सुप्रीम कोर्ट ने जमीन अधिग्रहण मुआवजे से जुड़ी अपीलों पर एक महत्वपूर्ण फैसला दिया। कोर्ट ने कहा है कि अपीलों परिसीमा कानून से अपने-आप बाहर नहीं होतीं।
हाईकोर्ट ऐसी अपीलों में देरी को माफ कर सकता है। न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एससी शर्मा की पीठ ने यह फैसला सुनाया। 2013 के जमीन अधिग्रहण कानून और 1963 के परिसीमा अधिनियम के संबंध पर विचार किया।
यह मामला पुराने और नए कानून के बीच तालमेल से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा है कि जमीन अधिग्रहण मुआवजे के खिलाफ दायर अपीलों पर 2013 के कानून की धारा 24(1)(ए) लागू होगी।
इस धारा के तहत मुआवजा तय करने के लिए नए कानून के प्रावधान ही मान्य होंगे। हालांकि, पुनर्वास और पुनर्स्थापन से जुड़े लाभ अलग रहेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पीड़ित पक्ष 2013 के कानून के तहत बने प्राधिकरण के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं। इन अपीलों को पहली अपील माना जाएगा।
शीर्ष कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट को ऐसे मामलों में व्यावहारिक नजरिया अपनाना चाहिए। बेहद सख्त रवैया नहीं अपनाया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ऐसी अपीलों में देरी को माफ कर सकता है। न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एससी शर्मा की पीठ ने यह फैसला सुनाया। 2013 के जमीन अधिग्रहण कानून और 1963 के परिसीमा अधिनियम के संबंध पर विचार किया।
यह मामला पुराने और नए कानून के बीच तालमेल से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा है कि जमीन अधिग्रहण मुआवजे के खिलाफ दायर अपीलों पर 2013 के कानून की धारा 24(1)(ए) लागू होगी।
इस धारा के तहत मुआवजा तय करने के लिए नए कानून के प्रावधान ही मान्य होंगे। हालांकि, पुनर्वास और पुनर्स्थापन से जुड़े लाभ अलग रहेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पीड़ित पक्ष 2013 के कानून के तहत बने प्राधिकरण के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं। इन अपीलों को पहली अपील माना जाएगा।
शीर्ष कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट को ऐसे मामलों में व्यावहारिक नजरिया अपनाना चाहिए। बेहद सख्त रवैया नहीं अपनाया जाना चाहिए।