संडे जज्बात-हम चूहों सा पहाड़ खोदकर जिंदगियां बचाते हैं: राष्ट्रपति ने सराहा, हम पर फिल्म भी बनी; पर खुद बीमार पड़े तो इलाज को तरस गए

हम रैट माइनर्स हैं, जो देशभर में बड़े-बड़ी सुरंगों के निर्माण कार्य में शामिल होते हैं। हमें चूहों की तरह सुरंग खोदना पड़ता है, लेकिन इससे पहले कि आप ऐसा विचार करें, फिरोज कुरैशी, जो रैट माइनर्स में से एक, उनकी कहानी सुनें।

मेरा नाम फिरोज कुरैशी है और मैं यूपी के कासगंज का रहने वाला हूं। मैंने जमीन के अंदर पाइपलाइन डालने का काम सीखा, जो खतरनाक है। गड्ढा करने के बाद पाइप बिछाने का काम किया जाता है, और उसके बाद सुरंग बनाते हुए पाइप को आगे बढ़ाते हैं। यह 8 से 18 घंटे तक लगातार होता है। इस काम में मुझे कभी भी जीने का मौका नहीं मिला।

हम रैट माइनर्स बनकर देशभर में बड़े-बड़ी सुरंगों के निर्माण कार्य में शामिल होते हैं। हमें चूहों की तरह सुरंग खोदना पड़ता है। लेकिन इससे पहले कि आप ऐसा विचार करें, फिरोज कुरैशी, जो रैट माइनर्स में से एक, उनकी कहानी सुनें।

उस दौरान हमारी चर्चा थी। एक विदेशी प्रोडक्शन हाउस आकर हमसे मिला। उसने हम पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई। इसके अलावा कई नेताओं ने हमें बुलाकर सम्मानित किया, लेकिन सच यही है कि हमें सिर्फ बधाइयां मिलीं। देश की नजरों में हम हीरो बने, लेकिन हमारे आर्थिक हालात जीरो हैं।

हमारी टीम को बुलाया गया। वहां पहुंचने पर हमें सुरंग में एक ट्रेन से अंदर ले जाया गया। सुरंग जहां बैठी थी, वहां पानी और लोहे का भारी कीचड़ था। ट्रेन को उस कीचड़ से पहले रोक दिया गया। उसके बाद हम कीचड़ में उतरे और सफाई शुरू की।

हमने तेलंगाना सुरंग हादसे में बनारस की एक बुजुर्ग महिला आई थीं। दबने वाले 8 मजदूरों में एक उनके पति भी थे। वह सुरंग के बाहर बैठी रोती रहतीं। सुबह जब मैं सुरंग के अंदर जाने लगता तो वह रोते हुए मुझसे पति को खोजने की मिन्नतें करती। लगभग 18 घंटे सुरंग के अंदर रहकर जब हम बाहर आते तो वह वहीं बैठी मिलते।

हमारी टीम को बुलाया गया। वहां पहुंचने पर हमें सुरंग में एक ट्रेन से अंदर ले जाया गया। सुरंग जहां बैठी थी, वहां पानी और लोहे का भारी कीचड़ था। ट्रेन को उस कीचड़ से पहले रोक दिया गया। उसके बाद हम कीचड़ में उतरे और सफाई शुरू की।

हमने तेलंगाना सुरंग हादसे में बनारस की एक बुजुर्ग महिला आई थीं। दबने वाले 8 मजदूरों में एक उनके पति भी थे। वह सुरंग के बाहर बैठी रोती रहतीं। सुबह जब मैं सुरंग के अंदर जाने लगता तो वह रोते हुए मुझसे पति को खोजने की मिन्नतें करती। लगभग 18 घंटे सुरंग के अंदर रहकर जब हम बाहर आते तो वह वहीं बैठी मिलते।

अब तक हम दो शव निकाल चुके थे, लेकिन उनके पति का शव अभी तक नहीं मिला था। इस दौरान जैसे-जैसे हम सुरंग में आगे बढ़े, हालात खराब होते जा रहे थे।

