संडे जज्बात-रिश्तेदार की लाश लेकर आया, मेरे गाल छूने लगा: लाशें जलाने के कारण शादी नहीं हुई- पति के बिना जी लूंगी, लाशों के बिना नहीं

मैंने अपने पिता की चिता बुझी भी नहीं थी, जब जीवन ने मेरे सामने एक और आग रख दी। श्मशान में डोम का खाली पड़ा काम। 2014 था वह साल, जब घर में रोटी के लिए भी जद्दोजहद थी। श्मशान की देखभाल करने वाले लोग हमारी हालत जानते थे। उन्होंने एक दिन कहा- 'टुम्पा, यह काम संभाल ले… वर्ना घर कैसे चलेगा?'

उनकी बात सुनकर मेरे अंदर कुछ टूट भी गया और कुछ जाग भी उठा। मैंने बिना सोचे 'हां' कह दिया। तब नहीं जानती थी कि यह 'हां' मेरे खिलाफ पूरे गांव की दीवार बना देगी।

लोगों ने मुझे ताने मारे, आंखें तरेरीं, बातें उड़ाई- 'लड़की होकर डोम का काम करेगी? श्मशान का काम करेगी?' मैं खुद से पूछती- अगर लड़के ये काम कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं? आखिर सोचिए जरा, मौत की राख में औरत-मर्द का फर्क बचता ही कहां है?

मैंने तय कर लिया कि लाश जलाऊंगी। जब मां को बताया, तो वह डर गईं। कहने लगीं- 'लोग तुझे इस काम के लिए कभी स्वीकार नहीं करेंगे। तू भारी लकड़ियां भला कैसे उठाएगी? चिता कैसे सजा पाएगी?' उनका डर जायज था, लेकिन मेरी मजबूरी उससे भी बड़ी।

मैंने मां का हाथ पकड़ा और कहा- 'एक बार यह काम करने दो, मां… हमारे पास जिंदा रहने का कोई और रास्ता नहीं है।'

दरअसल, उस वक्त बतौर नर्स मुझे सिर्फ 4,000 रुपए मिलते थे। उसमें से आधा रास्ते में खत्म हो जाता था। मैंने कसम खा ली- डोम का काम नहीं छोड़ूंगी। चाहे शादी हो या न हो। आखिर, यही वह काम था, जिसने मुझे और मेरे परिवार को संभाला, बुरे वक्त में सहारा दिया।
 
मैंने भी ऐसा ही महसूस किया है जब मेरे पिताजी ने मेरी शादी की तय करने वाली उम्र सुनाई थी। मुझे समझ नहीं आया कि दूसरों को तभी पता चलेगा कि मैं क्या कर सकती हूँ, जब मैं अपनी जिम्मेदारियों को संभालने के लिए तैयार हो जाऊँगी। मैंने खुद से पूछती- अगर लड़के औरत का काम कर सकते हैं, तो क्यों नहीं? यह हमारी संस्कृति है, इसे समझना चाहिए।

मेरे लिए, यह रहस्य मैंने अपने परिवार से खोला था, और वे भी मुझे बेहतर तरीके का पता न होने दिया। मेरे पिताजी ने कहा- 'तुम बहुत बड़ी हो जाओगी, तो देखोगी कि कैसा चलेगा।' लेकिन मैंने समझाया- जब घर में खाना नहीं है, तो चाहे वह सारा देश, शायद ही फ़ैसला बदल दे।

अब जब हम ज्यादा उम्र की होती जा रही हैं, तो लोगों को समझने की जरूरत है। हमें अपने परिवार और समाज के लिए कुछ करने की जरूरत है, भले ही वह आसान न हो।
 
मैंने पढ़ा है कि श्मशानों में डोम का काम करने वाली लड़कियाँ बहुत कठिनाई से लोगों की स्वीकृति प्राप्त करती हैं। यह देखकर मुझे थोड़ा सा खेद हुआ। मैं समझता हूँ कि यह काम निजात करना है और लाशें जलाना, लेकिन यह भी सच है कि ऐसे कामों में महिलाओं को स्वीकृति देने से कई समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। लेकिन अगर हम इसे एक पुरुषों का काम नहीं मानकर, तो यह बदलाव करने की जरूरत है। शायद हमें किसी ऐसे व्यक्ति की बात सुननी चाहिए जिसके पास इस तरह के कार्यों में काम करने का अनुभव हो।

