थरूर बोले- रूसी डेलिगेशन से बात करके मजा आया: कहा- कल पुतिन के लिए आयोजित डिनर में शामिल हुआ; राहुल गांधी-मल्लिकार्जुन खड़गे को न्योता नहीं

बीजेपी के पूर्व सांसद शशि थरूर ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए आयोजित डिनर में खुद ही भाग लिया था। इस दौरान उन्होंने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे को न्योता नहीं मिला था।
 
मुझे लगता है कि यह खबर बहुत ही अनावश्यक है। शशि थरूर जी एक बड़े नेता हैं और उनके पास बहुत सारी महत्वपूर्ण बातें होंगी, लेकिन फिर भी उन्होंने डिनर में भाग लिया। यह तो वाकई एक रहस्य की तरह लग रहा है। क्या राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे जी को बेगुनाह ठहराया जाए? 🤔

मैंने अपने बचपन में जब भी बड़े नेता देश के लिए यात्रा करते थे, तो हम सभी उनके सामने खड़े होकर प्यार और सम्मान से उन्हें पुकारते थे। यह एक महत्वपूर्ण पहलू है जो अब भी बना हुआ है। क्या इस दौर में नेताओं को इतनी निजता की जरूरत है? 🤷‍♂️

मुझे लगता है कि हमें अपने नेताओं की ईमानदारी और ईमानदारीपूर्वक जाने की जरूरत है, चाहे वो किसी भी पार्टी से हों। इससे हम अपने देश की ओर एक पारदर्शी राह ढूंढ सकते हैं। 💡
 
शायद तो शशि जी को पुतिन साहब पर बहुत भरोसा है 😒, खासकर जब यह देखा जाए कि उनके रिश्तेदारों और दोस्तों को न्योता मिल गया था। लगता है कि उन्हें भी अपने परिवार के साथ कुछ करना चाहिए, फिर नालायक पुतिन जी के साथ खाना बनाकर बैठने में इतने समय लग जाते। और राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे जी को भी ऐसा अच्छा मौका नहीं मिला, लगता है कि उन्हें तो नोटिस से भी बाहर कर दिया गया। 🤔
 
वले दिन रूसी पुतिन से बैठकर डिनर में शशि थरूर कैसे गये ? कोई समझ आ रहा है कि वे लोग कैसे अलग-अलग देशों में लोगों के साथ बैठ कर खाना खाते हैं ? राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे तो ये देश के नेता नहीं ? शशि थरूर को लगता है कि वह देश के नेता नहीं ?
 
शशि थरूर जी की ऐसी बातें सुनकर तो लगता है कि वे लोग अपने राजनीतिक संबंधों को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं 🤔। लेकिन यह भी एक दिलचस्प बात है कि वे न्योता नहीं मिलना चाहते थे? क्या यह उनकी राजनीतिक गेंद को खेलने से पहले अपने खेल को ठीक करने की जरूरत है? भारत में राजनीतिक जीवन बहुत जटिल होता है, और ऐसे पल जहां आप देख सकते हैं कि हर कोई एक नई गेंद पर खेल रहा है।
 
वाह वाह, यह जानकारी तो बहुत ही रोचक है 🤯 शशि थरूर जी की इस बात पर अपना दृष्टिकोण देना होगा, भारत में राजनीति में ऐसे कई हैं जो विदेशी नेताओं के साथ मिलते रहते हैं। यह तो उनकी राजनीतिक प्रतिशोध को धीमा करने की कोशिश हो सकती है 🤔 क्योंकि ये दोस्ती उनके विरोधियों के सामने अपनी मजबूती को दिखाने का एक तरीका है।
 
क्या यह सच है कि शशि सांसद विदेश में जाने के लिए इतने प्रबल दोस्त नहीं हैं? राहुल और मल्लिकार्जन को निमंत्रण नहीं मिला, जबकि उन्हें अपने पुराने दोस्त शशि सांसद के साथ डिनर करने का अवसर मिला। यह एक अजीब बात है क्या?
 
बात बात, यह तो बहुत ही अजीब चीज है 🤔 कि एक विपक्षी नेता जैसे शशि थरूर को रूसी राष्ट्रपति के साथ डिनर में जाने के लिए तैयार रहना है। यह हमेशा से एक सवाल उठाता है कि दुनिया में कौन सी दुनिया है?
 
पूर्व सांसद शशि थरूर की ऐसी मुश्किल स्थिति में तो जान पचाना आसान है क्या? 🤔 रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए डिनर में अपने आप खुलना एक बड़ा सवाल है। यार, यह देखकर लगता है कि उनकी राजनीतिक स्थिति बहुत चुनौतीपूर्ण हो गई है।

लेकिन दूसरी ओर अगर हम उनके नेतृत्व और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं पर विचार करें, तो यह एक नई राह का प्रयास हो सकता है। शशि थरूर जी को ये निर्णय स्पष्ट रूप से उनकी राजनीतिक भागीदारी और समझौतों के बारे में बताया गया है, जो कभी-कभी हमें आश्चर्यचकित कर देता है।
 
ज़रूरी बात है, अब से तो हम सब परेशान हुए ट्विटर पर कोई भी व्यक्ति बिना मौके के टिप्पणियाँ कर सकता है। लेकिन शशि थरूर जी की ऐसी बातें करने की वजह से तो हमारी राजनीतिक दुनिया में एक नई गहराई आई है **😏**। उन्होंने अपने पिछले अनुभवों और निर्णयों को भूलकर रूसी राष्ट्रपति के लिए डिनर में बैठ गये, जिससे उनके चुनावी यात्रा की हालिया खबरें तेज़ हो गईं **😒**। अगर वह अपनी पार्टी और देश के नाम पर चलने वाले थे, तो उन्हें पहले से ही राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे लोगों से मिलने का मौका नहीं मिलता **😭**।
 
रूस के प्रेसिडेंट पुतिन से जुड़ी बातचीत में भारतीय राजनीति की गहराई को देखने की जरूरत है। शशि थरूर की ऐसी कदमें हमेशा सवाल उठाती हैं - क्यों नहीं उन्होंने खुद को डिनर में बुलाया? यह सोचते समय भी बहुत महत्वपूर्ण है कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस मौके पर स्वागत नहीं लिया।
 
वसंत ऋतु में कौन सी खुशबू आती है? शशि थरूर जी की इस नई खबर से लगता है कि भारतीय राजनीति में कुछ ऐसा बदलाव आ गया है। बीजेपी के पूर्व सांसद तो पहले कभी नहीं सोचते थे कि वे रूसी राष्ट्रपति के लिए डिनर में जाने के लिए तैयार होंगे। लेकिन अब यह बदलाव जरूर आया है, और इसका मतलब यह है कि भारतीय राजनीति में कुछ ऐसा होना शुरू हुआ है।
 
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