। दरअसल, वो दिल्ली की रहने वाली थी। इसलिए तीन साल पहले मोहसिन को साथ लेकर दिल्ली चली गई। अगर वो मेरे बेटे को दिल्ली न ले गई होती तो आज मेरा बेटा जिंदा होता।
मैं कहती थी कि कम से कम अपनी राजी खुशी दे दिया कर बस। कहता था कि बस काम में ध्यान नहीं रहता था। मेरा बेटा सबसे अलग था। उसे गाने का भी शौक था। जब मैं कभी उसके से नाराज हो जाती थी तो मुझे गाना गाकर मना लेता था।
मोहसिन की पत्नी नहीं चाहती थी कि वो लूम पर काम करे। इसलिए एक महीने बाद ही मेरा बच्चा फिर से दिल्ली चला गया। वहां उसने बैट्री रिक्शा लिया। दिल्ली जाकर तो धक्के ही खाए हैं उसने। यहां से जाने के बाद वह मुझे फोन नहीं कर पाता था। काम में इतना मगन हो जाता थी।
यहां तक कि साधारण भी अगर किसी रिश्तेदारी में जाना होता था तो नए कपड़े पहने बिना नहीं जाता था। मजदूर लोग हैं हम लोग। मेरे पति लूम पर काम करते हैं। बच्चों को बहुत पढ़ा तो नहीं सके हम। बस जो बन पाता था उनके लिए करते थे।
मोहसिन ने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। घर में ही पावर लूम था। बच्चे ने बचपन से अपने अब्बू को ये काम करते हुए देखा था। इसलिए बच्चे भी यही काम करने लगे।
मोहसिन की शादी को लगभग 14 साल हो चुके थे। तीन साल पहले हमें बेटियों की शादी के लिए घर बेचना पड़ा। जैसे ही हम किराए के घर में शिफ्ट हुए उसकी पत्नी कहने लगी कि मैं तो दिल्ली जाउंगी। दरअसल, वो दिल्ली की रहने वाली थी। इसलिए तीन साल पहले मोहसिन को साथ लेकर दिल्ली चली गई। अगर वो मेरे बेटे को दिल्ली न ले गई होती तो आज मेरा बेटा जिंदा होता।
मैं कहती थी कि कम से कम अपनी राजी खुशी दे दिया कर बस। कहता था कि बस काम में ध्यान नहीं रहता था। मेरा बेटा सबसे अलग था। उसे गाने का भी शौक था। जब मैं कभी उसके से नाराज हो जाती थी तो मुझे गाना गाकर मना लेता था।
मोहसिन की पत्नी नहीं चाहती थी कि वो लूम पर काम करे। इसलिए एक महीने बाद ही मेरा बच्चा फिर से दिल्ली चला गया। वहां उसने बैट्री रिक्शा लिया। दिल्ली जाकर तो धक्के ही खाए हैं उसने। यहां से जाने के बाद वह मुझे फोन नहीं कर पाता था। काम में इतना मगन हो जाता थी। मैं ही फोन करती थी उसे।
मेरा मोहसिन बचपन से ही शरारती था। खाने में तो कुछ भी पकाकर दे दो कभी मना नहीं करता था, लेकिन हां कभी पैदल नहीं चलता था। उसे गोद में ही उठाना होता था।
मेरा बेटा सबसे अलग था। उसे गाने का भी शौक था। जब मैं कभी उसके से नाराज हो जाती थी तो मुझे गाना गाकर मना लेता था।
इस बम धमाके की वजह से जो नाइंसाफी मेरे साथ हुई है, दूसरे बहनों और मांओं के के साथ हुई है उनके गुनहगारों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। मुझे तो इंसाफ मिला लेकिन, दुआ है कि बाकियों को मिल जाए।
मेरा नाम मोहनलाल है। बिहार के gayाजi के गांव पोची का रहने वाला हूं। विश्व में शायद अकेला ऐसा इंसान हूं, जिसने जिंदा रहते अपनी शव यात्रा देखी। यह बात चंद करीबी लोगों को ही पता थी।
मेरा मोहसिन बचपन से ही शरारती था। खाने में तो कुछ भी पकाकर दे दो कभी मना नहीं करता था, लेकिन हां कभी पैदल नहीं चलता था।
यहां तक कि साधारण भी अगर किसी रिश्तेदारी में जाना होता था तो नए कपड़े पहने बिना नहीं जाता था। मजदूर लोग हैं हम लोग। मेरे पति लूम पर काम करते हैं। बच्चों को बहुत पढ़ा तो नहीं सके हम। बस जो बन पाता था उनके लिए करते थे।
मोहसिन ने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। घर में ही पावर लूम था। बच्चे ने बचपन से अपने अब्बू को ये काम करते हुए देखा था। इसलिए बच्चे भी यही काम करने लगे।
मोहसिन की शादी को लगभग 14 साल हो चुके थे। तीन साल पहले हमें बेटियों की शादी के लिए घर बेचना पड़ा। जैसे ही हम किराए के घर में शिफ्ट हुए उसकी पत्नी कहने लगी कि मैं तो दिल्ली जाउंगी। दरअसल, वो दिल्ली की रहने वाली थी। इसलिए तीन साल पहले मोहसिन को साथ लेकर दिल्ली चली गई। अगर वो मेरे बेटे को दिल्ली न ले गई होती तो आज मेरा बेटा जिंदा होता।