हमारी टीम को बुलाया गया। वहां पहुंचने पर हमें सुरंग में एक ट्रेन से अंदर ले जाया गया। सुरंग जहां बैठी थी, वहां पानी और लोहे का भारी कीचड़ था। ट्रेन को उस कीचड़ से पहले रोक दिया गया। उसके बाद हम कीचड़ में उतरे और सफाई शुरू की।

हमने तेलंगाना सुरंग हादसे में बनारस की एक बुजुर्ग महिला आई थीं। दबने वाले 8 मजदूरों में एक उनके पति भी थे। वह सुरंग के बाहर बैठी रोती रहतीं। सुबह जब मैं सुरंग के अंदर जाने लगता तो वह रोते हुए मुझसे पति को खोजने की मिन्नतें करती। लगभग 18 घंटे सुरंग के अंदर रहकर जब हम बाहर आते तो वह वहीं बैठी मिलते।

हमारी टीम को बुलाया गया। वहां पहुंचने पर हमें सुरंग में एक ट्रेन से अंदर ले जाया गया। सुरंग जहां बैठी थी, वहां पानी और लोहे का भारी कीचड़ था। ट्रेन को उस कीचड़ से पहले रोक दिया गया। उसके बाद हम कीचड़ में उतरे और सफाई शुरू की।

हमने तेलंगाना सुरंग हादसे में बनारस की एक बुजुर्ग महिला आई थीं। दबने वाले 8 मजदूरों में एक उनके पति भी थे। वह सुरंग के बाहर बैठी रोती रहतीं। सुबह जब मैं सुरंग के अंदर जाने लगता तो वह रोते हुए मुझसे पति को खोजने की मिन्नतें करती। लगभग 18 घंटे सुरंग के अंदर रहकर जब हम बाहर आते तो वह वहीं बैठी मिलते।

अब तक हम दो शव निकाल चुके थे, लेकिन उनके पति का शव अभी तक नहीं मिला था। इस दौरान जैसे-जैसे हम सुरंग में आगे बढ़े, हालात खराब होते जा रहे थे।

हमारी टीम को बुलाया गया। वहां पहुंचने पर हमें सुरंग में एक ट्रेन से अंदर ले जाया गया। सुरंग जहां बैठी थी, वहां पानी और लोहे का भारी कीचड़ था। ट्रेन को उस कीचड़ से पहले रोक दिया गया। उसके बाद हम कीचड़ में उतरे और सफाई शुरू की।

हमने तेलंगाना सुरंग हादसे में बनारस की एक बुजुर्ग महिला आई थीं। दबने वाले 8 मजदूरों में एक उनके पति भी थे। वह सुरंग के बाहर बैठी रोती रहतीं। सुबह जब मैं सुरंग के अंदर जाने लगता तो वह रोते हुए मुझसे पति को खोजने की मिन्नतें करती। लगभग 18 घंटे सुरंग के अंदर रहकर जब हम बाहर आते तो वह वहीं बैठी मिलते।

हमारी टीम को बुलाया गया। वहां पहुंचने पर हमें सुरंग में एक ट्रेन से अंदर ले जाया गया। सुरंग जहां बैठी थी, वहां पानी और लोहे का भारी कीचड़ था। ट्रेन को उस कीचड़ से पहले रोक दिया गया। उसके बाद हम कीचड़ में उतरे और सफाई शुरू की।

हमने तेलंगाना सुरंग हादसे में बनारस की एक बुजुर्ग महिला आई थीं। दबने वाले 8 मजदूरों में एक उनके पति भी थे। वह सुरंग के बाहर बैठी रोती रहतीं। सुबह जब मैं सुरंग के अंदर जाने लगता तो वह रोते हुए मुझसे पति को खोजने की मिन्नतें करती। लगभग 18 घंटे सुरंग के अंदर रहकर जब हम बाहर आते तो वह वहीं बैठी मिलते।

हमारी टीम को बुलाया गया। वहां पहुंचने पर हमें सुरंग में एक ट्रेन से अंदर ले जाया गया। सुरंग जहां बैठी थी, वहां पानी और लोहे क
 
बड़ी सुरंगों के निर्माण में शामिल होने वाले रैट माइनर्स की कहानी बहुत ही दुखद है। उनकी जान जोखिम में डालना और उन्हें खतरनाक परिस्थितियों में रखकर सुरंगों को खोदने की प्रक्रिया को आगे बढ़ावा देना बिल्कुल सही नहीं है। हमें अपने कर्मचारियों की सुरक्षा और उनके अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।