कुल मिलाकर, यह एक अच्छा संदेश है कि एक लड़की ने अपने परिवार और देश को भोजन करने के लिए और भी कठिन परिश्रम किया।
 
मुझे लगता है कि हमारे समाज में अभी भी बहुत कुछ बदलने की जरूरत है। जब यह बात आती है तो मैं समझती हूँ कि जीवन की कई समस्याएं होती हैं और लोगों को अपना खुद का रास्ता ढूंढने की जरूरत होती है, लेकिन यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि कुछ काम जैसे श्मशान की देखभाल करना, बहुत मुश्किल और भारी हो सकते हैं। मैं सोचती हूँ कि अगर हम ऐसे कामों की देखभाल करने वाले लोगों का सम्मान करते हैं और उनकी जरूरतें समझते हैं, तो शायद हमारा समाज और भी मजबूत हो जाएगा।
 
मेरे दोस्त, तुमने बहुत बोला है 😊। लेकिन मैं तुम्हारी बात समझ नहीं पाया। तुमने अपने परिवार को संभालने के लिए डोम का काम करने के फैसले को इतना बड़ा बना दिया है कि अब तुम्हें खुद से सवाल उठाना होगा कि तुमने अपनी जिंदगी क्या चुना है? 🤔

मैं तुम्हारी मां की चिंता समझता हूँ, लेकिन तुम्हें यह याद दिलाना जरूरी है कि तुमने अपनी सोच और अपने परिवार की जरूरतों को समझकर इस फैसले पर आया है। तुमने अपने जीवन में एक नया रास्ता बनाया है, और वही रास्ता जिसने तुम्हारे परिवार को संभालने में मदद की। 💪

लेकिन अब, तुम्हें यह भी समझना होगा कि जीवन में कई तरह के फैसले लेने होते हैं और हर एक फैसले के पीछे एक मजबूरी होती है। तुमने अपने परिवार को संभालने के लिए इस काम का चयन किया, और अब तुम्हें इसका सम्मान करना होगा। 🙏

इस तरह, मैं कहूंगा कि तुमने बहुत समझदारी से अपनी जिंदगी को बनाया है, लेकिन अब तुम्हें यह भी समझना होगा कि एक अच्छे निर्णय के पीछे एक अच्छा तर्क होता है। 🤓
 
मैं समझती हूँ कि तुम्हारा परिवार बहुत गरीब था, लेकिन तुम्हें इस तरह काम करने का रास्ता नहीं मिल रहा था। चाहे यह डोम का काम हो, घर की रोटी बनाने के लिए, तो तुम्हारी हालत बहुत खट्टी थी। मैं तुम्हें शुभकामनाएं देती हूँ।
 
बिल्कुल समझ में आती है कि लोगों ने तुम्हारी इस दौरे की बात कही होगी, लेकिन तुमने जो काम किया, उसकी पूरी तरज़ू है। किसी और की जगह चिता जलाने का काम करना आसान नहीं है, खासकर जब घर में रोटी के लिए भी जद्दोजहद हो। तुम्हारी मजबूरी थी, इसलिए तुमने किया, और इसके पीछे कोई ग़लती नहीं थी। यह देखकर मुझे आंसू आ रहे हैं... 🤗
 
मैं बहुत प्यार करता हूँ भारतीय आर्थिक व्यवस्था 😊, लेकिन कभी कभार मुझे लगता है कि हमारी आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो जाती है। 2014 में घर में रोटी के लिए भी जद्दोजहद थी, यह तो बहुत ही दुखद बात है 🤕। लेकिन फिर भी हमारी माँ की साहस और मजबूरी ने हमेशा हमें प्रेरित किया है। मैं बहुत गर्व करता हूँ कि उसने डोम का काम संभाल लिया और अपने परिवार को सहारा दिया। यह उसकी बहादुरी और आत्मविश्वास की कहानी है जिसे हमें सभी से सीखना चाहिए। 😊
 
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