मैं कहती थी कि कम से कम अपनी राजी खुशी दे दिया कर बस। कहता था कि बस काम में ध्यान नहीं रहता था। मेरा बेटा सबसे अलग था। उसे गाने का भी शौक था। जब मैं कभी उसके से नाराज हो जाती थी तो मुझे गाना गाकर मना लेता था।
मोहसिन की पत्नी नहीं चाहती थी कि वो लूम पर काम करे। इसलिए एक महीने बाद ही मेरा बच्चा फिर से दिल्ली चला गया। वहां उसने बैट्री रिक्शा लिया। दिल्ली जाकर तो धक्के ही खाए हैं उसने। यहां से जाने के बाद वह मुझे फोन नहीं कर पाता था। काम में इतना मगन हो जाता थी। मैं ही फोन करती थी उसे।
मेरा मोहसिन बचपन से ही शरारती था। खाने में तो कुछ भी पकाकर दे दो कभी मना नहीं करता था, लेकिन हां कभी पैदल नहीं चलता था।
यहां तक कि साधारण भी अगर किसी रिश्तेदारी में जाना होता था तो नए कपड़े पहने बिना नहीं जाता था। मजदूर लोग हैं हम लोग। मेरे पति लूम पर काम करते हैं। बच्चों को बहुत पढ़ा तो नहीं सके हम। बस जो बन पाता था उनके लिए करते थे।
मोहसिन ने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। घर में ही पावर लूम था। बच्चे ने बचपन से अपने अब्बू को ये काम करते हुए देखा था। इसलिए बच्चे भी यही काम करने लगे।
मोहसिन की शादी को लगभग 14 साल हो चुके थे। तीन साल पहले हमें बेटियों की शादी के लिए घर बेचना पड़ा। जैसे ही हम किराए के घर में शिफ्ट हुए उसकी पत्नी कहने लगी कि मैं तो दिल्ली जाउंगी। दरअसल, वो दिल्ली की रहने वाली थी। इसलिए तीन साल पहले मोहसिन को साथ लेकर दिल्ली चली गई। अगर वो मेरे बेटे को दिल्ली न ले गई होती तो आज मेरा बेटा जिंदा होता।
मैं कहती थी कि कम से कम अपनी राजी खुशी दे दिया कर बस। कहता था कि बस काम में ध्यान नहीं रहता था। मेरा बेटा सबसे अलग था। उसे गाने का भी शौक था। जब मैं कभी उसके से नाराज हो जाती थी तो मुझे गाना गाकर मना लेता था।
मोहसिन की पत्नी नहीं चाहती थी कि वो लूम पर काम करे। इसलिए एक महीने बाद ही मेरा बच्चा फिर से दिल्ली चला गया। वहां उसने बैट्री रिक्शा लिया। दिल्ली जाकर तो धक्के ही खाए हैं उसने। यहां से जाने के बाद वह मुझे फोन नहीं कर पाता था। काम में इतना मगन हो जाता थी। मैं ही फोन करती थी उसे।
मेरा मोहसिन बचपन से ही शरारती था। खाने में तो कुछ भी पकाकर दे दो कभी मना नहीं करता था, लेकिन हां कभी पैदल नहीं चलता था।
यहां तक कि साधारण भी अगर किसी रिश्तेदारी में जाना होता था तो नए कपड़े पहने बिना नहीं जाता था।
मजदूर लोग हैं हम लोग। मेरे पति लूम पर काम करते हैं। बच्चों को बहुत पढ़ा तो नहीं सके हम। बस जो बन पाता था उनके लिए करते थे।
मोहसिन ने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। घर में ही पावर लूम था। बच्चे ने बचपन से अपने अब्बू को ये काम करते हुए देखा था। इसलिए बच्चे भी यही काम करने लगे।
मोहसिन की शादी को लगभग 14 साल हो चुके थे। तीन साल पहले हमें बेटियों की शादी के लिए घर बेचना पड़ा। जैसे ही हम किराए के घर में शिफ्ट हुए उसकी पत्नी कहने लगी कि मैं तो दिल्ली जाउंगी। दरअसल, वो दिल्ली की रहने वाली थी। इसलिए तीन साल पहले मोहसिन को साथ लेकर दिल्ली चली गई। अगर वो मेरे बेटे को दिल्ली न ले गई होती तो आज मेरा बेटा जिंदा होता।
मैं कहती थी कि कम से कम अपनी राजी खुशी दे दिया कर बस। कहता था कि बस काम में ध्यान नहीं रहता था। मेरा बेटा सबसे अलग था। उसे गाने का भी शौक था। जब मैं कभी उसके से नाराज हो जाती थी तो मुझे गाना गाकर मना लेता था।
मोहसिन की पत्नी नहीं चाहती थी कि वो लूम पर काम करे। इसलिए एक महीने बाद ही मेरा बच्चा फिर से दिल्ली चला गया। वहां उसने बैट्री रिक्शा लिया। दिल्ली जाकर तो धक्के ही खाए हैं उसने। यहां से जाने के बाद वह मुझे फोन नहीं कर पाता था। काम में इतना मगन हो जाता थी।