उद्धव बोले- संसद में उनके सांसद ‘वंदे मातरम’ नारा लगाएंगे: BJP में हिम्मत है तो उन्हें बाहर फेंककर दिखाए, राज्यसभा सचिवालय ने नारे पर रोक लगाई है

उद्धव ठाकरे ने शुक्रवार को कहा है कि वंदे मातरम् का नारा सदन में लगाने पर राज्यसभा सचिवालय ने रोक लगाई है। उन्होंने अपनी पार्टी के सांसदों को चुनौती दी है और कहा है कि अगर उनकी हिम्मत है तो उन्हें सदन से बाहर फेंककर दिखाए।
 
बात ये तो बहुत अजीब है 🤔, ज्यादातर लोग वंदे मातरम् का नारा पैदा कर रहे थे, और अब यही नारा उन्हें सदन से बाहर फेंकने की चुनौती देने का कारण बन गया है 🙄। मुझे लगता है कि ये बहुत ही असामान्य चीज है। और तो भी, सदन में कौन-कौन से नियम हैं जिनका पालन करना होता है, लेकिन यह सब कुछ तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है 🤷‍♂️
 
अरे, यह तो बहुत ही अजीब है कि वंदे मातरम् नारे पर रोक लगाई जा रही है। मुझे लगता है कि हमारा संसदीय प्रक्रिया बहुत ही अनिश्चित है। अगर सचिवालय कह रहा है कि यह नारा नहीं चलना चाहिए तो फिर यह तो हमारे जान-माल और आदर्शों के खिलाफ है। परंतु, मुझे लगता है कि यह एक बहुत बड़ा झगड़ा बन गया है, जिसे हमें ध्यान से देखना चाहिए। 🤔

कुछ लोग कहते हैं कि यह नारा विपक्षी दलों को परेशान कर रहा है और इससे उनकी राजनीतिक सफलता को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन मुझे लगता है कि यह एक बहुत बड़ा दुरुपयोग है। हमारे वंदे मातरम् नारे का अर्थ ही भारतीय समाज की एकता और सामूहिकता है। इसे रोकने की कोशिश करना बस तो भ्रष्टाचार की ओर ले जा रहा है। 🚫
 
बिल्कुल, यार! मैं सोचता हूँ कि भारत सरकार के इस फैसले पर विचार करना चाहिए। अगर सरकार तो सदन में लगाया गया वंदे मातरम् का नारा रोकने के लिए तैयार है तो यह दिखाता है कि हमारी स्वतंत्रता और संविधान कैसे खतरे में आ रहे हैं... 🤔

लेकिन, यार, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सदन में जो चीजें लगाई जाती हैं वो राष्ट्रीय स्तर पर एकता और एकजुटता को दर्शाती हैं। अगर हमारे नेताओं को यह समझने में समय लेगा तो फिर भी देश को प्रगति करने में मदद मिलेगी। 🙏

मेरी बात तो यह है कि अगर सरकार चाहती है तो सदन में वंदे मातरम् का नारा लगाने का तरीका सोचना चाहिए। शायद अगर हम अपने नेताओं को एकजुट कर लेते हैं और उन्हें यह समझाएं कि हमारी जीत-हार तो भारत के भविष्य में ही नहीं बल्कि सदन में लगाया गया नारे में ही है... 😊
 
वाह, यह बात मुझे बहुत अच्छी लगती है कि लोग ऐसे संवाद में हैं जहां विविध नजारों का जश्न मनाया जा रहा हो। ठाकरे जी ने सदन में वंदे मातरम् का नारा लगाने पर रोक लगाई है, लेकिन मुझे लगता है कि यह एक अच्छा संकेत है कि लोग अपने अधिकारों के बारे में जागरूक हो गए हैं। अगर उन्हें सदन से बाहर फेंकने की जरूरत है, तो शायद वे कुछ गंभीर मुद्दों पर चर्चा कर रहे थे। मुझे लगता है कि यह एक अच्छा मौका है जिस पर हम सब एक साथ बैठकर समस्याओं का समाधान ढूंढ सकते हैं।
 
बिल्कुल ठीक है, लोग यह नहीं समझ रहे हैं कि वंदे मातरम् नारा जो हमारी जमीन पर जंगी छापा गया था, अब वहाँ चिपकने दिया जाना चाहिए। संसद में उसका चिन्ह लगाया जाए तो ही हमें पता चलेगा कि हमारी सरकार और पार्टियां वास्तव में अपने देश की रक्षा करने के लिए हैं या नहीं। ऐसा नहीं है। अगर उन्हें सदन से बाहर फेंकने की जरूरत है तो वही करें, लेकिन पहले उस नारे को राज्यसभा सचिवालय में लगाने दें। यह एक बहुत बड़ा प्रतीक होगा। 🤔
 
बात ज्यादा ही है। वंदे मातरम् नारे पर रोक लगाना तो समझ में आता है, लेकिन उद्धव ठाकरे को यहां तक कहकर चुनौती देना बिल्कुल सही नहीं है। उनकी पार्टी सांसदों को किस तरह फेंकना चाहती है? सरकार से निपटने के लिए तो उन्हें अपना खेल समझ में आना चाहिए, न तो सदन से बाहर फेंकना चाहिए। और यहां तक कि राज्यसभा सचिवालय पर भी जोर डालना तो वाकई है। ऐसा करने से उन्हें सरकार की दिशा में आगे बढ़ने का कोई फायदा नहीं होगा।
 
