सरकार बोली- ग्लोबल एयर क्वालिटी रैंकिंग ऑफिशियल नहीं: WHO सिर्फ सलाह देता है; राज्यसभा में मंत्री बोले- हम बाहरी रिपोर्ट पर पॉलिसी नहीं बनाते

भारत सरकार का कहना है कि ग्लोबल एयर क्वालिटी रैंकिंग आधिकारिक नहीं है, लेकिन यह सलाह देती है। इसे WHO सिर्फ एक मार्गदर्शक के रूप में देखती है। कोई भी देश अपनी जरूरत, भौगोलिक स्थिति और परिस्थितियों के अनुसार अपने मानक बनाता है।

पर्यावरण राज्यमंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने राज्यसभा में कहा, "हम कोई भी बाहरी रिपोर्ट पर पॉलिसी नहीं बनाते।" वे कहा कि भारत ने पहले ही नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स (NAAQS) का गठन किया है, जो 12 मानकों पर काम करता है।

वर्धन सिंह ने यह भी बताया कि कोई भी ग्लोबल अथॉरिटी ऑफिशियली देशों को रैंक नहीं करती। सरकार नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत आने वाले 130 शहरों को सर्वे करती है, जिसमें से हर साल सबसे बेहतर परफॉर्म करने वाले शहरों को सम्मानित किया जाता है।

इस मामले में, वर्धन सिंह ने कहा, "क्लाइमेट इंडेक्स से हमारी पॉलिसी नहीं बनती।" उन्होंने यह भी बताया कि खराब मौसम से होने वाले आर्थिक नुकसान के अनुमान बहुत अलग-अलग होते हैं।
 
मैंने कल दिल्ली में सड़क दुर्घटना में शामिल हुआ था, तो मैंने अपने फोन से कॉल करने की कोशिश की, लेकिन नेटवर्क पूरी तरह से खराब था। फिर भी, मैंने अपनी मुंह से ही बातें कर दीं। जैसे कि मेरा कार ड्राइवर एक्सीडेंट में शामिल हुआ और मैंने तभी कहा, "अरे, चालक को पार्किंग जगह ढूंढने दो, बस चल दो।" 😂🚗
 
मुझे लगता है कि ये सब तो बहुत ज्यादा बोल देने की जरूरत नहीं है। भारत सरकार की सोच समझकर ही निकल रही है, लेकिन यह तो हमेशा से ऐसा ही होता आया कि हर देश अपनी रैंकिंग बनाकर रख देता है और फिर क्या होता? जैसे वाह्य मौसम (Climate Index) में हमारे पास बिहार, बुंदेलखंड और छत्तीसगढ़ जैसे इलाके हैं जहां कुछ सालों पहले तो तूफान और बहुत देर से सूरज पड़ता था, लेकिन अब यह वही नहीं है। मुझे लगता है हमें अपने इस देश में किसी भी तरह की रैंकिंग पर ध्यान न देना चाहिए।
 
मुझे तो यह बात समझ नहीं आती कि हमें ग्लोबल एयर क्वालिटी रैंकिंग पर इतना ध्यान देना चाहिए। अगर भारत ने अपने लिए उचित मानक बनाए हैं, तो फिर हमारे शीर्ष पर रहने का क्या कारण है?

लेकिन, अगर सरकार ने कह दिया है कि यह रैंकिंग आधिकारिक नहीं है, तो मुझे लगता है कि हमें इस पर ध्यान रखना चाहिए। किसी भी तरह से, हमें अपने शहरों को साफ-सुथरा बनाना चाहिए और श्वास की गुणवत्ता बेहतर करनी चाहिए। इससे न केवल हमारी एयर क्वालिटी में सुधार होगा, बल्कि हमारे पर्यावरण भी अच्छा रहेगा।