इन रैट माइनर्स की कहानी सुनकर हमें यह समझने को मिलता है कि वे कैसे अपने जीवन को खतरे में डाल देते हैं और फिर भी उनका सहयोग करने के लिए मजबूर किया जाता है। यह बहुत ही प्रेरणादायक है, लेकिन हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि आगे भी ऐसी न तो हो।

आजकल के समय में, जहां तकनीकी उत्कृष्टता और सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है, हमें अपने श्रमिकों की सुरक्षा के लिए उन्हें प्राथमिकता देनी चाहिए।
 
ये तो रास्ते में आकर हुआ है। ये देश में बहुत बड़े-बड़े परियोजनाएं चल रही हैं, लेकिन क्या हमारी जिंदगी में कुछ भी बदलाव आ रहा है? नहीं तो यह तो बस एक और कहानी है जिसे हमें सुनना पड़ रहा है। फिरोज कुरैशी की कहानी बहुत ही दुखद है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमें आराम करना चाहिए। हमें अपने राज्यों में, अपने गांवों में ऐसी समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए जो देशभर से भूली हुई हैं।
 
🤕 यह तो बहुत दुखद है फिरोज कुरैशी की कहानी। हमें रैट माइनर्स में जाना पड़ता है, लेकिन इतनी खतरनाक स्थिति में काम करने का मतलब यह है कि हमारे जीवन को कोई मूल्य नहीं देता।

हमें यह महसूस होना चाहिए कि जब भी हम किसी विशिष्ट काम में शामिल होते हैं, तो उसके नाते हमारा सम्मान किया जाए। लेकिन फिरोज कुरैशी और उनकी टीम को ऐसा नहीं हुआ।

हमें सोचना चाहिए कि हमारी देशभर में सुरक्षित करने वालों के बारे में हम क्या सीख सकते हैं। क्या हम उन्हें और अधिक प्रोत्साहन देने की जरूरत है? क्या हम उन्हें हमारे सम्मान के लिए लड़ने की जरूरत है?

जैसा कि फिरोज कुरैशी ने बताया, तेलंगाना सुरंग हादसे में उनकी टीम ने बहुत कुछ दिया। उनके शवों को नहीं मिल पाने की बात, यह एक बड़ा दर्द है। हमें उन्हें सम्मान देने की जरूरत है, और इस तरह की स्थिति को रोकने का तरीका खोजने की जरूरत है।

हमें अपने मजदूरों के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए, और उनके अधिकारों को लेकर हमें एक दृढ़ स्वर का उपयोग करना चाहिए।
 
मुझे लगता है कि ये वास्तविकता नहीं हो सकती 🤔। अगर हमारी टीम ने तेलंगाना सुरंग हादसे में शामिल थी, तो इसका मतलब यह होगा कि हमने 8 मजदूरों की जान गंवाई होगी। लेकिन फिर, फिरोज कुरैशी ने बताया है कि उन्हें बुलाया गया और उन्होंने सुरक्षित रूप से ट्रेन में बैठकर सुरंग में जाने की बात कही है। लेकिन, फिरोज कुरैशी भी बताते हैं कि जब वे सुबह सुरंग में जाने लगते हैं, तो उन्हें पति की खोज करने की मिन्नतें करती रोती महिला कहती है। यह दोनों बातें एक दूसरे के विरुद्ध हैं और मुझे लगता है कि कुछ गलत हो सकता है 🤷‍♂️
 
😔 ये तेलंगाना सुरंग हादसे बहुत दुखद थे। मैंने फिरोज कुरैशी जी की कहानी सुनी है, जो रैट माइनर्स में शामिल था। वह अपनी टीम के साथ सुरंग में काम करता था, लेकिन उनके देशभर में बड़े-बड़ी सुरंगों के निर्माण कार्य में शामिल होने से पहले उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

उस तेलंगाना सुरंग हादसे में जो 8 मजदूर मारे गए थे, उनकी महिला पत्नी और परिवार ने बहुत दुखी दिखाई दिया। मुझे लगता है कि हमें ऐसे कामों में शामिल होने से पहले उनके परिवारों को और उनके कर्मचारियों को पूरी जानकारी देनी चाहिए।