🙄 भले ही वंदेमातरम् नारे का मुद्दा है, लेकिन ऐसे में जब सदन में लगाने पर राज्यसभा सचिवालय से रोक लगाई जाती है तो यह अच्छा लगता नहीं 🤔। अगर उद्धव ठाकरे जी की पार्टी के सांसदों की हिम्मत है, तो उन्हें सदन में दिखाए रखने के लिए कुछ करना चाहिए, न कि बाहर फेंकने की चुनौती। यह भारतीय राजनीति को देखने वालों के लिए खामोश कर देता है 😐। मुझे लगता है कि सदन में सभी दलों के सांसदों को एकजुट करने पर ध्यान देने की जरूरत है, ताकि ऐसे मुद्दों पर बातचीत हो सके और सबकुछ समझ में आ जाए 🤝। #नेताओंकीआज्ञाबाजी #राजनीतिकमुद्देविस्तार
 
આ વિષય પર મને કોઈ શક્ય અર્થ પડતું નથી. આ દિલચસ્પ હજુ તો એ વિષય છે જ્યારે બીજી પક્ષે ગૌરવ અને સમ્માનનો એટલો આદર્શ બની જાય.
 
भारतीय लोकतंत्र की सुंदरता तो ऐसे मoment में उजागर होती है जब राजनेता अपने विचारों को आवाज देने के लिए तैयार होते हैं... लेकिन फिर भी हमें यह नहीं समझने देना चाहिए कि क्या ये नारा सिर्फ एक राजनीतिक प्रचार का हिस्सा है या कुछ और है। मुझे लगता है कि उद्धव ठाकरे की बात कहीं और जाने देनी चाहिए, जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि संबंधी मुद्दों पर... यारे नारे तो फिर भी लोगों को एकजुट करने में मदद कर सकते हैं, लेकिन क्या हमें वास्तविक परिवर्तन की दिशा में नहीं जाना चाहिए? 🤔
 
अरे, यह टॉपिक थोड़ा अजीब लग रहा है। मुझे लगता है कि ये नारा वंदे मातरम् पूरी तरह से संवेदनशील विषय है और इसका सदन में लागू करना उचित नहीं हो सकता। ठाकरे जी अपनी पार्टी के सांसदों को चुनौती देते हुए यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे कितने साहसी और संकल्पशाली हैं। लेकिन मुझे लगता है कि इससे सदन की सम्मानितता पर प्रभाव पड़ सकता है। ठीक है, मैं समझता हूँ कि उन्हें अपनी राजनीतिक रणनीति बनानी होती है, लेकिन इस तरह से नारा लगाना सही नहीं हो सकता। 🤔
 
बात तो ये है, जैसे ही वंदे मातरम् का नारा सदन में लगाने की बात हो रही है तो लोगों की राय तो अलग-अलग है। मेरा विचार है कि यह सब कुछ थोड़ा ज्यादा हुआ है। शायद परिवेश भी थोड़ा बदल गया हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सदन में किसी भी तरह के नारे को लगाने से पहले इसकी जांच करनी चाहिए।
 
🤔 यह तो बहुत अजीब है कि वंदे मातरम् का नारा लगाने पर राज्यसभा सचिवालय इतनी जोर से रोक लगा रहा है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेताओं को अपने अधिकारों के बारे में खुद ही समझौता करना पड़ रहा है। 🤷‍♂️ उद्धव ठाकरे जी को उनकी चुनौती में फायदा होने की उम्मीद है और उनकी पार्टी ने सदन से अपनी आवाज उठाने का एक अच्छा मौका मिला है। मुझे लगता है कि यह सब भारतीय राजनीति की दुनिया को धक्का देने वाला होने का नजारा है। 🤞
 
वंदे मातरम् नारे को सदन में लगाने की बात पर राज्यसभा सचिवालय ने रोक लगाई है, यह बहुत ही अजीब है। क्या इसके पीछे कुछ और रहेगा? मुझे लगता है कि उद्धव ठाकरे द्वारा इस तरह की चुनौती देने से किसी भी गंभीरता की बात नहीं हो सकती। लेकिन फिर भी, यहाँ पर एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है - सदन में जो नारा लगाया गया था, वह क्यों? क्या यह एक राजनीतिक गलीचा साबित होगा या हमें इसके पीछे कुछ और समझने की जरूरत है? 🤔
 
मुझे लगता है कि ये सब कुछ थोड़ा भ्रष्टाचार की बात है। वंदे मातरम् नारा हमारे देश की गर्व की बात है, लेकिन राज्यसभा सचिवालय ने उसे लगाने से पहले रोक कर दिया। यह तो बहुत चिंताजनक है कि क्या अब हमारे सदन में कोई विचार भी रखा जा सकता है? 🤔

मुझे लगता है कि उद्धव ठाकरे जी ने सही बात कही है। अगर उनकी पार्टी के सांसद अपनी हिम्मत है तो उन्हें सदन में बैठने का रास्ता ढूंढना चाहिए। लेकिन यह सब कुछ थोड़ा भ्रष्टाचार की बात है। हमें अपने देश को अच्छा बनाने की कोशिश करनी चाहिए, न कि थक्के में डालना। 🙅‍♂️
 
अरे, ये तो बहुत ही अजीब मुद्दा है! वंदे मातरम् का नारा लगाने की बात करते हैं लेकिन सदन के सचिवालय में रोक लग गई है? यह तो कुछ और है... मुझे लगता है कि उद्धव ठाकरे जी की पार्टी को थोड़ी सी चुनौती देनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए कि सदन के नियमों को तोड़ दें। इसके अलावा, यह तो भारत में विविधता को बढ़ावा देने के बजाय एक तरफ उठा रही है।
 
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