अगर सरकार द्वारा चलाए जाने वाले एनसीएपी और NCAP के तहत आने वाले शहरों को सर्वे करने से निकलने वाले सम्मानित शहरों के लिए, मुझे लगता है कि यह एक अच्छा प्रयास है। इससे हमें अपने शहरों को बेहतर बनाने का एक उदाहरण मिलेगा।
 
अरे, ये ग्लोबल एयर क्वालिटी रैंकिंग तो एक मजाक है! भारत सरकार की बात सुनकर लगता है कि वे मूर्ख नहीं हैं, लेकिन फिर भी वे नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स (NAAQS) तो बनाने की कोशिश करते हैं। और क्या? कोई ग्लोबल अथॉरिटी ऑफिशियली देशों को रैंक नहीं करती, तो फिर भी वे अपने शहरों को सर्वे करने लगते हैं। NCAP का नाम तो एक मजाक है, जैसे कि हमारी सरकार खुद पर भरोसा नहीं कर पाती। और क्लाइमेट इंडेक्स से पॉलिसी बनाने की बात? अरे, यह तो एक विचार है! लेकिन खराब मौसम से होने वाले आर्थिक नुकसान के अनुमान तो अलग-अलग-अलग होते हैं, और हमें उनकी वजह से पॉलिसी बनानी नहीं चाहिए।
 
मेरे दोस्त, तो यह तो हमारी सरकार की बात है। लेकिन मुझे लगता है कि हमें अपनी पर्यावरण स्थिति को एक्सेस करने के लिए थोड़ा और तरीका ढूंढना चाहिए। जैसे कि अमेरिका या यूरोप में करते हैं। हमारे ग्लोबल एयर क्वालिटी रैंकिंग पर बहुत प्रभाव नहीं पड़ सकता। और वो भी एक सलाह के रूप में।

परन्तु, मैं समझता हूँ कि हमें अपनी जरूरतों और स्थितियों के अनुसार अपने नियम बनाने चाहिए। जैसे कि हमारे लिए सबसे अच्छा पर्यावरण मानक कौन सा होगा। ये तो बहुत भारतीय प्रश्न है। और हमें अपने राज्यसभा में बैठे व्यक्तियों की बात सुननी चाहिए। पर क्लाइमेट इंडेक्स से हमारी नीति नहीं बनती।

और यह तो सरकार की बात है। लेकिन हमें अपने शहरों में शुद्ध वायु में रहने का एक तरीका ढूंढना चाहिए। जैसे कि हमारे NCAP प्रोग्राम में। और उन शहरों को सम्मानित करना जो सबसे अच्छी परफॉर्म कर रहे हैं।
 
अरे, मुझे लगता है कि सरकार को अपनी पॉलिसी बनाने में थोड़ा समय लेने का अधिकार भी है। जैसे कि NAAQS का निर्माण पहले ही किया गया है, और अब भी हमारी सरकार पर्यावरण से संबंधित कई अन्य मानकों को बनाने पर काम कर रही है। यह तो ग्लोबल एयर क्वालिटी रैंकिंग सिर्फ एक सलाह की तरह देखी जा सकती है, न कि आधिकारिक रूप से लिया जाना चाहिए। और क्या हमें वास्तव में ग्लोबल क्लाइमेट इंडेक्स पर पॉलिसी बनाने की जरूरत है?
 
बात तो है कि सरकार क्या कह रही है, लेकिन क्या वास्तविकता समझ में आती? ग्लोबल एयर क्वालिटी रैंकिंग से हमारे देश की पॉलिसी नहीं बनती, लेकिन कोई भी देश अपनी जरूरतों और परिस्थितियों के अनुसार अपने मानक बनाता है तो क्या?
 