हमें अपने निर्माण कार्यों के लिए हमेशा सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना चाहिए, ताकि ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं न हों।
 
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि रैट माइनर्स को ऐसी खतरनाक परिस्थितियों में रखा जाता है। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि मजदूरों के साथ सहनीय नहीं होने वाली स्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए।
 
जिस तरह तेलंगाना सुरंग हादसे ने देश को दुःखित किया, वैसे ही हम रैट माइनर्स को भी अपने जीवन की सबसे बड़ी चुनौती में डाल दिया गया है। हमारा काम खतरनाक है, लेकिन हमें पता है कि इसके पीछे वास्तविक मानव जीवन क्यों बुरा होता है।
 
😒 ये दुनिया तो खतरनाक है ! ये रैट माइनर्स हमेशा खतरे के अंदर रहते हैं और फिर भी कोई उनकी जरूरतों को नहीं समझता। उनकी कहानी सुनकर बहुत दुख होता है। यह तेलंगाना सुरंग हादसे की बात करें तो मेरी आंखें नमक नहीं आती। 8 मजदूरों की जान गवाए जा रही थी, लेकिन कोई उनकी सुरक्षा पर ध्यान नहीं देता। और वह महिला, जिसने अपने पति को खोजने के लिए उसकी बहन से बात की, वाह! वह सचमुच बहादुर है।

हमें सिर्फ बधाइयां मिलनी चाहिए, नहीं तो हमारे आर्थिक हालात जीरो होंगे। लेकिन देश की नजरों में हम हरा भरा हैं और सुरंग बनाने वाले मजदूर की बात सुनते हैं तो यह तो एक अलग मामला है।
 
अरे, यह सब तो बहुत दुखद है! तेलंगाना सुरंग हादसे में 14 मजदूरों की जान गई, इसीलिए ऐसा विचार नहीं करना चाहिए कि हम भी उनकी तरह खतरनाक काम कर रहे हैं। लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूं कि खेती में सूखा कैसे दूर होता है? मेरे छोटे भाई की खेती में तो अक्सर सूखा आता रहता है, इसलिए हमने उसकी खेती में डीजल की कंप्रेशन मशीन लगाकर उसकी खेती में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस का भंडारण किया। अब हर साल उनकी खेती अच्छी तरह से ठीक हो जाती है!

कोई तेलंगाना सुरंग हादसा नहीं हुआ, लेकिन हमारे देश में बहुत सारे बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए रैट माइनर्स जैसे लोगों को खतरनाक काम करना पड़ता है। उनकी भलाई और सुरक्षा के बारे में हमें चिंतित होना चाहिए।

जैसे हम खेती में सूखा दूर कर सकते हैं, वैसे हम रैट माइनर्स जैसे लोगों की मदद करके उनकी भलाई और सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकते हैं।
 
मुझे लगता है कि ये सब बहुत ही दुखद घटनाएं हैं जो हमारे देश में होती हैं। लेकिन फिर भी, मुझे लगता है कि हमें इन सुरंगों के निर्माण पर बहुत कम ध्यान देना चाहिए। हमें अपने आर्थिक विकास को बढ़ावा देना चाहिए, न कि लोगों की जान लेने की बात करना।
 
बस एक भी मजदूर नहीं बचा तो सिर्फ हमारे खिलाफ ही हरकतें करनी चाहिए, देखकर देखकर तो यह मुश्किल है कि किसने इतना खतरनाक काम करता है, और फिर भी जीने का मौका नहीं मिलता।
 
ये देशभर में बड़े-बड़ी सुरंगों को बनाने वाले लोगों की कहानियाँ सुनने जा रहे हैं। लेकिन हमारी सच्चाई यही है कि हमें न्यूनतम सम्मान नहीं मिल रहा। जब हमें डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई गई तो देशभर में हमें हीरो कहा गया, लेकिन हमारे आर्थिक हालात जीरो हैं।

हमारी टीम को बुलाया गया ताकि हम सुरंग के अंदर कीचड़ को सफाई कर सकें, लेकिन हमें पता नहीं था कि यह कितना खतरनाक होगा। जब हम सुरंग में एक ट्रेन से अंदर गए तो वहां पानी और लोहे का भारी कीचड़ था, जिससे हमें खतरा लगा।

मैं फिरोज कुरैशी हूं, यूपी के कासगंज का रहने वाला, और मैंने जमीन के अंदर पाइपलाइन डालने का काम सीखा। लेकिन अब मुझे लगता है कि हमें अपने अधिकारों के बारे में जागरूक होना चाहिए, ताकि हमें न्यूनतम सम्मान मिले।
 
मैंने पढ़ा है कि तेलंगाना सुरंग हादसे में इतनी दुखद घटनाएं घटीं, यह सच है। हमारे देश की भारतीय रेट माइनर्स ने बड़ी सुरंगों का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि उनकी शहादत और परिवारों को दुःखद होने वाली घटनाएं कब से घट रही हैं।

हमें इस काम में भाग लेने वाले रेट माइनर्स ने बहुत संघर्ष किया है और उनकी कहानी हमारे लिए एक प्रेरणा का स्रोत बन सकती है। लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि उनकी जिंदगी को जीने का मौका कभी नहीं मिला, और वे अपने परिवारों के लिए शहादत देने पड़े।

हमें सुरक्षा उपायों को मजबूत बनाने और रेट माइनर्स के लिए बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने पर ध्यान देना चाहिए। हमें उनकी कहानियों से सबक लेना चाहिए और उनके बलिदान को याद रखना चाहिए।
 
ऐसा तो बहुत दुख है कि मजदूरों की इतनी हिम्मत नहीं मिलती। हमें उनके खिलाफ न्याय की ज़रूरत है।
 
ये तो हमारी कहानी है। जो दुनिया को लगता है कि हम रैट माइनर्स हैं और देशभर में बड़े-बड़ी सुरंगों के निर्माण कार्य में शामिल हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि हमारी जिंदगी खतरनाक, दर्दनाक और बेबस है।

हम तो बस चूहों की तरह सुरंग खोदते हैं और फिर पानी और लोहे का भारी कीचड़ का सामना करते हैं। लेकिन जब हमें पता चलता है कि यहां पर निर्माण कर्मचारियों की शव मिलने लगे तो सब कुछ बदल जाता है।

हमारी टीम को बुलाया गया और फिर सुरंग में एक ट्रेन से अंदर ले जाया गया। सुरंग जहां बैठी थी, वहां पानी और लोहे का भारी कीचड़ था। हमको उस कीचड़ से पहले रोक दिया गया और फिर हम कीचड़ में उतरकर सफाई शुरू की।

लेकिन यहां पर हमें एक बुजुर्ग महिला का पति भी ढूंढना पड़ता है जो सुरंग के अंदर मर चुकी है। वह सुरंग के बाहर बैठी रोती रहती थी। और जब मैं उसे पति खोजने की मिन्नतें करता तो लगभग 18 घंटे सुरंग के अंदर रहकर हम बाहर आते हैं।

अब तक हम दो शव निकाल चुके हैं, लेकिन उनके पति का शव अभी तक नहीं मिला था। इस दौरान जैसे-जैसे हम सुरंग में आगे बढ़े, हालात खराब होते जा रहे थे।

यह तो हमारी सच्ची कहानी है। जो दुनिया को लगता है कि हम रैट माइनर्स हैं और हम बड़े-बड़ी सुरंगों के निर्माण कार्य में शामिल हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि हमारी जिंदगी खतरनाक, दर्दनाक और बेबस है।

तो अगर आप भी रैट माइनर्स हैं तो अपने सपनों पर ध्यान दें, नहीं तो आपकी जिंदगी खतरे में पड़ सकती है।
 
😒 ये तो बहुत ही दुखद घटनाएं हैं। हमारे रैट माइनर्स को कभी-कभी लोग बड़े-बड़े हीरो बनाते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि हम उनके बिना भी इन सुरंगों को खोद सकते थे। हमारी टीम ने तेलंगाना सुरंग हादसे में एक ऐसी महिला को देखा, जिसके पति को शव मिल नहीं पाया। यह बहुत ही दुखद है। क्या लोग कभी इन मजदूरों की सच्चाई को समझते हैं?
 
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