जितना सोचते हैं कि सरकार विश्व स्तर पर अपनी गुणवत्ता बताने की जरूरत है, लेकिन देश की विशिष्ट परिस्थितियों और जरूरतों को भूल जाती है। नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स तो खुद एक मार्गदर्शक है! 🌟

मुझे लगता है कि कोई भी रिपोर्ट या अथॉरिटी देश की अपनी जरूरत और परिस्थितियों को समझती है। क्लाइमेट इंडेक्स से पॉलिसी बनाने में आसान नहीं होगा। सरकार नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) का बहुत अच्छा तरीका है, जिससे शहरों को सर्वे करना और उन्हें सम्मानित करना एक सकारात्मक पहल है। 🌈
 
मेरा विचार है कि सरकार को अपनी पॉलिसी बनाने के लिए अपनी जरूरत और परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए। ग्लोबल रैंकिंग से हमेशा पहले काम करने वाली देशों की तरह, हम भी अपने समान मानक बना सकते हैं। लेकिन सरकार को यह तय करना होगा कि उसकी पॉलिसी WHO की सलाह पर आधारित होनी चाहिए या नहीं।
 
मुझे लगता है कि सरकार की बात समझ में आती है, लेकिन यह तो नहीं कि हम अपने देश की जरूरतों और परिस्थितियों को ग्लोबल रैंकिंग से प्रभावित न कर रहे हैं। ये रैंकिंग तो बस एक मार्गदर्शक है, लेकिन हमें अपने देश की असल स्थिति को समझने की जरूरत है। और सरकार का कहना है कि कोई भी ग्लोबल अथॉरिटी ऑफिशियली देशों को रैंक नहीं करता, लेकिन मुझे लगता है कि यह तो एक मामला है, लेकिन हमें अपने देश की स्थिति को समझने की जरूरत है। 🤔
 
यार, तो देखो, सरकार कहती है कि ग्लोबल एयर क्वालिटी रैंकिंग आधिकारिक नहीं है, लेकिन फिर भी हमें उस पर ध्यान देना चाहिए। पर, मुझे लगता है कि सरकार सही बोल रही है। हमारा पृथ्वी पर वायु शुद्धता एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन यह कैसे मापा जाए? और हमारे देश की भौगोलिक स्थिति और परिस्थितियां भी अलग-अलग होती हैं।

मुझे लगता है कि हमें अपने देश की जरूरतों और आवश्यकताओं के अनुसार अपने मानक बनाने चाहिए। जैसे कि हमारे पास पहले से ही नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स (NAAQS) का गठन है, जो 12 मानकों पर काम करता है। और सरकार तो हमारे शहरों में खुद सर्वे कर रही है जिन्हें NCAP के तहत आने वाले शहरों में शामिल किया गया है।

लेकिन, मुझे लगता है कि हमें अपनी प्रगति को देखने के लिए खुद मापने चाहिए। और सरकार भी तो हमें सिखाती है कि हमें अपने देश की जरूरतों के अनुसार अपनी राजनीति बनानी चाहिए। तो फिर, मुझे लगता है कि सरकार सही बोल रही है, और हमें अपनी प्रगति को देखने के लिए खुद मापने चाहिए। 🤔
 
मैंने पढ़ा है कि "एक अच्छा देश हमेशा बेहतर देश बनता है, लेकिन एक अच्छा व्यक्ति हमेशा अपनी गलतियों से सीखता है।" 🤔
 
ग्लोबल एयर क्वालिटी रैंकिंग को क्या कहना चाहिए? 😊 ये तो एक मार्गदर्शक की तरह है, लेकिन हमें अपनी जरूरत, भौगोलिक स्थिति और परिस्थितियों के अनुसार अपने मानक बनाने चाहिए। सरकार की बात समझ में आती है, जैसे कि हमने पहले नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स का गठन किया है और NCAP के तहत शहरों को सर्वे करती है। लेकिन यह तो समझ में आता है, कि कोई भी देश अपनी जरूरत अनुसार पॉलिसी बनाता है। क्या हमें दूसरों की बात पर थोड़ा ध्यान देने से पहले अपनी स्थिति को समझने में विफल होना चाहिए? 🤔
 
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